'दलितों के लिए मंदिर' खोलने की मांग करके क्या प्रकाश आंबेडकर अपने दादाजी की सीखों से दूर जा रहे हैं?

'दलितों के लिए मंदिर' खोलने की मांग करके क्या प्रकाश आंबेडकर अपने दादाजी की सीखों से दूर जा रहे हैं?
डॉ बीआर अंबेडकर के चित्र के सामने गुलाब की पंखुड़ियां समर्पित करते लोग (फाइल फोटो)

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर (Dr Babasaheb Ambedkar) के पोते प्रकाश आंबेडकर (Prakash Ambedkar), जो वंचित बहुजन अगाड़ी (VBA) का नेतृत्व करते हैं, ने मंदिरों और अन्य पूजा स्थलों को श्रद्धालुओं के लिए खोलने की मांग करते हुए एक लहर पैदा की है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 5, 2020, 5:08 PM IST
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(धवल कुलकर्णी)

मुंबई. मार्च 1930 में डॉ बाबासाहेब आम्बेडकर (Dr Babasaheb Ambedkar) ने एक सत्याग्रह शुरू किया जिसमें दलितों (Dalits) को महाराष्ट्र (Maharashtra) के नासिक के तीर्थस्थल कालाराम मंदिर में प्रवेश करने और प्रार्थना करने की अनुमति दिए जाने की मांग की गई थी. इसका विरोध तथाकथित अगड़ी जाति के हिंदुओं (Hindus) ने किया, उन्होंने इन प्रदर्शनकारियों के खिलाफ हिंसा भी की, जबकि प्रदर्शनकारी अपनी मांगों को शांतिपूर्ण तरीके से रख रहे थे. सत्याग्रह (Satyagraha) का यह प्रतिरोध लगभग पांच सालों तक जारी रहा. जिसने आम्बेडकर को नासिक (Nashik) के येओला में (अक्टूबर 1935 में) घोषणा करने के लिए प्रेरित किया कि वह "एक हिंदू (Hindu) के रूप में पैदा हुए थे, लेकिन एक हिंदू के रूप में मरेंगे नहीं." आखिरकार, आम्बेडकर ने 1956 में अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म (Buddhism) अपना लिया.

अब लगभग 80 साल बाद आम्बेडकर के पोते प्रकाश आम्बेडकर (Prakash Ambedkar) ने मंदिरों और अन्य पूजा स्थलों को श्रद्धालुओं के लिए खोलने की मांग करते हुए एक लहर पैदा की है. प्रकाश आम्बेडकर वंचित बहुजन अगाड़ी (VBA) का नेतृत्व करते हैं.  इस सप्ताह की शुरुआत में, प्रकाश ने पंढरपुर (Pandharpur) में भगवान विठोबा (Lord Vithoba) के प्रतिष्ठित मंदिर में विरोध प्रदर्शन किया था. पूर्व लोकसभा सांसद (former Lok Sabha MP) ने राज्य सरकार को इस मांग को पूरा किए जाने के लिए 10 दिन का अल्टीमेटम (ultimatum) भी दिया है, जिसमें विफल रहने पर नए सिरे से आंदोलन चलाने की बात कही है.



BJP और AIMIM भी खुलवाना चाहती हैं धार्मिक स्थल
उद्धव ठाकरे के नेतृत्व वाली महा विकास अगाड़ी (MVA) की सरकार ने अभी तक भक्तों को कोरोना वायरस के बढ़ते प्रसार पर चिंताओं को देखते हुए पूजा स्थलों को खोलने की अनुमति नहीं दी है. हालांकि, विपक्षी भारतीय जनता पार्टी (BJP) और ऑल इंडिया मजलिस ई इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) सहित पार्टियां चाहती हैं कि धार्मिक स्थलों को खोला जाए.

हालांकि इसमें प्रकाश का विरोध है जो सबसे अधिक विचित्र है. ऐसे ही एक के लिए, उनके दादा ने बौद्ध धर्म को अपनाते हुए हिंदू धर्म और उसके देवताओं को छोड़ दिया था. बल्कि बौद्ध धर्म स्वीकार करते समय पहली तीन प्रतिज्ञाएं विष्णु, शिव, राम, कृष्ण और गणपति जैसे हिंदू देवताओं की पूजा नहीं करने से संबंधित थीं.

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अंतर्विरोधों को आम्बेडकरवादी विचारधारा के सिद्धांतों के साथ संतुलित करने की चुनौती
ऐसे में प्रकाश के परंपरा से अलग आंदोलन का उद्देश्य दलित आंदोलन को अपनी पारंपरिक धुरी से परे ले जाना हो सकता है. लेकिन वास्तविक चुनौती इसकी जनता तक पहुंच के अंतर्विरोधों को क्लासिक आम्बेडकरवादी विचारधारा के मूल सिद्धांतों के साथ संतुलित करने की है. (लेखक मुंबई के एक पत्रकार और 'द कजिन्स ठाकरे: उद्धव, राज और उनकी सेनाओं की छाया’के लेखक हैं. यहां व्यक्त विचार व्यक्तिगत हैं.)
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