न सिद्धू झुक रहे न कैप्टन, जानें पंजाब में कांग्रेस के सामने क्या है सबसे बड़ा चैलैंज

नवजोत सिंह सिद्धू और कैप्टन अमरिंदर के बीच जारी राजनीतिक जंग रुकने का नाम नहीं ले रही है. (फाइल फोटो)

पंजाब में कैप्टन अमरिंदर अमरिंदर सिंह (Captain Amarinder Singh) और नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Siddhu) के विवाद के बीच कांग्रेस के पार्टी के वोट पर बैलेंस बनाना बड़ा चैलेंज है. दलित-जाट सिख वोटों पर पकड़ बनाए रखने के लिए कांग्रेस को कई कदम उठाने होंगे.

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नई दिल्ली. कैप्टन अमरिंदर सिंह (Captain Amarinder Singh) के साथ बैठक के ठीक एक दिन पहले बागी नेता नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Siddhu) का एक ट्वीट आया. इस ट्वीट में सिद्धू कहते दिख रहे हैं कि वो किसी पद की लालसा नहीं रखते. लेकिन सच ये है कि फरवरी में विधानसभा चुनाव से पहले इस वक्त जो कुछ विवाद चल रहा है, वो पद के लिए ही है. लड़ाई यही है कि राज्य का मुखिया का कौन होगा या फिर कांग्रेस का चेहरा कौन होगा.

पंजाब कांग्रेस में हालिया विवाद तब शुरू हुआ जब पार्टी के एक वर्ग ने तर्क दिया कि अगले साल विधानसभा चुनाव में कैप्टन अमरिंदर के नेतृत्व में जीत नहीं हासिल की जा सकती. मुख्यमंत्री के विरोधी इस बात नाराज हैं कि 2015 में कोटकपूरा पुलिस फायरिंग केस के दोषियों पर कार्रवाई नहीं हुई.

सिद्धू की दिलचस्पी डिप्टी सीएम बनने में नहीं है
अब अभी का जो विवाद चल रहा है उसका एक ये भी समाधान दिया गया है कि दो उपमुख्यमंत्री बना दिए जाएं जिनमें से एक सिद्धू हों. लेकिन सिद्धू के ट्वीट और न्यूज़18 के सूत्रों के मुताबिक सिद्धू की दिलचस्पी डिप्टी सीएम बनने में नहीं है. दरअसल वो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी का चेहरा बनना चाहते हैं. साथ ही राज्य कांग्रेस के अध्यक्ष. ये एक ऐसी मांग है जिस पर शायद ही पार्टी का आलाकमान राजी हो. सुनील जाखड़ साफ कर चुके हैं कि अगर टॉप लीडरशिप कहेगा तो वो अपना पद छोड़ने के लिए तैयार हैं.

सबसे बड़ा चैलेंज दलित और जाट सिख वोटों के बीच बैलेंस बनाने का
जाखड़ को कैप्टन अमरिंदर के बेहद नजदीकियों में शुमार किया जाता है. एक चुनावी राज्य में मुख्यमंत्री या तो खुद पार्टी का मुखिया रहना चाहेगा या फिर किसी ऐसे व्यक्ति को रखना चाहेगा जो उसका करीबी हो. क्योंकि कई बातों के अलावा टिकट वितरण को लेकर एक सामंजस्य बेहद जरूरी है. विजय इंदर सिंंगला जैसे नाम भी सामने आए हैं. विजय को कैप्टन और राहुल दोनों का करीबी माना जाता है. मनीष तिवारी को लेकर भी अटकलें हैं लेकिन कोई स्पष्टता नहीं है. कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा चैलेंज दलित और जाट सिख वोटों के बीच बैलेंस बनाने का है.

सिद्धू ने यह कहकर अपनी स्थिति मजबूत कर ली है कि वो किसी पद के लिए लड़ाई नहीं लड़ रहे हैं. सिद्धू ने इसे 'पंजाब की अस्मिता' की लड़ाई का रूप दे दिया है. सिद्धू ने आलोचना की है कि कोटकपूरा में पुलिस फायरिंग में ठीक तरीके से जांच नहीं हुई और बादल परिवार के खिलाफ नर्म रुख रखा गया. इसके जवाब में कैप्टन कह चुके हैं कि एसआईटी ने बादल परिवार को क्लीन चिट दे दी थी. लेकिन सिद्धू के इस तर्क को न मानने पर एक बार फिर से एसआईटी का गठन किया गया है. कैप्टन मानकर चल रहे हैं सिद्धू इसके बाद आलोचना कुछ कम करेंगे.

खुद को पंजाब के रखवाले के रूप में पेश कर रहे हैं सिद्धू
दूसरा मसला जो सिद्धू उठा रहे हैं वो है किसानों का. कैप्टन अमरिंदर सिंह केंद्र सरकार के नए कानूनों के खिलाफ कोरोना की वजह से किसानों को आंदोलन न करने की अपील कर चुके हैं. हालांकि उन्होंने किसानों का हमेशा समर्थन किया है. लेकिन सिद्धू ने इस मसले पर अपने घर के बाहर काला झंडा लगा रखा है. वो प्रदर्शित करना चाहते हैं कि वो किसानों के वास्तविक हितैषी हैं. इसी तरह कोटकपूरा केस में भी सिद्धू ऐसे दिखाना चाह रहे हैं जैसे वो पंजाब के रखवाले हों. कुछ इसी तरह का कार्ड अब तक कैप्टन अमरिंदर भी खेलते रहे हैं.

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