अपने प्रयत्नों से महिला प्रधान ने किया गांव के स्कूल का कायाकल्प

बाराबंकी के चंदवारा गांव की प्रधान प्रकाशिनी जायसवाल ने अपने खर्च पर सरकारी प्राथमिक स्कूल में समर कैंप आयोजित करवाए. साइकिल बैंक बनवाया. यह स्कूल कॉन्वेंट स्कूलों को टक्कर देने की स्थिति में आ गया है.

News18Hindi
Updated: May 26, 2019, 1:04 PM IST
अपने प्रयत्नों से महिला प्रधान ने किया गांव के स्कूल का कायाकल्प
प्रतीकात्मक तस्वीर
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Updated: May 26, 2019, 1:04 PM IST
यूपी के बाराबंकी जिले के चंदवारा गांव की प्रधान प्रकाशिनी जायसवाल ने अपने प्रयत्न से गांव के सरकारी स्कूल को कॉन्वेंट स्कूलों जैसा बना दिया. प्रकाशिनी ने पढ़ाई के साथ ही इस स्कूल में कॉन्वेंट की तर्ज पर समर कैंप आयोजित करवाए, जिसमें बेंगलुरु से भी एक्सपर्ट बुलाए गए. वहीं गांव की छात्राओं को पढ़ाने के लिए दूर भेजने के लिए एक साइकिल बैंक बनवाया. इस बैंक से छात्राओं को नि:शुल्क साइकिल दी जाती है. इससे गांव में प्राथमिक शिक्षा धीरे-धीरे आदर्श स्थिति की ओर बढ़ने लगी है. सबसे खास बात यह है कि इस पूरे आयोजन का खर्च प्रकाशिनी ने खुद वहन किया.

प्राथमिक विद्यालय चंदवारा में 21 से 25 मई तक प्रकाशिनी ने समर कैंप आयोजित कराया. शनिवार को इसका अंतिम दिन था. गुरुवार को इसी स्कूल में बेंगलुरु से एक विशेषज्ञ पेंटिंग सिखाने के लिए आईं थीं. कैंप में सिंगिंग, डांसिंग, योग, क्राफ्ट मेकिंग, ताइक्वांडो समेत कई तरह की कलाएं बच्चों को सिखाई गईं. सभी बच्चों को कैंप के लिए नि:शुल्क टीशर्ट और लोअर भी दिया गया. प्रकाशिनी का जज्बा देखकर यूनेस्को के एक्सपर्ट तक ने इस समर कैंप में अपनी सहभागिता की.



अपने बच्चों की तरह ही गांव के बच्चों को मिले शिक्षा
प्रकाशिनी ने बताया कि उनके बच्चे जयपुरिया स्कूल में पढ़ने जाते हैं. वहां समर कैंप और इस तरह की एक्टिविटी सिखाई जाती है. प्रकाशिनी ने कहा कि, “मेरे गांव में एक ही प्राथमिक विद्यालय है. मुझे लगा कि मेरे गांव के बच्चों को भी मेरे बच्चों जैसी शिक्षा मिलनी चाहिए क्योंकि उन्हें इसका अधिकार है, इसलिए मैंने सरकारी स्कूल में ही समर कैंप आयोजित कराया. इसमें वैसे ही विशेषज्ञों को बुलाया जैसे किसी बड़े स्कूलों में आते हैं. सभी को एक जैसे कपड़े दिए ताकि किसी में हीन भावना न आ पाए.”

साइकिल बैंक के सहयोगी से दूर पढ़ने जा सकती है छात्राएं
इसी साल प्रकाशिनी से गांव में साइकिल बैंक शुरू किया. इसके माध्यम से 20 छात्राओं को पढ़ने जाने के लिए साइकल दी गई. प्रकाशिनी ने बताया यह साइकिल कई संस्थाओं के सहयोग से लाई गई. उन्हें पता चला कि गांव की लगभग 20 छात्राएं कॉलेज दूर होने के कारण पूर्व माध्यमिक के बाद आगे की पढ़ाई नहीं कर पा रही हैं, इसलिए मैंने यह साइकिल बैंक बनाया.

साइकिल बैंक के सहयोग से छात्राएं अब आसपास के क्षेत्रों में स्थित कॉलेजों में पढ़ने जा रहीं है. जब उनकी पढ़ाई पूरी हो जाएगी तो इनसे यह साइकल जमा करवा ली जाएगी जो दूसरी छात्राओं के काम आएगी. इस तरह यह साइकिल बैंक छात्राओं को लगातार सहयोग करता रहेगा. यूनिसेफ के सोशल पॉलिसी स्पेशलिस्ट पीयूष एंटोनी ने कहा कि, “यह विकास की एक नई परिभाषा है. इससे गांव के बच्चों को भी शहरी बच्चों की तरह सीखने के समान अवसर मिलेंगे. हर ग्राम पंचायत में इसी तरह के प्रयास हों तो सरकारी और निजी स्कूलों का भेद ही खत्म हो जाएगा.”
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