क्या चंद्रशेखर की राजनीतिक पारी से खत्म हो जाएगा BSP का दलित वोटों पर एकाधिकार

क्या चंद्रशेखर की राजनीतिक पारी से खत्म हो जाएगा BSP का दलित वोटों पर एकाधिकार
मौजूदा दौर में मायावती की राजनीतिक साख गिरती जा रही है और दलित पॉलिटिक्स में एक वैक्यूम बन गया है.

क्या उत्तर प्रदेश के अगले विधानसभा चुनाव (Assembly Election) में दलित राजनीति का चेहरा बदलने वाला है? और क्या ये मायावती (Mayawati) के लिए बड़ा झटका साबित होगा? पढ़िए डिजिटल प्राइम टाइम.

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बीएसपी सुप्रीमो मायावती (Mayawati) को जिस बात का डर था वही होने जा रहा है. भीम आर्मी के मुखिया चंद्रशेखर (Chandrasekhar) ने सक्रिय राजनीति में आने की घोषणा कर दी है. ऐसे में सवाल ये है कि क्या 2022 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों तक चंद्रशेखर राज्य की राजनीति में बहुजन समाज पार्टी और मायावती का विकल्प बन पाएंगे? ये सवाल इसलिए है क्योंकि चंद्रशेखर के आंदोलन अभी तक सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक सीमित रहे हैं. वहीं उत्तर प्रदेश के करीब 20 फीसदी वोटर मायावती को अब भी सीधा वोट करते हैं, चाहे पार्टी जीते या हारे.

आखिर बीएसपी कैसे बनी दलितों का चेहरा
कांशीराम ने जिस तरह भीमराव आंबेडकर के सहारे बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) को दलितों का चेहरा बनाया उसका अंदाजा उस दौर के राजनीतिक जानकार नहीं लगा पाए. 14 अप्रैल 1984 को जब कांशीराम ने बहुजन समाज पार्टी की स्थापना की तो किसी को उम्मीद नहीं थी ये पार्टी राष्ट्रीय पार्टी बन जाएगी. लेकिन स्थापना के बाद हुए 1989 में पहले लोकसभा चुनावों में बीएसपी ने 4 सीटें जीतकर सबको चौंका दिया. पार्टी के पहले लोकसभा चुनाव में ही उत्तर प्रदेश में 3 और पंजाब में एक सीट मिली. 2009 के लोकसभा चुनावों में तो पार्टी ने उत्तर प्रदेश में 20 और मध्य प्रदेश में 1 सीट जीत कर देश की राजनीति का समीकरण बदल दिया. एक दौर तो ऐसा भी आया कि लेफ्ट और विपक्ष के नेताओं ने बीएसपी सुप्रीमो मायावती को देश की प्रधानमंत्री का चेहरा तक प्रोजेक्ट कर दिया.

मायावती के पीएम चेहरा प्रोजेक्ट होने के बाद गिरा बीएसपी का ग्राफ
लेकिन यहीं से बीएसपी के पतन की कहानी भी शुरू होती है. इसके बाद 2014 में हुए लोकसभा चुनावों में पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल पाई. हालंकि 2019 में एसपी से गठबंधन के साथ वापसी करते हुए पार्टी लोकसभा में 10 सीटों तक पहुंच गई. बात करें उत्तर प्रदेश की तो 1993 में अपने पहले चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाली बीएसपी ने 2007 में तो सबको चौंकाते हुए 30 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट पाकर 403 सीटों वाली विधानसभा में स्पष्ट जनादेश हासिल कर लिया. पार्टी को 206 सीटें मिलीं, लेकिन 2007 में पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आने के बाद पार्टी का जनाधार जिस तेज़ी से गिरने लगा उसे पार्टी सुप्रीमो मायावती अब तक रोक नहीं पाईं. 2012 के चुनाव में पार्टी जहां 80 सीटों पर सिमट गई वहीं 2017 में बीएसपी सिर्फ़ और सिर्फ़ 19 सीटें ही जीत पाई.



