स्टालिन के सीएम बनने के सपने पर पानी फेर देगा 2021 के तमिलनाडु चुनाव में उदयनिधि का उद्भव?

करूणानिधि के जीवन के अंतिम दिनों में स्टालिन ने पार्टी का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया था.
करूणानिधि के जीवन के अंतिम दिनों में स्टालिन ने पार्टी का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया था.

उदयनिधि (Udayanidhi) के आने से निश्चित रूप से विपक्ष को वंशवाद की राजनीति (Dynastic politics) का आरोप लगाने का मौका मिलेगा और हिंदुत्व की विचारधारा (Hindutva ideology) के खिलाफ वैचारिक अभियान इसमें पीछे चला जाएगा. सवाल यह भी है कि क्या पिता की मजबूरियां समझते हुए बेटा पीछे हटेगा? इतिहास कुछ और ही कहानी कहता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 26, 2020, 2:51 PM IST
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चेन्नई. द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके पार्टी (DMK Party) के मुखिया एमके स्टालिन (MK Stalin) के लिए मुख्यमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पूरा करने के लिए 2021 का विधानसभा चुनाव में आखिरी मौका हो सकता है. इसके अलावा स्टालिन के लिए अपने बेटे उदयनिधि (Udayanidhi) को राजनीति में शानदार तरीके से प्रवेश दिलाने की चुनौती भी रहेगी. पार्टी 2011 से अब तक सत्ता में नहीं आई है और यह चुनाव उन्हें बनाने या बिगाड़ने का काम कर सकता है. सियासी रणनीतिकारों का मानना है कि उदयनिधि स्टालिन को राजनीति में लाने का यह सबसे खराब समय है. उनका मानना है कि उदयनिधि को लाने से विपक्ष को वंशवाद की राजनीति पर एक जोरदार अभियान का मौका मिल जाएगा.

भरोसेमंद रिपोर्ट्स की मानें तो डीएमके में लाए गए नए रणनीतिकारों ने एमके स्टालिन से सीधे कहा है कि इस समय उदयनिधि को राजनीति में नहीं लाना ही बेहतर है. एक राजनीतिक महत्वकांक्षी बेटे को मैदान से दूर रखना भी आसान काम नहीं है. यह किसी से छुपा नहीं है कि उदयनिधि तमिल सिनेमा में खुद की बनाई फिल्मों में मुख्य किरदार निभाते हैं और अब वह राजनीति में आकर खुद को भविष्य में पार्टी के लीडर के रूप में प्रोजेक्ट कर रहे हैं. पार्टी सूत्रों के अनुसार कुछ ऐसे ग्रुप हैं जो उदयनिधि में महत्वाकांक्षा भरने का काम कर रहे हैं. चेन्नई की थाउजैंड लाईट विधानसभा से स्टालिन के बेटे का नामांकन भरे जाने की खबरे हैं.

उदयनिधि के आने से निश्चित रूप से विपक्ष को वंशवाद की राजनीति का आरोप लगाने का मौका मिलेगा और हिंदुत्व की विचारधारा के खिलाफ वैचारिक अभियान इसमें पीछे चला जाएगा. सवाल यह भी है कि क्या पिता की मजबूरियां समझते हुए बेटा पीछे हटेगा? इतिहास कुछ और ही कहानी कहता है.



डीएमके में प्रमुख पदों पर 2009 में स्टालिन का आना इसलिए संभव हुआ क्योंकि वह अड़ गए थे और अपने पिता पर उनका नियंत्रण था. यहाँ तक की शुरुआत में भी कई बड़े नेताओं के चले जाने के बाद भी उन्होंने खुद पर जोर दिया. 1990 में वायको चले गए थे और उसके बाद भी कई नेता पार्टी छोड़ गए हैं.
करुणानिधि के जीवन के अंतिम दिनों में स्टालिन ने पार्टी का पूरा नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया था और पिता तक भी पहुँच बना ली थी. चुनौती देने वाले लोगों को पार्टी छोड़कर जाना पड़ा. 2016 के विधानसभा चुनाव में पार्टी की हारने की आशंका के बाद भी टिकट वितरण में स्टालिन इंचार्ज थे. उनके नेतृत्व पर किसी ने भी कोई सवाल खड़ा नहीं किया. यहां ध्यान देने वाली बात यह भी है कि 2016 में जयललिता ने दूसरी बार जीतकर डीएमके और एआईडीएमके की 1989 से चल रहे वैकल्पिक जीत के सिलसिले को तोड़ दिया था.

करुणानिधि और जयललिता की मृत्यु के बाद स्टालिन ने पार्टी में अपनी पकड़ मजबूत की. 2019 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस के साथ बैठने के बाद उन्हें कई सीटों पर जीत मिली. भाजपा को पूर्ण बहुमत मिलने के कारण उनके सांसदों को संसद में विपक्ष की सीटों पर बैठना पड़ा. स्टालिन ने पार्टी पर मजबूत पकड़ बनाई है लेकिन सवाल यह है कि क्या उनकी राजनीति पर बेटा पकड़ बनाएगा. उदयनिधि को चुनाव लड़ाना पार्टी के भविष्य के लिए एक साफ़ संकेत हो सकता है. वंशवाद डीएमके में नया नहीं है. स्टालिन अपने पिता करुणानिधि की तरह नहीं हैं जो द्रविड़ समुदाय के जमीनी स्तर से आए थे. उनके पास बेटे की वृद्धि से बचने का कद था लेकिन क्या स्टालिन को यह सूट करता है?
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