Analysis: इधर के रहे न उधर के, चंद्रबाबू नायडू के लिए क्या बंद हो चुके हैं सारे रास्ते?

Analysis: इधर के रहे न उधर के, चंद्रबाबू नायडू के लिए क्या बंद हो चुके हैं सारे रास्ते?
सांकेतिक चित्र

चुनावों से पहले एनडीए की कश्ती से उतरकर यूपीए की नाव में कूदने वाले टीडीपी प्रमुख नायडू ने विधानसभा चुनाव में तो मुंह की खाई ही, केंद्रीय राजनीति में भी उन्हें कोई भूमिका नहीं मिली. अब नायडू क्या करेंगे या क्या कर सकते हैं?

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आंध्र प्रदेश के नए मुख्यमंत्री के तौर पर जब जगनमोहन रेड्डी ने पिछले गुरुवार को शपथ ग्रहण की तो नज़ारा देखते ही बनता था. हिंदू, मुस्लिम और ईसाई संप्रदायों के पुरोहित जगनमोहन के लिए एक के बाद एक प्रार्थनाएं कर रहे थे. टीवी पर लाइव चल रहे इस शपथ ग्रहण के फौरन बाद युवजन श्रमिक रायतु कांग्रेस पार्टी के प्रमुख जगन ने पहला वादा ये किया कि ओल्ड एज पेंशन की रकम बढ़ाई जाएगी.

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लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बाज़ी बेहतरीन ढंग से जीतने वाले रेड्डी को जगन के नाम से पुकारा जाता है और उम्मीदों के साथ ही, जगन ने खुद भी इशारा दिया है कि वो बेहतरीन कामों में दिल लगाने वाले हैं, फिर चाहे वह रोज़गार पैदा करना हो या भ्रष्टाचार का खात्मा. शपथ ग्रहण के दौरान जगन के साथी और सलाहकार रहे तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर, तमिलनाडु में प्रभावशाली डीएमके के अध्यक्ष एमके स्टालिन मंच पर आसपास थे और साथ में कुछ और विशिष्ट मेहमान भी.



आंध्र प्रदेश में शानदार जीत के बाद अब जगन पदासीन हैं तो राज्य के तीन बार मुख्यमंत्री रह चुके तेलुगु देशम पार्टी के प्रमुख और कॉर्पोरेट की दुनिया में चहेते टेकसैवी सीएम कहे जाने वाले चंद्रबाबू नायडू की बात लाज़िमी है क्योंकि इस बार उन्होंने विपक्षी पार्टियों के साथ मिलकर भाजपा और मोदी के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला किया लेकिन हाथ कुछ नहीं आया.
ये दृश्य नायडू को कहां लाकर खड़ा करता है?
इस सवाल का जवाब ये है कि नायडू उसी मोड़ पर खड़े हैं, जहां उनके नए दोस्त राहुल गांधी खुद को खड़ा पा रहे हैं - इसे आप 'पॉलिटिकल वेस्टलैंड' यानी 'सियासत की बंजर ज़मीन' कह सकते हैं. जो नायडू को चाहते हैं या उनसे चिढ़ते हैं, उन सभी के लिए अब ये सवाल अहम है कि क्या नायडू वहां पहुंच चुके हैं, जहां उनके लिए सियासत की हर गली बंद हो चुकी है?

लेकिन, इस सवाल का जवाब आसान नहीं है. जवाब इससे तय होगा कि अब जगन एक सीएम के तौर पर क्या करेंगे और नायडू कैसे अपने अतीत की सफाई करेंगे. जो ये कह रहे हैं कि नायडू सियासत के 'डेड एंड' पर पहुंच चुके हैं, वो शायद अभी जल्दबाज़ी कर रहे हैं. कुछ ये तर्क दे रहे हैं कि नायडू अभी 69 साल के हो चुके हैं और 2024 के चुनाव के वक्त उनकी उम्र 74 साल की होगी, लेकिन वो लोग ये भूल रहे हैं कि चुनाव के नतीजे उम्र से तय नहीं हुआ करते. इरादों से होते हैं. और नायडू इससे नावाकिफ नहीं.

उत्तराधिकार और विश्लेषण पर भी सवाल
अब बात है जगन की, तो जगन भी कम मज़बूत इरादों वाले नहीं हैं. 2009 में हेलिकॉप्टर क्रैश में पिता की मृत्यु के बाद उन्होंने दस साल कांग्रेस और टीडीपी के साथ कड़ा मुकाबला करने के बाद ये मुकाम हासिल किया है. दूसरी तरफ, अगर नायडू की उम्र को एक मुद्दा मान भी लिया जाए, तो वो अपने बेटे और उत्तराधिकारी नारा लोकेश के लिए पार्टी और ज़मीन तो तैयार कर ही सकते हैं. हालांकि, अब तक ऐसे कोई संकेत नहीं हैं लेकिन ऐसा नहीं होगा, ऐसा भी नहीं है.