यहां सवाल ये उठता है कि अपनी स्थापना के लिए सिर्फ 25 सालों बाद पीएम पद का दावेदार और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य की सत्ता पर स्पष्ट बहुमत हासिल करने वाली पार्टी 10 सालों बाद उसी विधानसभा में सिर्फ़ 5 फीसदी सीटों पर क्यों सिमट गई. सवाल और भी हैं क्योंकि इस पार्टी की स्थापना करने वाले चेहरे जो कभी कांशीराम के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते थे पार्टी का साथ छोड़ते जा रहे हैं. 2020 आते-आते ये पार्टी सिर्फ़ मायावती और उनके परिवार की पार्टी होती दिख रही है. पार्टी के अहम पदों पर परिवार के लोगों का क़ब्ज़ा होता जा रहा है और इसी बहाने पार्टी के पुराने नेता एक-एक कर पार्टी का दामन छोड़ रहे हैं.

अब भी बीएसपी के पास दलित वोटों का मजबूत जनाधार
हालांकि 2019 आते-आते पार्टी लोकसभा और विधानसभा में सीटों के लिहाज से काफी नीचे जा चुकी है लेकिन उसका जनाधार उत्तर प्रदेश में 20 फ़ीसदी के आस-पास पर टिका हुआ है. पिछले लोकसभा चुनाव को भी देखें तो BSP को क़रीब 20 फ़ीसदी वोट ही मिले हैं. ऐसे में माना ये जा रहा है कि भले मायावती चुनाव दर चुनाव हार रही हों और सत्ता से बाहर जा रही हैं लेकिन उनका दलित वोटों का जनाधार फ़िलहाल नहीं खिसक रहा है. ऐसे में भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर के पार्टी बनाने के फैसले ने मायावती की बेचैनी बढ़ा दी थी क्योंकि मायावती सत्ता में रहे न रहें. लेकिन दलित मतदाताओं पर उनकी पकड़ हमेशा राजनीति में उनकी उपस्थिति दर्ज कराती रहती है. यही वो कारण है कि सत्ता में बैठे लोग उनकी अनदेखी नहीं कर पाते. जब भी चुनाव आता है राजनीतिक पार्टियां, स्थानीय नेता हो या धन्ना सेठ सभी मायावती की हाथी की सवारी के सहारे सदन में पहुंचने की कोशिश करते देखे जाते हैं और इन्हीं मौकों पर मायावती पर पैसा लेकर टिकट बेचने, अपने मंत्रियों से पैसा वसूलने और तमाम तरह के भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं. लेकिन इन आरोपों का असर मायावती के मतदाताओं पर पड़ता कभी नहीं दिखा लेकिन चंद्रशेखर आज़ाद के उदय के साथ ही मायावती को दलितों में बंटवारे का डर सताने लगा था इसलिए वो लगातार उनका विरोध कर रही थीं.

मायावती को कितना नुकसान पहुंचा पाएंगे चंद्रशेखर 
पिछले 3 चार सालों में चंद्रशेखर आज़ाद जिस तरह दलितों को लेकर आक्रामक हुए हैं, लगातार आंदोलन कर रहे हैं उससे साफ़ है कि युवा वर्ग में उनकी लोकप्रियता बढ़ी है. जबकि इसी समय में बीएसपी सुप्रीमो मायावती सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस और ट्विटर पर सिमटती दिख रही हैं. सक्रिय राजनीति में उनकी उम्र का असर भी दिखने लगा है. पार्टी में कांशीराम और मायवती के करीबी रहे नेता एक-एक कर पार्टी छोड़ कर जा चुके हैं लेकिन फिर भी मायावती को कमजोर आंका नही जा सकता. क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में चंद्रशेखर अभी सिर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित हैं जबकि मायावती ने बीएसपी को अब तक राष्ट्रीय पार्टी बना रखा है.
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