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असम में NRC ने उड़ाई बांग्लाभाषी मुस्लिमों की नींद, यूं कर रहें गुजारा

News18Hindi
Updated: January 14, 2018, 9:02 AM IST
असम में NRC ने उड़ाई बांग्लाभाषी मुस्लिमों की नींद, यूं कर रहें गुजारा
असम सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान के लिए 31 दिसंबर 2017 की आधी रात राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का पहला ड्राफ्ट जारी किया.
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Updated: January 14, 2018, 9:02 AM IST
असम सरकार ने बांग्लादेशी घुसपैठियों की पहचान के लिए 31 दिसंबर 2017 की आधी रात राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) का पहला ड्राफ्ट जारी किया. राज्य सरकार ने सिर्फ 1 करोड़ 90 लाख लोगों को ही भारत का वैध नागरिक माना है, जबकि करीब 3 करोड़ 29 लाख लोगों ने दस्तावेज जमा करवाए थे.

राज्य सरकार और मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल के कई बार भरोसा दिए जाने के बाद भी लोग डरे हुए हैं. उन्हें डर है कि अगर एनआरसी के दूसरी लिस्ट में उनका नाम नहीं आया तो क्या उन्हें असम छोड़ना पड़ेगा? हालांकि सीएम ने साफ कहा है कि फाइनल एनआरसी के आने के पहले तक एक भी व्यक्ति को राज्य से बाहर नहीं किया जाएगा.

डिटेंशन सेंटर में हैं 2000 बांग्लाभाषी मुस्लिम परिवार
असम में फिलहाल ऐसे 2000 बांग्लाभाषी मुस्लिमों की पहचान की गई है, जिन्हें ट्रिब्यूनल ने 'विदेशी' माना है. इनके दस्तावेजों की जांच की जा रही है. जांच की प्रकिया पूरी होने तक इन लोगों को डिटेंशन सेंटर में रखा गया है.

एक स्टडी के मुताबिक, किसी को अगर लंबे समय तक समाज से अलग-थलग रखा जाए, तो उस व्यक्ति में शारीरिक और मानसिक बदलाव देखे जा सकते हैं. ऐसे में आगे जाकर इन लोगों की स्थिति क्या होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है.

लोगों में असमंजस की स्थिति
पूरी प्रक्रिया की जानकारी का अभाव होने के कारण लोगों में असमंजस की स्थिति है. इस कारण खासतौर से बंगलाभाषी मुस्लिमों में डर का माहौल हैं. 25 साल के काज़ी नील असम के बारपेटा जिले के रहने वाले हैं. एनआरसी का पहला ड्राफ्ट आने के बाद से काज़ी काफी डरे हुए हैं. एनआरसी के पहले ड्राफ्ट में इनके परिवार के एक भी सदस्य का नाम नहीं आया है.

खुद को नास्तिक मानने वाले काज़ी बताते हैं,
"मेरे दादाजी का नाम 1951 के एनआरसी और 1966 के वोटर्स लिस्ट में दर्ज है. मेरे पिता ने 1983 में पहली बार वोट दिया था. लेकिन, मेरे अभिभावकों को 1997 में वोटर्स लिस्ट से हटा दिया गया. मेरे पिता ने अपनी नागरिकता साबित की, लेकिन हमलोगों का नाम अभी तक एनआरसी में अपडेट नहीं किया गया है."


शाहज़हान काजी नील की कहानी गांव में कई लोग जानते हैं. आठ चुनावों में पोलिंग ऑफिसर के तौर पर काम करने के बाद भी उन्हें वोट देने का हक नहीं है, क्योंकि उन्हें डी-वोटर घोषित किया गया है. 2017 में फॉरिनर ट्रिब्यूनल से काज़ी को राहत मिल गई थी. लेकिन, अभी तक उन्हें वोटर लिस्ट में नाम दर्ज होने का इंतजार है.

कई बार दस्तावेज जमा कराने के बाद भी एनआरसी में नाम नही
फरहाद भूयां भी बरपेटा जिले के रहने वाले हैं. उन्हें खुशी है कि सरकार कामकाजी लोगों, सैनिकों, पुलिसवालों, कारोबारियों, डॉक्टरों और टीचरों के लिए काम कर रही है. लेकिन, वो भी डरे हुए हैं. फरहाद को चिंता है कि अगर उन्हें एनआरसी में जगह नहीं मिली तो क्या होगा?

फरहाद बताते हैं, " मैंने 1951, 1965 और 1971 में सारे दस्तावेज जमा कराए हैं. मेरे दादाजी को '1 इंडियन' के रूप में चिन्हित किया गया था. 1961 से हम तरबारी गांव में रह रहे थे. कुछ सालों पहले बरपेट में शिफ्ट हुए. सारे दस्तावेज देने के बाद भी परिवार के किसी सदस्य का नाम एनआरसी में नहीं आया है."

असम के कई इलाकों में ऐसे कई लोग हैं, जिनकी कहानी काज़ी और फरहद भूयन जैसी है. असम सरकार जल्द ही एनआरसी की दूसरी लिस्ट जारी करने वाली है. ऐसे में राज्य के बांग्लाभाषी मुसलमानों के पास अपनी नागरिकता साबित करने का यह आखिरी मौका होगा.

कुल 68.27 लाख परिवारों ने किया था आवेदन
एनआरसी अथॉरिटी को कुल 68.27 लाख परिवारों के आवेदन मिले थे. प्रति व्यक्ति के हिसाब से इनकी संख्या कुल 3.29 करोड़ थी. पहले ड्राफ्ट में 1.9 करोड़ लोगों का नाम है. भारत के रजिस्ट्रार जनरल शैलेश के मुताबिक, 1.39 करोड़ लोगों के दस्तावेजों की जांच की जा रही है. इन लोगों को परेशान होने या डरने की जरूरत नहीं है. दस्तावेजों के वैरिफिकेशन के बाद दूसरा और तीसरा मसौदा जारी किया जाएगा. फाइनल एनआरसी साल 2018 के आखिर तक आएगा.

सरकार ने की संयम बरतने की अपील
सरकार ने लोगों से संयम बरतने की अपील की है, लेकिन इसके बाद भी लोग काफी डरे हुए हैं. उन्हें चिंता है कि अगर उनके दस्तावेज वेरिफाई नहीं हुए, तो क्या उन्हें राज्य छोड़ना होगा? पूरी प्रक्रिया को लेकर लोगों में जानकारी का अभाव भी है. ऐसे में वो चीजों की ठीक से समझ भी नहीं पा रहे हैं और अफवाह का शिकार हो जा रहे हैं.

एनआरसी वाला देश का एकलौता राज्य है असम
असम देश का एकमात्र ऐसा राज्य है, जिसका एनआरसी है. इसे पहली बार 1951 में तैयार किया गया था. उस वक्त राज्य के नागरिकों की संख्या 80 लाख थी. असम में अवैध रूप से रहने वाले बांग्लादेशियों का मामला बहुत बड़ा मुद्दा रहा है. इसकी वजह अक्सर हिंसक घटनाएं होती रहती हैं. असम के मूल नागरिकों का मानना है कि अवैध रूप से यहां आकर बसे लोग उनका हक मार रहे हैं.

इस मुद्दे को लेकर 80 के दशक में बड़ा आंदोलन हुआ था, जिसके बाद असम गण परिषद और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार के बीच समझौता हुआ. इसमें तय हुआ कि 1971 तक जो भी बांग्लादेशी असम में घुसे हैं, उन्हें नागरिकता दी जाएगी और बाकी को निर्वासित किया जाएगा. हालांकि, समझौता आगे नहीं बढ़ा.

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