ANALYSIS: बिहार की सियासत में कुशवाहा खुद को क्यों मानते हैं लालू-नीतीश का उत्तराधिकारी?

हालांकि राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा की राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं काफी बड़ी हैं लेकिन वो अपने समुदाय के वोटों का समीकरण कैसे अपने पक्ष में बिठा पाते हैं, इस इम्तिहान का नतीजा ही उनकी मंज़िल तय करेगा.

News18Hindi
Updated: April 24, 2019, 4:32 PM IST
ANALYSIS: बिहार की सियासत में कुशवाहा खुद को क्यों मानते हैं लालू-नीतीश का उत्तराधिकारी?
उपेंद्र कुशवाहा.
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Updated: April 24, 2019, 4:32 PM IST
(अशोक मिश्रा)

पिछले साल नवंबर में, राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के इस दावे ने सियासी गलियारों में खलबली पैदा कर दी थी कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सत्ता में संतुष्टि के उस स्तर पर पहुंच चुके हैं कि अब वो 2020 के विधानसभा चुनाव के बाद वो पद छोड़ देंगे. कुशवाहा ने ये भी दावा किया था कि 15 साल सत्ता में रहने के बाद अब नीतीश खुद सीएम नहीं बने रहना चाहते.

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कुशवाहा के ऐसे दावों के बाद नीतीश बेहद खफा हुए थे और धीरे धीरे ये भी खुलासा हुआ कि कुशवाहा के इस दावे के पीछे खुद सीएम बनने की उनकी गुप्त इच्छा थी. कुशवाहा ने स्पष्ट रूप से ये भी कहा था कि बिहार में 15 साल 'यादवों ने राज' किया और फिर 15 साल तक 'कुर्मियों ने सत्ता' संभाली इसलिए अब 'को​री' समुदाय बिहार के सिंहासन पर काबिज़ हो, वो वक्त आ गया है.

ऐसे दावों का खामियाज़ा कुशवाहा को ये हुआ कि एनडीए ने उनसे दूरी बनाना शुरू की. उनकी गुप्त राजनीतिक महत्वाकांक्षा के उजागर होने के बाद एनडीए नेताओं ने उन्हें अपने गठबंधन से बाहर का रास्ता दिखाया. अब ये नीतीश की ज़िद थी या वजह कुछ और थी, लेकिन भाजपा ने कुशवाहा को एनडीए की हदों से बाहर कर दिया.

नीतीश से तनातनी और एनडीए से रूठने की कहानी
पूरा माजरा ये था कि नीतीश कुमार ने भाजपा के साथ अपने 17 साल के संबंधों को दरकिनार करते हुए जून 2013 में एनडीए से अलग होने का फैसला किया था. तभी से कुशवाहा और नीतीश के बीच तनातनी शुरू हुई और कुशवाहा ने जेडीयू छोड़कर अपनी पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी का गठन किया और बाद में एनडीए में शामिल हुए. इसके बाद एनडीए में 2017 में नीतीश की वापसी हो गई, तो कुशवाहा इस बात पर एनडीए से रूठे हुए थे.
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एक ज़माना वो भी था कि नीतीश ही कुशवाहा के राजनीतिक मार्गदर्शक रहे थे. 2004 में बिहार विधानसभा में कुशवाहा को नीतीश ने ही नेता प्रतिपक्ष बनवाया था, जबकि उस वक्त कुशवाहा पहली बार विधायक बने थे. फिर कुशवाहा राज्यसभा सांसद भी बनाए गए थे.

जब कुशवाहा ने किए नीतीश के पार्टी से बड़े होने के दावे
फिर एक मोड़ आया जब 2014 के लोकसभा चुनावों में काराकाट सीट से कुशवाहा सांसद चुने गए. साथ ही उनकी पार्टी के दो और प्रत्याशी रामकुमार शर्मा और अरुण कुमार क्रमश: सीतामढ़ी और जहानाबाद सीट से चुने गए. इसके बाद कुशवाहा ने पूरे दंभ के साथ ताल ठोककर कहना शुरू किया कि उनकी नई पार्टी नीतीश की जेडीयू से बड़ी पार्टी है क्योंकि जेडीयू के सिर्फ दो सांसद हैं जबकि उनके तीन.

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हालांकि कुशवाहा बड़ी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं रखते हैं, लेकिन अभी ये इम्तिहान बाकी है कि क्या वो सच में अपनी जाति के वोटों को अपने गठबंधन के लाभ के लिए जीत में बदल सकते हैं या नहीं. आंकड़ों के हिसाब से कुशवाहा के समुदाय की आबादी बिहार में पिछड़े कुर्मियों की आबादी से ज़्यादा है, जिसका प्रतिनिधित्व नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद यादव से अलग होने के बाद किया.

