विश्व पर्यावरण दिवस: सैनिटरी नैपकिन के बारे में महिलाएं भी नहीं जानतीं ये बातें!

ज्यादातर महिलाएं यह नहीं जानतीं कि भारत में हर महीने एक अरब से ज्यादा सैनिटरी पैड गैर निष्पादित हुए सीवर, कचरे के गड्ढों, मैदानों और जल स्रोतों में जमा होते हैं, जो बड़े पैमाने पर पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं.

News18Hindi
Updated: June 5, 2019, 8:32 AM IST
विश्व पर्यावरण दिवस: सैनिटरी नैपकिन के बारे में महिलाएं भी नहीं जानतीं ये बातें!
ज्यादातर महिलाएं यह नहीं जानतीं कि भारत में हर महीने एक अरब से ज्यादा सैनिटरी पैड गैर निष्पादित हुए सीवर, कचरे के गड्ढों, मैदानों और जल स्रोतों में जमा होते हैं, जो बड़े पैमाने पर पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं.
News18Hindi
Updated: June 5, 2019, 8:32 AM IST
यह सच है कि पर्यावरण है तो हम हैं लेकिन पर्यावरण के लिए हम खुद ही अब घातक होते जा रहे हैं. हमारे बने रहने के लिए जिसका बना रहना जरूरी है, उसी के लिए बने रहने के लिए हम खतरा बनते जा रहे हैं. आज विश्व पर्यावरण दिवस (world environment day) है. आइए सौर ऊर्जा के निरंतर इस्तेमाल के अतिरिक्त ऐसे कदमों और उपायों के बारे में जानें जिन्हें लेकर लोग, संगठन और देश गंभीर हैं और पर्यावरण को बचाए और बनाए रखने के लिए इन्हें लागू करने की कोशिश कर रही हैं.

सैनिटरी नैपकिन के बारे में यह जानते हैं आप?
महिलाओं द्वारा मासिक धर्म के दौरान प्रयोग किए जाने वाले सैनिटरी नैपकिन का री-साइकिल नहीं किया जा सकता और खुले में सैनिटरी नैपकिन कचरा उठाने वाले के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक साबित हो सकते हैं. दोबारा इस्तेमाल में लाए जा सकने वाले कपड़े के पैड, बायोडीग्रेडेबल पैड, कप सहित पर्यावरण के अनुकूल सैनिटरी पैड के इस्तेमाल पर जोर दे रहे हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि बड़े शहरों की अधिकांश महिलाएं कॉर्मशियल डिस्पोजेबल सैनिटरी नैपकिन का इस्तेमाल करती हैं, उन्हें यह नहीं मालूम होता कि ये उत्पाद कुछ रासायनिक पदार्थो (डायोक्सिन, फ्यूरन, पेस्टिसाइड और अन्य विघटनकारी) की मौजूदगी के कारण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं. इसके निस्तारण की जानकारी के अभाव में अधिकांश महिलाए इसे कचरे के डिब्बे में फेंक देती हैं, जो अन्य प्रकार के सूखे व गीले कचरे के साथ मिल जाता है.

इसे ज्यादातर महिलाएं यह नहीं जानतीं कि भारत में हर महीने एक अरब से ज्यादा सैनिटरी पैड गैर निष्पादित हुए सीवर, कचरे के गड्ढों, मैदानों और जल स्रोतों में जमा होते हैं, जो बड़े पैमाने पर पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं. एनडीटीवी में छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक 'केरल स्थित सस्टेनेबल मेन्स्ट्रएशन केरल कलेक्टिव एनजीओ की सक्रिय कार्यकर्ता श्रद्धा श्रीजया बायो डीग्रेडेबल और टॉक्सिन फ्री सैनिटरी उत्पाद का प्रचार करती हैं.

मोदी सरकार का फोकस- इलेक्ट्रिक वाहनों का इस्तेमाल हो ज्यादा से ज्यादा
नीति आयोग का कहना है कि भारतीय शहरों की आबोहवा शुद्ध करने के लिए इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा दिया जाए और इसके लिए इलेक्ट्रिक टू व्‍हीलर और 3 व्‍हीलर की बिक्री को बढ़ावा दिया जाए. नीति आयोग चाहता है, सरकार 31 मार्च 2023 तक सुनिश्चित करे कि सिर्फ इलेक्ट्रिक थ्री वीलर ही मार्केट में बिकने के लिए आएं. ये वाहन लिथियम ऑयन या फिर अडवांस्ड केमिकल पर आधारित होंगे. इससे न सिर्फ प्रदूषण खत्‍म होगा बल्कि इलेक्ट्रिक कार बाजार को भी बूस्‍ट मिलेगा. विश्व में लगातार बढ़ते प्रदूषण और बढ़ती ग्लोबल वार्मिंग की चिंताओं के चलते इस तरह के उपाय निश्चित तौर पर कारगर साबित होंगे.