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चुनाव अभियान के दौरान जगन मोहन रेड्डी. फाइल फोटो


लोकेश साल 2009 से ही टीडीपी की पार्टी गतिविधियों में हिस्सा लेते देखे गए हैं. 2017 में नायडू ने लोकेश को अपनी राज्य सरकार में आईटी मंत्री का पद भी दिया था लेकिन इस बार लोकेश विधानसभा चुनाव में जगन की पार्टी के उम्मीदवार के खिलाफ हार गए.

किसी भी चीज़ से ज़्यादा ज़रूरी अब ये है कि नायडू अब अपनी पार्टी की बुरी हार का निर्ममता के साथ विश्लेषण करें. वो ये भी कर सकते हैं कि खुद को दिलासा दे दें कि उन्होंने कोशिश तो की थी लेकिन हार हुई तो क्या किया जाए! सच्चाई ये है कि नायडू भारत के सबसे मेहनती मुख्यमंत्रियों में शुमार रहे हैं, हालांकि उनका अर्थशास्त्र आधा ही उचित रहा है और राजनीति शास्त्र तो पूरा गलत.

नायडू को अपनी गलतियां कबूल करना ही होंगी
नौ साल तक सीएम रहने के बाद 2004 में नायडू चुनाव हार गए थे. इसका सबसे बड़ा कारण ये था कि अविभाजित आंध्र प्रदेश की राजधानी हैदराबाद को आईटी हब बनाने के अपने जुनून में नायडू ने गांवों के गरीबों को पूरी तरह से दरकिनार कर दिया था. लंबे इंतज़ार के बाद 2014 में जब नायडू फिर सीएम बने, तो उन्होंने इस असंतुलन को ठीक करने की कोशिश की, कम से कम वो तो ऐसा मान ही सकते हैं. लेकिन, राज्य के विभाजन के बाद अस्ल में हुआ ये कि अमरावती राजधानी बन गई. फिर नायडू ने कई तरह की लोकोन्मुखी योजनाएं लॉंच ज़रूर कीं, लेकिन वो अस्ल ज़रूरतमंदों तक पहुंची ही नहीं.

हाल में, वित्त मंत्री का पद संभालने वाली निर्मला सीतारमण के पति और पहले नायडू के मीडिया सलाहकार रह चुके परकाला प्रभाकर का कहना है कि : 'नायडू की सरकार में ऐसी योजनाओं की भरमार थी, जो कभी ज़रूरतमंदों तक पहुंची ही नहीं, सिर्फ कागज़ों पर चलती रहीं'.


अब जबकि, समय है कि नायडू पुनरावलोकन करें, तो उन्हें अपनी तमाम गलतियों को देखना होगा. नायडू की सरकार में हुआ भ्रष्टाचार, घोटाले, जनता के बीच ये विचार पनपना कि नायडू अपनी कम्मा जाति के ही हितैषी रहे, आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा दिलाने के मुद्दे पर नायडू के बदलते सुर, भाजपा और एनडीए छोड़कर कांग्रेस और यूपीए का दामन थामना... ये कुछ बातें हैं, जिन पर नायडू को अपने गिरेबान में झांकने की ज़रूरत पेश है.

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जल्द उठाने होंगे नायडू को कुछ कदम क्योंकि...
आखिरकार, जनता ने जगन के पक्ष में वोट किया. हालांकि अब तक जगन के पास अपने पिता की छवि और पिता का ही किया हुआ काम बतौर सनद है और साथ में, इस चुनाव के लिए उनका चुनाव प्रचार अभियान काफी हद तक उनकी जीत का कारण रहा है. अब जगन का काम सामने आना बाकी है. और, नायडू के लिए ज़रूरी होगा कि अगर हों तो वो जगन के काम की कमियों पर नज़र रखें.

नायडू इस बात से भी वाकिफ हैं कि अगर उन्होंने अपनी छवि को सुधारने के लिए ज़रा भी देर की, तो बहुत देर हो सकती है. वजह यही है कि टीडीपी और कांग्रेस की ज़बरदस्त हार के बाद आंध्र प्रदेश में जो एक खाली जगह बनी है, उसे हथियाने में भाजपा कतई नहीं चूकेगी. सीपीएम और कांग्रेस की खाली जगह का पूरा फायदा भाजपा ने पश्चिम बंगाल में उठाकर ये साबित कर ही दिया है.

लेख : फर्स्टपोस्ट.कॉम

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