राम मंदिर पर BJP बनाम कांग्रेसः भारतीय राजनीति से खत्म हो रहा है 90 के दशक का ट्रेंड!

लगभग सभी विपक्षी दलों ने यह तय किया है कि वे राम मंदिर पर बीजेपी के मुद्दों में शामिल नहीं होंगे.

News18.com
Updated: November 10, 2018, 5:53 PM IST
राम मंदिर पर BJP बनाम कांग्रेसः भारतीय राजनीति से खत्म हो रहा है 90 के दशक का ट्रेंड!
(Photo: PTI)
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Updated: November 10, 2018, 5:53 PM IST
सुमित पांडे

अयोध्या में राम मंदिर निर्माण पर समर्थन जुटाने के लिए विश्व हिंदू परिषद ने 80 के दशक की शुरुआत में दिल्ली के विज्ञान भवन में साधु संतों की पहली बैठक आयोजित की थी. उस वक्त इंदिरा गांधी देश की प्रधानमंत्री थीं और बहुत से लोगों ने विश्व हिंदू परिषद के अभियान पर ध्यान नहीं दिया था.

उसके कुछ साल बाद, बीजेपी ने हिमाचल प्रदेश में पार्टी के पालमपुर सम्मेलन में राम मंदिर को अपने राजनीतिक एजेंडे में शामिल किया. उस दौरान आरएसएस और बीजेपी नेताओं ने अयोध्या में विवादित स्थल पर मंदिर निर्माण के प्रति अपनी वचनबद्धता को व्यक्त किया. कैंपेन की सफलता और असफलता मौजूदा परिस्थितियों पर निर्भर करती है.

बीजेपी और आरएसएस नेता राम मंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले में देरी को लेकर चिंतित हैं. वहीं आगामी चुनावों को देखते हुए विपक्ष ने पूर्ववर्ती कदम उठाए हैं. हालांकि अभी तक यह सुनिश्चित नहीं है कि क्या अगले साल विधानसभा या लोकसभा चुनाव में यह सत्ता निर्माण का रास्ता बनेगा.

लगभग सभी विपक्षी दलों ने यह तय किया है कि वे राम मंदिर पर बीजेपी के मुद्दों में शामिल नहीं होंगे. हाल ही में इस मामले पर पत्रकारों से बातचीत करते हुए हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा ने कहा था कि अगर राम मंदिर बनाया गया तो वह दीपक जलाएंगे.

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वहीं इस मामले को लेकर समाजवादी पार्टी के नेता आजम खान काफी चर्चा में रहे हैं. उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपने गृह नगर रामपुर में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम की प्रतिमा लगाए जाने के समर्थन की बात कही थी. बयान में उन्होंने कहा था कि श्रीराम की मूर्ति सरदार पटेल की प्रतिमा से लंबी होनी चाहिए.
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उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने इस हफ्ते की शुरूआत में फैजाबाद का नाम बदलकर अयोध्या किए जाने के बाद अब वाराणसी की ओर रूख किया है. उसी दिन, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव खगरिया घाट पर गोवर्धन पूजा में भाग लेने के लिए पवित्र शहर वाराणसी पहुंचे थे.

इस समय आज़म खान और अखिलेश के बहुत से ऐसे बयान हैं जो बीजेपी के लिए उपयोगी है. सबसे खास बात यह है कि भारतीय मुस्लिम बोर्ड भी अयोध्या मामले में कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा है. यहां ध्रुवीकरण की राजनीति भी संकट में है. अगर एमआईएमआईएम नेता असदुद्दीन ओवैसी को छोड़ दिया जाए तो शायद विपक्ष ने इन मुद्दों में शामिल होने से इंकार कर दिया है.

उत्तर प्रदेश की जनता ने 2017 विधानसभा चुनाव में बीजेपी को तीन चौथाई बहुमत दिया था. भारतीय राजनीति में बहुत सी ऐसी चीजें हैं जो बदल चुकी हैं. अब राहुल गांधी मंदिर जाने लगे हैं. तेजस्वी यादव ने खुद की राजनीतिक जमीन तैयार की है. आजम खान ने अपने बयानों पर कंट्रोल किया है.

अब लगता है कि मंदिर मस्जिद जैसी राजनीति का समय पूरा हो गया है. अब एक युग का अंत हो रहा है. कांग्रेस और क्षेत्रीय पार्टियों के बीच में जो अल्पसंख्यकों की राजनीति थी उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है.
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