ANALYSIS: आखिर क्यों बेचैन है कांग्रेस और परेशान कार्यकर्ता, नेता व खुद राहुल गांधी?

कांग्रेस के अधिकांश नेता पहले नंबर पर गांधी परिवार को रखते हैं और दूसरे नंबर पर खुद को. ऐसे तमाम नेताओं के लिए पार्टी में किसी भी तीसरे नेता का कोई अस्तित्व नहीं है. ये और बात है कि गांधी परिवार को छोड़ दें तो पार्टी में किसी भी नेता का राष्ट्रीय स्तर पर जनाधार नहीं है.

Sunil Bazari
Updated: July 2, 2019, 6:31 PM IST
ANALYSIS: आखिर क्यों बेचैन है कांग्रेस और परेशान कार्यकर्ता, नेता व खुद राहुल गांधी?
राहुल प्रियंका नहीं तो कौन थामेगा कांग्रेस की कमान
Sunil Bazari
Updated: July 2, 2019, 6:31 PM IST
राहुल गांधी के कांग्रेस अध्यक्ष पद को छोड़ने को लेकर आखिर क्यों परेशान हैं पार्टी नेता और कार्यकर्ता? ये सवाल पिछले कुछ दिनों से मीडिया में है. दरअसल कांग्रेस में ऐसे नेताओं की भरमार है, जो अपनी तिकड़मों के लिए जाने जाते हैं. इसका मुज़ाहिरा अकसर राज्यों में पीसीसी अध्यक्ष चयन के दौरान हो जाता है. हाल ही में जब तीन राज्यों में कांग्रेस ने विधानसभा चुनावों में जीत हासिल की तो ये देखा गया कि पार्टी नेता और कार्यकर्ता चुनावों में कम और सीएम के लिए लॉबिंग करते ज्यादा नज़र आए. ये ही है असली कांग्रेस और कांग्रेसी लेकिन जब बात गांधी परिवार से इतर किसी को कमान देने की आती है तो पार्टी में इस बात को लेकर सहमति दिखाई नहीं पड़ती.

कांग्रेस का मूल स्वाभाव
ये बात हमें फिर से कांग्रेस के मूल स्वभाव की याद दिलाती हैं. दरअसल कांग्रेस के अधिकांश नेता पहले नंबर पर गांधी परिवार को रखते हैं और दूसरे नंबर पर खुद को. ऐसे तमाम नेताओं के लिए पार्टी में किसी भी तीसरे नेता का कोई अस्तित्व नहीं है. ये और बात है कि गांधी परिवार को छोड़ दें तो पार्टी में किसी भी नेता का राष्ट्रीय स्तर पर जनाधार नहीं है. आम कार्यकर्ता इस बात को लेकर भी परेशान है कि जिस नेता का जनाधार देशभर में नहीं है, ऐसे किसी व्यक्ति को किसी राष्ट्रीय पार्टी का अध्यक्ष कैसे बनाया जा सकता है? कांग्रेस इस समय संक्रमण काल से गुज़र रही है. ऐसे में यदि गलत हाथों में पार्टी की कमान चली जाए तो पार्टी का बचा-कुचा जनाधार भी खत्म हो सकता है.

राहुल गांधी की जिद

राहुल गांधी क्यों अपनी ज़िद पर अड़े हैं? राहुल गांधी भांप चुके हैं कि पार्टी का भला तब तक नहीं हो सकता है, जब तक कोई गांधी इसका नेतृत्व कर रहा है. जब प्रियंका का ऑप्शन उनके सामने रखा गया तो उन्होंने ये बात साफ कर दी थी कि गांधी परिवार से कोई भी कांग्रेस का अध्यक्ष नहीं बनेगा. दरअसल कांग्रेस के खिलाफ प्रचार में सबसे ज्यादा हमले परिवारवाद को लेकर हुए, जिसका खामियाजा राहुल गांधी को भुगतना पड़ा. पार्टी के पास एक आखिरी दांव प्रियंका गांधी के रूप में बचा था, जिसे लोकसभा चुनावों के ठीक पहले पार्टी ने चल दिया, लेकिन उसका फायदा होना तो दूर उलटे पार्टी की बची कुची साख भी दांव पर लग गई.

बिना गांधी परिवार के कैसी होगी कांग्रेस?

Congress leaders
कांग्रेस अध्यक्ष पद की रेस में खड़गे, गहलोत और शिंदे (बाएं से)

Loading...

कांग्रेस के औसत नेता और कार्यकर्ता ऐसे मौके पर चुप्पी साध लेते हैं, वो बिना गांधी परिवार के कांग्रेस  की कल्पना ही नहीं कर पाते. समय-समय पर कांग्रेस नेता इस बात को ज़ाहिर भी कर चुके हैं कि गांधी परिवार से बेहतर कोई भी पार्टी का नेतृत्व नहीं कर सकता.



 

मीडिया में एक और बात चर्चा में हैं. वो ये कि यदि गांधी परिवार से इतर कोई कांग्रेस का अध्यक्ष बन भी गया तो क्या वो राहुल-प्रियंका के रिमोट से ज्यादा कुछ होगा? हालांकि पूर्व में ऐसी बातें गलत साबित हो चुकी हैं. आखिर सत्ता का भी अपना स्वरूप होता है, जिसे भी मिलती है वो उसे पूरे तौर पर बदलकर रख देती है, सीताराम केसरी इसका प्रत्यक्ष प्रमाण रहे हैं.

कांग्रेस की नई रणनीति 

हालांकि राजनैतिक विश्लेषक रशीद किदवई राहुल गांधी के इस फैसले को कांग्रेस की नई रणनीति मानते हैं. उनका कहना है कि राहुल गांधी की ये रणनीति हो सकती है कि कांग्रेस का नया अध्यक्ष गांधी परिवार से न हो, यानी बीजेपी की भाषा में नामदार नहीं बल्कि कामदार हो. राहुल अध्यक्ष न रहते हुए भी 'राहुल गांधी' ही रहेंगे. जनता के बीच अपनी बात पहले की तरह ही पहुंचा सकते हैं. इससे हमेशा राहुल गांधी को निशाने पर रखने वाले सत्ता पक्ष को भी अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करना पड़ सकता है.

चुनना ही होगा नया नेता
बहरहाल पार्टी अब ऐसे मुहाने पर आ चुकी है कि उसे अब अपना नया नेता चुनना ही होगा. लोकसभा चुनावों के बाद से राहुल पार्टी अध्यक्ष पद छोड़ने की इच्छा जता चुके हैं. कई राज्यों में पार्टी का संगठन प्रदेश और ज़िला स्तर पर छिन्न-भिन्न हो चुका है. बंगाल, हरियाणा इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं. ऐसे में केवल उम्मीद ही का जा सकती है कि अशोक गहलोत, मल्लिकार्जुन खड़गे या सुशील कुमार शिंदे जैसे किसी सीनियर नेता के हाथों में पार्टी फिर से खड़ी की जा सके.
First published: July 2, 2019, 6:00 PM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...