इसके बाद फिर उस खबर ने सनसनी मचाई थी कि रालोसपा में ​पैसे लेकर टिकट दिए जाते हैं, लेकिन कुशवाहा ने इस तरह की बातों का हमेशा पुरज़ोर खंडन किया.

ये चुनाव तय करेगा कुशवाहा का भविष्य
इस लोकसभा चुनाव में रालोसपा महागठबंधन में शामिल है और उसे पांच सीटों से प्रत्याशी खड़े करने के लिए हरी झंडी मिली है जिनमें काराकाट, उजियारपुर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण और जमुई शामिल हैं. इन पांच में से दो सीटों पर यानी काराकाट के साथ ही उजियारपुर से खुद कुशवाहा ही प्रत्याशी हैं.

कुशवाहा इस लोकसभा चुनाव में दो सीटों से क्यों लड़ रहे हैं? ये चर्चाएं ज़ोरों पर हैं. काराकाट में अगड़ी जातियों की संख्या अच्छी खासी है और माना जाता है कि यहां एनडीए समर्थक भी ज़्यादा हैं. इसके अलावा, उजियारपुर में पिछड़ी जातियों, खासकर कुशवाहा के कोरी समुदाय की आबादी अच्छी खासी है.

कुशवाहा कई बार कह चुके हैं कि वो दो सीटों से चुनाव काराकाट से हार जाने के डर के कारण नहीं लड़ रहे हैं बल्कि ये साबित करने के लिए लड़ रहे हैं कि जेडीयू और बीजेपी को सबक मिले और दोनों ने मिलकर कुशवाहा के राजनीतिक करियर को खत्म करने की जो साज़िश की, वह नाकाम साबित हो. कुशवाहा ने दावा किया कि वो काराकाट से जेडीयू प्रत्याशी और उजियारपुर से बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय को बुरी तरह पटखनी देंगे.

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बाकी सीटों पर रालोसपा की तरफ से भूदेव चौधरी लोजपा के वर्तमान सांसद चिराग पासवान के खिलाफ पहले चरण के मतदान में उतर चुके हैं. वहीं, भाजपा के वर्तमान सांसद डॉ संजय जायसवाल के खिलाफ पश्चिमी चंपारण से ब्रजेश कुशवाहा, केंद्रीय मंत्री राधामोहन सिंह के खिलाफ पूर्वी चंपारण से आकाश सिंह आने वाले चरणों में मुकाबला करने जा रहे हैं.

पूर्वी चंपारण में आकाश कुमार सिंह के नामांकन के पीछे कुशवाहा ही रहे और ये भी कहा जा रहा है कि कुशवाहा ने अपने दो खास साथियों माधव आनंद और प्रदीप मिश्रा को सीट के लिए वादा भी किया था.

और कुशवाहा की वो 'खीर' थ्योरी
चुनाव से कुछ समय पहले ही कुशवाहा का अहम भूमिका में उभरना साफ संकेत है कि वो अपनी ताकत का एहसास करवाने वाले हैं और अपनी जाति के वोटों के लिहाज़ से अपनी पसंद का इज़हार कर सकते हैं. सियासी गलियारों में चर्चा गर्म है कि क्या कुशवाहा की राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत हासिल करने की चेष्टा रंग लाएगी?

कुशवाहा ने खीर की थ्योरी देकर भी एक और दांव खेला है. उन्होंने कहा है कि 'स्वादिष्ट खीर तभी बन सकती है जब यादवों के यहां से दूध आए और कोरियों के यहां से चावल'. आंकड़े बताते हैं कि बिहार में कोरियों की कुल आबादी राज्य की कुल आबादी का 6 फीसदी हिस्सा है और यादवों की आबादी 12 फीसदी है.

ये तय है कि 1990 के बाद से ही कुशवाहा अपनी सियासी महत्वाकांक्षाएं पूरी करने की कोशिश में जुटे हैं लेकिन उनका ख्वाब पूरा होगा या नहीं, ये इस पर निर्भर करेगा कि इस लोकसभा चुनाव में रालोसपा कैसा प्रदर्शन कर पाती है. इस प्रदर्शन पर उनके सियासी जीवन के बचे रहने की उम्मीदें भी निर्भर करती हैं.

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First published: April 24, 2019, 4:22 PM IST
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