क्या राम मंदिर समारोह में उद्धव भाग लेंगे? शिवसेना-कांग्रेस-NCP गठबंधन का एक और अजीब क्षण

क्या राम मंदिर समारोह में उद्धव भाग लेंगे? शिवसेना-कांग्रेस-NCP गठबंधन का एक और अजीब क्षण
11 नवंबर, 2019 की फाइल फोटो में, भक्त अयोध्या में एक मंदिर की ओर प्रार्थना करते चलते हुए (AP फोटो / राजेश कुमार सिंह)

जिस तरह शिवसेना (Shiv Sena) फिलहाल कांग्रेस (Congress) और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (NCP) के साथ असंभव से गठबंधन में है, उसे अतीत के बोझ से भी निपटना पड़ रहा है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: July 26, 2020, 10:56 PM IST
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(धवल कुलकर्णी)

मुंबई. यह इतिहास का एक हिस्सा (part of history) है जिसे शिवसेना (Shiv Sena) गर्व के साथ याद करती है और अक्सर इस हद तक दोहराती है कि चिढ़ हो जाये. दिसंबर 1992 में, जब अयोध्या (Ayodhya) में बाबरी मस्जिद (Babri Masjid) को कारसेवकों की उन्मादी भीड़ ने गिरा दिया, तो भारतीय जनता पार्टी (BJP) के वरिष्ठ नेता सुंदर सिंह भंडारी ने शिवसैनिकों को उस कार्रवाई के लिए दोषी ठहराने की कोशिश की थी, जो आगे सांप्रदायिक दंगों (Communal Riots) का एक चक्र रचने वाली थी.

जिसके बाद संभावित कानूनी पचड़ों से बिना डरे तत्कालीन शिवसेना प्रमुख (Shiv Sena Chief), दिवंगत बाल ठाकरे ने कहा था कि अगर वास्तव में उनके सैनिकों ने मस्जिद (Mosque) को ध्वस्त किया है, तो उन्हें इसका गर्व था क्योंकि यह माना जाता है कि इसे मुगल सम्राट बाबर (Babar) ने राम मंदिर (Ram Mandir) के स्थान पर बनवाया था.



सेक्युलर पार्टियों से गठबंधन के बीच शिवसेना को चरित्र बचाने की चुनौती
जिस तरह शिवसेना फिलहाल कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के साथ असंभव से गठबंधन में है, उसे अतीत के बोझ से भी निपटना पड़ रहा है. इन विरासती मुद्दों में से एक हिंदुत्व के लिए शिवसेना की प्रतिबद्धता है, जो कांग्रेस और एनसीपी के 'धर्मनिरपेक्ष’ चरित्र के विपरीत है.

राकांपा प्रमुख और पूर्व केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने अपने एक बयान से तब विवाद खड़ा कर दिया था, जब उनसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में अगस्त के पहले सप्ताह में अयोध्या में राम मंदिर के शिलान्यास समारोह के बारे में पूछा गया था. पवार ने सवाल किया था कि जहां भगवान राम का जन्म हुआ था, वहां मंदिर निर्माण कोविड-19 महामारी को नियंत्रित करेगा. उन्होंने लॉकडाउन के आर्थिक नतीजों पर ध्यान केंद्रित करने की कोशिशों पर भी जोर दिया था.

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शरद पवार कांग्रेस की छूटी जमीन को पार्टी हित में लाना चाह रहे?
सीधी-सपाट बात के अलावा, इसे पवार के अपनी पार्टी के विस्तार के लिए किए जा रहे सोचे-समझे प्रयासों से भी जोड़ा गया है. अपने राष्ट्रीय चेहरे के बावजूद, एनसीपी को महाराष्ट्र में भूमि-मालिक, प्रभावी मराठा समुदाय के संगठन के रूप में देखा जाता है. एनसीपी दलितों और मुस्लिमों के वर्गों के बीच अपने आधार का विस्तार करने की कोशिश कर रही है, जो पारंपरिक रूप से तेजी से सिकुड़ रही कांग्रेस के साथ जुड़े रहे हैं.

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जैसा कि पवार की ओर से पुणे के एलगार परिषद की जांच और भीमा-कोरेगांव में दलित प्रदर्शनकारियों पर हुई हिंसा को लेकर आये बयानों से स्पष्ट है. ये समुदाय हिंदुत्व के बढ़ते ज्वार में असहज हैं, जिनमें से राम मंदिर इनकी चेकलिस्ट पर एक महत्वपूर्ण बात है. (ये लेखक के निजी विचार हैं.)
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