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राज्यों में तेजी से नेतृत्व परिवर्तन, भाजपा आज वही कर रही जो पहले कभी कांग्रेस की रणनीति थी

कर्नाटक में गौर करने वाली बात ये है कि मंत्रालय बनाने में केद्रीय नेतृत्व का स्पष्ट प्रभाव था. (फाइल फोटो)

कर्नाटक में गौर करने वाली बात ये है कि मंत्रालय बनाने में केद्रीय नेतृत्व का स्पष्ट प्रभाव था. (फाइल फोटो)

2014 के बाद से भाजपा ने जब भी नेतृत्व में बदलाव किया है या किसी नए मुख्यमंत्री का नाम लिया है तो वो हमेशा इसी तरह चौंकाने वाला रहा है. चाहे फिर बात हरियाणा, झारखंड की हो या फिर उत्तरप्रदेश, गोवा, उत्तराखंड, कर्नाटक या फिर गुजरात की.

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    संदीप शास्त्री

    नई दिल्ली: बदलाव ही है जो स्थिर है. अगर भारतीय राजनीति की बात की जाए जो यह यहां का नया नियम बन चुका है. अगर भारत के बड़े दलों के पिछले कुछ वक्त का खाका खींचे तो यही मंत्र बाहर निकल कर आता है. ये बात खासतौर पर भाजपा और कांग्रेस के लिए लागू होती है. राष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह से केबिनेट में बदलाव देखने को मिला उसने ये साबित कर दिया है कि बेहतर काम और वफादारी ही वो अहम पहलू हैं जो तय करेंगे की कौन रहेगा और कौन जाएगा. पिछले कुछ महीनों में भाजपा ने तीन बड़े राज्यों मे अपने सिपहसालारों में बदलाव किया. तो यही बदलाव पंजाब में कांग्रेस में देखने को मिला.

    कर्नाटक में जनता दल (सेक्युलर) लगातार अपने साझेदारों में बदलाव करता रहा है. कभी वो कांग्रेस के पाले में बैठ जाते हैं और अगले ही पल भाजपा का दामन थामे नज़र आते हैं. विभिन्न स्थानीय निकायों में वे अलग दलों के साथ गठबंधन करते हुए नजर आते हैं. और राज्य एवं राष्ट्रीय राजनीति में अपना पक्ष लगातार बदलते रहते हैं. पश्चिम बंगाल में ही देखिए तृणमूल कांग्रेस के वापस सत्ता में आते ही हमने कई भाजपा नेताओं को वापस टीएमसी में जाते हुए देखा. बाबुल सुप्रियो इसका ताजातरीन उदाहरण हैं. शिवसेना ने महाराष्ट्र में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस और एनसीपी के साथ हाथ मिला लिया. गुजरात में मुख्यमंत्री के साथ नए मंत्री परिषद की स्थापना बताती है कि बदलाव ही एकमात्र स्थिर है.

    गुजरात में हुए घटनाक्रम ने सभी राजनीतिक पंडितों का ध्यान खींचा है. सबसे पहले अचानक ही मुख्यमंत्री विजय रुपाणी ने इस्तीफा सौंप दिया. उसके बाद अगला मुख्यमंत्री कौन होगा इसे लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही थीं. उस दौरान मैंने प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में स्पष्ट कहा था कि भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व कई चौंकाने वाले नाम लेकर आएगा. संभावित पद के लिए जिन उम्मीदवारों का नाम लिया गया उन्होंने भी नहीं सोचा होगा कि उनके नाम का इतना प्रचार नहीं किया गया था. 2014 के बाद से भाजपा ने जब भी नेतृत्व में बदलाव किया है या किसी नए मुख्यमंत्री का नाम लिया है तो वो हमेशा इसी तरह चौंकाने वाला रहा है. चाहे फिर बात हरियाणा, झारखंड की हो या फिर उत्तरप्रदेश, गोवा, उत्तराखंड, कर्नाटक या फिर गुजरात की (दोनों बार, पहले विजय रूपाणी और अब भूपेंद्र पटेल).

    कुछ कुछ मायनों में ये 1970 और 1980 के दौरान की कांग्रेस पार्टी की याद दिलाता है. कांग्रेस की राज्य सरकारें हाइकमांड की इच्छा पर लगातार मुख्यमंत्रियों में बदलाव देख रही थीं. केंद्रीय पर्यवेक्षकों ने नए विधायक दल के चुने हुए नेता का नाम लिया. ये वो कहानी है जो कांग्रेस में हाइकमांड के बारे में अक्सर सुनाई जाती है. तो राज्य में नेतृत्व में बदलाव होना था लेकिन हाइकमांड नए नेता को लेकर निश्चित नहीं थे. विधायक दल की मीटिंग तय हो चुकी थी, केंद्रीय पर्यवेक्षक दिल्ली से राज्य की राजधानी की ओर रवाना हो गए थे. उनके पास तीन लिफाफे थे. जिसमें तीन अलग नाम बंद थे. उन्हें अंतिम फैसले तक इंतजार करने के लिए कहा गया था. तो आगे कुछ ऐसा हुआ कि पर्यवेक्षक ने गलत लिफाफा खोला और नाम की घोषणा कर दी. वो व्यक्ति सर्वसम्मति से चुना गया और दो साल तक मुख्यमंत्री के पद पर आसीन रहा.

