क्यों हुई देश में ऑक्सीजन की कमी? कैसे प्रभावित हो रहा है इसका ट्रांसपोर्टेशन; जानें सबकुछ

केंद्र सरकार भी लगातार ऑक्सीजन को लेकर कड़े कदम उठाती हुई नजर आ रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

केंद्र सरकार भी लगातार ऑक्सीजन को लेकर कड़े कदम उठाती हुई नजर आ रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

Oxygen Crisis in India: मेडिकल ऑक्सीजन में नमी, धूल या दूसरी गैस शामिल नहीं होती हैं. यही कारण है कि मेडिकल ऑक्सीजन (Medical Oxygen) का उत्पादन वैज्ञानिकों की निगरानी में विशेष व्यवस्था से किया जाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 22, 2021, 12:10 PM IST
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नई दिल्ली. देशभर में कोरोना वायरस (Coronavirus) संकट के बीच ऑक्सीजन की कमी को लेकर बहस छिड़ी हुई है. राज्य सरकारें और अस्पताल लगातार ऑक्सीजन की कमी के दावे कर रहे हैं. रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा था कि कई मरीजों की ऑक्सीजन की कमी के चलते मौत हो गई है. हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि राजधानी दिल्ली (Delhi) के एक अस्पताल ने हाईकोर्ट में ऑक्सीजन की कमी का मुद्दा उठा दिया है. इस पर हाईकोर्ट (High Court) ने केंद्र सरकार को फटकार लगाई है. साथ ही ऑक्सीजन के औद्योगिक उपयोग को रोकने के बात कही है.

केंद्र सरकार भी लगातार ऑक्सीजन को लेकर कड़े कदम उठाती हुई नजर आ रही है. मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा था कि देश में ऑक्सीजन पर्याप्त मात्रा में है, लेकिन ट्रांसपोर्टेशन के लिए कंटेनर का अभाव है. इसी बीच खबर आई थी कि सरकार जल्द ही विदेश से कंटेनर लाने की तैयारी में है और इसके लिए भारतीय वायुसेना की मदद लेने की तैयारी की जा रही है. ऐसे में ऑक्सीजन से जुड़ी कुछ जानकारियां आपके लिए जरूरी हो सकती हैं-

मेडिकल ऑक्सीजन और हवा में अंतर: दरअसल बताया जा रहा है कि मेडिकल ऑक्सीजन में 98 फीसदी ऑक्सीजन शुद्ध होती है. वहीं, वातावरण की हवा में ऑक्सीजन की मात्रा 21 फीसदी के करीब होती है. मेडिकल ऑक्सीजन में नमी, धूल या दूसरी गैस शामिल नहीं होती हैं. यही कारण है कि मेडिकल ऑक्सीजन का उत्पादन वैज्ञानिकों की निगरानी में विशेष व्यवस्था के तहत किया जाता है.

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मेडिकल ऑक्सीजन तैयार होने की प्रक्रिया: मेडिकल ऑक्सीजन बनाने के लिए हवा में से शुद्ध ऑक्सीजन को अलग किया जाता है. खास बात है कि हवा में मौजूद सभी गैसों के मुकाबले ऑक्सीजन का बॉइलिंग पॉइंट (-183.0 डिग्री सेल्सियस) अलग होता है. हवा को ठंडा कर ऑक्सीजन को अलग किया जाता है. इसके बाद हवा को जमाकर ठंडा किया जाता है, जिससे सभी गैस तरल बनकर निकल जाती हैं. इस तरह 99.5 फीसदी लिक्विड ऑक्सीजन तैयार कर ली जाती है. प्रक्रिया शुरू होने से पहले हवा को ठंडा कर उसमें धूल, तेल और दूसरी अशुद्धियों दूर की जाती हैं.

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ट्रांसपोर्टेशन का तरीका: ऑक्सीजन तैयार होने के बाद इन्हें बड़े टैंकर्स में स्टोर किया जाता है. इसके बाद क्रायोजेनिक टैंकर की मदद से इन्हें अन्य जगहों पर भेजा जाता है. प्रेशर कम कर इन्हें गैस के रूप में सिलेंडर में भरा जाता है. इसके बाद ये सिलेंडर अस्पताल और अन्य जगहों पर पहुंचकर मरीज और अन्य जरूरतें पूरी करते हैं.



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क्यों हुई है ऑक्सीजन की कमी: मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कोरोना वायरस के मामले देश में ऑक्सीजन की कमी का एक कारण है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, इस महामारी से पहले देश में 1000-1200 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की खपत होती थी. अब यह बढ़कर 5 हजार मीट्रिक टन के करीब पहुंच गई है. साथ ही तेजी से बढ़ रही मांग के चलते सप्लाई में भी परेशानी हो रही है. रिपोर्ट्स में बताया जा रहा है कि लिक्विड ऑक्सीजन को पहुंचाने के लिए 1200-1500 क्रायोजेनिक टैंकर्स हैं. इसके अलावा डिस्ट्रीब्यूटर्स के स्तर पर गैस के रूप में भरने के लिए सिलेंडर्स की कमी हो रही है.
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