नड्डा की नई टीम के साथ क्या खुद को RSS से ज्यादा स्वतंत्र करने की कोशिश में बीजेपी?

पीएम नरेंद्र मोदी के साथ बीजेपी अध्‍यक्ष जेपी नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह. (File pic)
पीएम नरेंद्र मोदी के साथ बीजेपी अध्‍यक्ष जेपी नड्डा और गृह मंत्री अमित शाह. (File pic)

बीजेपी (BJP) के शीर्ष नेताओं में आरएसएस (RSS) की उपस्थिति हाई-प्रोफाइल महासचिव राम माधव और बी मुरलीधर राव के बाहर निकलने से काफी कम हो गई है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 28, 2020, 1:28 PM IST
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भवदीप कांग


नई दिल्‍ली. भारतीय जनता पार्टी (BJP) के शीर्ष नेताओं में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) की उपस्थिति हाई-प्रोफाइल महासचिव राम माधव और बी मुरलीधर राव के बाहर निकलने से काफी कम हो गई है. पार्टी ने परंपरागत रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रतिभाशाली कार्यकर्ताओं को खींचा है. राम माधव ने निश्चित रूप से महासचिव के रूप में एक बहुत ही सफल पारी खेली थी और इससे यह अटकलें तेज हो गई थीं कि उन्हें मंत्रिपरिषद में जगह दी जा सकती है. यही बात राव और अन्य दो महासचिवों अनिल जैन और सरोज पांडे पर लागू होती है, जिन्हें हटा दिया गया है. लेकिन अभी तक नए असाइनमेंट का कोई संकेत नहीं है.

बीएल संतोष महासचिवों के बीच पार्टी के कमांड सेंटर में आरएसएस की ओर से अब इकलौते नेता हैं. आयोजन सचिव के रूप में यह किसी भी मामले में संघ द्वारा प्रतिनियुक्ति है. पूर्व में बीजेपी में आरएसएस के प्रचारकों ने काफी लोकप्रियता हासिल की है. अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी जैसे लोग राजनीतिक करियर को आगे बढ़ाते रहे, जबकि केएन गोविंदाचार्य और संजय जोशी जैसे अन्य लोग विवादों में फंसे रहे.
बीजेपी के लिए आखिर आरएसएस प्रचारक या पूर्व प्रचारक को क्‍या मूल्‍यवान बनाता है? और आगे चलकर उन्हें पार्टी में या तो ऊपर या फिर बाहर क्यों कर दिया जाता है?




पहले प्रश्न का आसानी से उत्तर जा सकता है कि वे अनुशासित, बुद्धिमान, वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध, कड़ी मेहनत और निरंतर यात्रा के आदी हैं और आउट-ऑफ-द-बॉक्स सोच में सक्षम हैं. दूसरे का आकलन करना थोड़ा कठिन है. बहुत से कारक हैं जो उन्हें पार्टी के लिए आवश्यक बनाने के साथ ही अप्रांसगिक भी बनाते हैं. वे स्वतंत्र विचारक, मुखर (गोविंदाचार्य के करियर की कीमत चुकाने वाले) और प्रदर्शन से प्रेरित होते हैं, जो उन्हें सुर्खियों में लाता है और उन्हें आंतरिक प्रतिद्वंद्विता का लक्ष्य बनाता है.

वाजपेयी प्रसिद्ध रूप से मुखर थे. प्रधानमंत्री के रूप में वह कई मौकों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उसके अग्रणी संगठनों के साथ साथ चले. वह या तो अपना रास्ता पकड़ लेते या राह में टकरा जाते. नरेंद्र मोदी स्वयं काफी व्यक्तिवादी थे. जब 2001 में गुजरात के उपमुख्यमंत्री की पेशकश की गई, तो उन्होंने कहा कि उन्होंने इस आधार पर इनकार कर दिया था कि वह राज्य की पूरी जिम्मेदारी लेंगे या बिल्कुल नहीं. बीजेपी नेतृत्व ने समर्थन किया और वह सीएम बन गए. बाकी सब इतिहास है.

राम माधव दो कारणों से बीजेपी द्वारा आंके जाएंगे. सबसे पहले, कठिन कार्य को पूरा करने की उनकी क्षमता निर्विवाद है. उनसे जम्मू-कश्मीर और उत्तर-पूर्व में बीजेपी को आगे बढ़ाने के लिए कहा गया था, उन्होंने दोनों को ही पूरा किया. दूसरा, वह वैश्विक राजनयिक समुदाय में एक बड़े नेटवर्क का आनंद लेते हैं. पहली बार दो दशकों के निरंतर प्रयास की बदौलत आरएसएस ने दुनिया के लिए एक मोर्चे का निर्माण किया. उस प्रयास के परिणामस्वरूप आरएसएस सरसंघचालक मोहन राव भागवत ने वैश्विक मीडिया प्रतिनिधियों को संबोधित किया और कई राजदूतों के साथ बातचीत की.

उनके बाहर जाने के कई कारण बताए गए हैं. एक यह कि मीडिया के साथ उनकी लगातार व्यस्तता बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा को परेशान करती है. साथ ही प्रसिद्धि से बचाव के आरएसएस के सिद्धांत का उल्लंघन करती है. हालांकि निष्पक्ष होने के लिए, उन्हें मूल रूप से दिल्ली लाया गया था. राष्ट्रीय मीडिया के साथ बातचीत करने के लिए. माधव ने इंडिया फाउंडेशन भी चलाया है, जो एक स्वतंत्र थिंकटैंक रन है, जिसने कई हाई-प्रोफाइल इवेंट की मेजबानी की है, जिससे आंतरिक प्रतिद्वंद्विता फैल रही है.

मूलरूप से बीजेपी के आठ महासचिवों में से चार को व्यापक क्षेत्रीय और जातिगत प्रतिनिधित्व के लिए रास्ता बनाने के लिए हटाया गया. नव नियुक्त तरुण चुघ पंजाब का प्रतिनिधित्व करते हैं, उत्तर-पूर्व में दिलीप सैकिया, डी पुरंदेश्वरी और सीटी रवि दक्षिण में हैं, जबकि एक प्रमुख दलित चेहरा डीके गौतम को उपाध्‍यक्ष से महासचिव पद पर प्रोन्नत किया गया है.

गृह मंत्री और पूर्व भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का विश्वास जीतने वाले तीन महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, भूपेंद्र यादव और अरुण सिंह को बरकरार रखा गया है. यह हमें इस सवाल पर लाता है कि क्या बीजेपी सक्रिय रूप से खुद को आरएसएस से अधिक स्वतंत्र बनाने की कोशिश कर रही है या क्या यह पार्टी के बदलते चरित्र का एक अनिवार्य परिणाम है. अगर प्रमुख मंत्रालयों को गैर संघ मंत्रियों द्वारा संभाला जा सकता है, तो पार्टी बहुत पीछे नहीं रह सकती.

बीजेपी के विस्तार के साथ यह अपेक्षा करना वाजिब है कि पारम्परिक संघ शिक्षा के बाहर से भर्ती होने वालों को, जैसे कि मुकुल रॉय को जिम्मेदारी दी जाएगी, इसके परिणामस्वरूप वैचारिक रूप से कमजोर पड़ने से पार्टी का आरएसएस की ओर झुकाव हो सकता है. (यह लेखक के निजी विचार हैं)
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