    गुजरात में मुख्यमंत्री में बदलाव ही केवल हैरानी की वजह नहीं था, वहां कुछ और भी हैरान करने वाली बातें होनी थीं. मुख्यमंत्री उस मंत्रालय का नेतृत्वत करने वाले थे जिसमें पिछली मंत्री परिषद का कोई मंत्री नहीं था. केंद्रीय नेतृत्व का आदेश तब साफ हो गया जब रूपाणी मंत्रालय के मंत्रियों ने सार्वजनिक तौर पर व्यापक परिवर्तनों की सराहना की और वो अपने उत्तराधिकारियों के शपथ समारोह में उपस्थित भी रहे. केंद्रीय नेतृत्व के आदेश की झलक कई बार देखने को मिली है. जब केंद्रीय मंत्रीपरिषद में फेरबदल हुआ था तब भी और जब उत्तराखंड, कर्नाटक और अब गुजरात में बदलााव हुआ तब भी.

    कर्नाटक और गुजरात में जो कुछ हुआ उसमें अहम अंतर और समानताएं
    बदलाव का वक्त पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व द्वारा पहले से ही तय कर लिया गया था. नए नेता के चयन पर भी केंद्रीय नेतृत्व की पहले से ही मुहर लगी हुई थी. कर्नाटक में 1989 से ही हर पांच साल में पार्टी का बदलाव हो जाता है. जबकि गुजरात में अगले साल भाजपा तीन दशक के बाद फिर से जनता के बीच होगी. नया मंत्रीपरिषद लेकर पार्टी का प्रयास फिर से सत्ता में आने की कोशिश और सत्ता विरोधी लहर को शांत करने का एक तरीका है. इस तरह से वो सत्ता विरोधी लहर को दूर करते हुए जनता के सामने मंत्रियों का एक नया सेट पेश करना चाहती है. अब इनकी ये रणनीति कुछ काम करती है या नहीं ये देखने के लिए अगले साल तक इंतज़ार करना होगा.

    कर्नाटक में गौर करने वाली बात ये है कि मंत्रालय बनाने में केंद्रीय नेतृत्व का स्पष्ट प्रभाव था. और मुख्यमंत्री का उपमुख्यमंत्री से नहीं जोड़ना औऱ पुरानी टीम के मूल को बनाए रखते हुए नए लोगों को जोड़ना उनकी रणनीति थी. कर्नाटक में भाजपा को कभी भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला है. इसलिए वहां एक संतुलित कार्य ज़रूरी था.

    कांग्रेस में ही ऐसा ही कुछ देखने को मिला. उनके लंबे समय से पंजाब के मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दे दिया. हाइकमांड ने नए नेतृत्व की घोषणा की है. हालांकि केंद्रीय नेतृत्व में कमजोरी की वजह से हाइकमांड की कमांड कमजोर नजर आती है. पंजाब में यह साफ देखा जा सकता है. इसी के चलते राजस्थान और छत्तीसगढ़ पर भी पैनी नजर बनी हुई है. कांग्रेस में पहले भी ऐसा हुआ है जब नेता पार्टी छोड़ कर चले गए और अपने दल का गठन किया है. आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल में ऐसा हो चुका है.

    इसी तरह मध्यप्रदेश की सरकार भी गिर गई और असम में भी पूर्व में कांग्रेस का नेतृत्व था और आज वहां भाजपा का मुख्यमंत्री मौजूद है. जब तक कांग्रेस अपने केंद्रीय नेतृत्व में स्पष्टता और निर्णायकता का भाव नहीं लाती है. तब तक निचले स्तर पर होने वाले बदलावों में उन्हें हिचकोले खाने पड़ेंगे. हमारे सामने बदलाव के दो मॉडल मौजूद हैं. एक भाजपा का और दूसरा कांग्रेस का. आने वाले महीनों में अगले साल होने वाले चुनाव में राजनीति जिस तरह आकार लेती है, वह इन परिवर्तनों के प्रभाव को परिभाषित करेगा. (लेखक जागरण लेकसिटी यूनिवर्सिटी, भोपाल के कुलपति हैं. इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं)

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