Loading...

यह भी पढ़ेंः World Environment Day 2019: पर्यावरण को बचाने के लिए थोड़ी 'हवा आने दे'

वैसे बता दें कि भारत में सोनी ई वीकल्स, ओकाया पावर, महिंद्रा इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, ऑटोलाइट (इंडिया) लिमिटेड, चैंपियन पॉलीप्लास्ट, ठकराल इलेक्ट्रिक, ग्रीनफ्यूल एनर्जी सोलूशन्स, फुजियामा पावर सिस्टम, गोएंका इलेक्ट्रिक मोटर व्हीकल्स, एस यू ऑटोमोटिव ऐसे वाहन बनाती हैं. मोदी सरकार ने जिस तगड़े प्लान को तैयार किया है उसके तहत इरडा ने प्राइवेट इलेक्ट्रिक कारों, इलेक्ट्रिक टू-वीलर के लिए मोटर टीपी प्रीमियम दरों पर 15% की छूट का प्रस्ताव है. साथ ही ई-रिक्शा के लिए भी अहम प्रस्ताव दिए गए हैं.

वर्षाजल संग्रहण यानी रेन वाटर हार्वेस्टिंग नाम तो सुना होगा?
पर्यावरण में जहां हवा और जल ऐसी चीजें हैं जो सर्वाधिक प्रभावित हो रही हैं. जल संकट देश ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया की एक गम्भीर समस्या है और विशेषज्ञों की मानें तो वर्षा के जल का संरक्षण ही वह एकमात्र उपाय है जिससे गिरते भूजल स्तर को रोका जा सकता है. साथ ही जल प्रबन्धन के द्वारा शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराया जा सकता है. रिपोर्ट्स के मुताबिक छत से प्राप्त होने वाले वर्षाजल को अन्य स्रोतों से प्राप्त होने वाले जल की तुलना में बेहतर बताया है. केमिकल लैब की रिपोर्ट के हवाले से कहा गया है कि यह जल हर तरह के हानिकारक लवणों से मुक्त होता है जिसमें हानिकारक बैक्टीरिया भी नहीं होते हैं.

यह भी पढ़ेंः पर्यावरण दिवस विशेष: गौरैया से लेकर गिलहरी तक... देखते-देखते कितनी चीजें गायब हो रही हैं!

बारिश के बाद इस पानी को उपयोग के लिए इकट्ठा करने की प्रक्रिया को ही रेन वाटर हार्वेस्टिंग कहा जाता है. वर्षाजल संग्रहण से भूजल यानी सरकारी जलापूर्ति पर निर्भरता कम होगी और जहाँ जलस्रोत नहीं हैं वहां पर कृषि संबंधी कामों के लिए इसका उपयोग किया जा सकेगा. यह कम से कम लागत में पानी पाने का जरिया भी है. घनी आबादी वाले क्षेत्रों में वर्षा का जल छतों से बहकर नालों में जाकर गन्दगी ही पैदा करता है और यदि इसे सही तरीके से एकत्र कर लिया जाए तो यह बेहतरीन उपाय हो सकता है.

पब्लिक ट्रांसपोर्ट का प्रयोग अधिक, निजी वाहन का कम
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 3 जून को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर ऐलान किया कि महिलाओं की सुरक्षा के लिए, ट्रैफिक जाम से राहत और प्रदूषण को कम करने के लिए वह जल्द ही शहर में बसों और मेट्रो के सफर को महिलाओं के लिए मुफ्त करने जा रही है. उन्होंने एक हफ्ते में अधिकारियों से प्लान लाने को कहा है और अगले 2-3 महीनों में यह योजना लागू हो सकती है. केवल दिल्ली ही नहीं, दुनिया के कई ऐसे देश और शहर भी हैं, जहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट पूरी तरह फ्री है या करने तैयारी चल रही है. एस्टोनिया की राजधानी टालिन में 5 साल पहले साल 2013 में मुफ्त पब्लिक ट्रांसपोर्ट लागू किया गया. एस्टोनिया में अन्य इलाकों से आने वाले विजिटर्स और पर्यटकों को टालिन नेटवर्क की बसों, ट्रॉली बसों, ट्रेन और ट्राम के इस्तेमाल के लिए पैसे चुकाने पड़ते हैं. लग्जमबर्ग 2020 तक दुनिया का पहला ऐसा देश बनने जा रहा है जहां पब्लिक ट्रांसपोर्ट सभी के लिए फ्री हो जाएगा. वैसे तो यह यूरोप के सबसे छोटे देशों में से एक है मगर फिर भी यहां भयंकर जाम लगता है.

एक क्लिक और खबरें खुद चलकर आएंगी आपके पास, सब्सक्राइब करें न्यूज़18 हिंदी  WhatsApp अपडेट्स
First published: June 5, 2019, 8:32 AM IST
Loading...
पूरी ख़बर पढ़ें अगली ख़बर
Loading...