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क्‍या आदित्‍य महाराष्‍ट्र में ठाकरे परिवार-शिवसेना की पकड़ कर पाएंगे और मजबूत

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Updated: January 9, 2020, 12:40 PM IST
क्‍या आदित्‍य महाराष्‍ट्र में ठाकरे परिवार-शिवसेना की पकड़ कर पाएंगे और मजबूत
ठाकरे परिवार से पहली बार चुनाव में उतरे आदित्‍य ने वर्ली विधानसभा से जीत दर्ज की. उन्‍हें महाराष्‍ट्र मंत्रिमंडल में भी शामिल किया गया है.

शिवसेना (Shiv Sena) के संस्‍थापक बाल ठाकरे (Bal Thackeray) के पोते आदित्‍य ठाकरे (Aditya Thackeray) ने जबरदस्‍त सियासी उठापटक के बीच चुनावी राजनीति में कदम रखा. इसके बाद महाराष्‍ट्र (Maharashtra) के मुख्‍यमंत्री उद्धव ठाकरे (CM Uddhav Thackeray) ने काफी सोच-समझकर उन्‍हें मंत्री ही नहीं बनाया बल्कि खास रणनीति के तहत विभाग आवंटन किया गया.

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  • Last Updated: January 9, 2020, 12:40 PM IST
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धवल कुलकर्णी

शिवसेना के संस्‍थापक बाल ठाकरे (Bal Thackeray) के पौत्र और महाराष्‍ट्र के सीएम उद्धव ठाकरे (CM Uddhav Thackeray) के बेटे आदित्‍य ठाकरे (Aditya Thackeray) ने जबरदस्‍त सियासी उठापटक के बीच चुनावी राजनीति में कदम रखा. ठाकरे परिवार से पहली बार किसी ने चुनावी दंगल में ताल ठोकी. उन्‍हें सेंट्रल मुंबई की वर्ली विधानसभा सीट (Worli Constituency) से मैदान में उतारा गया. शिवसेना (Shiv Sena) का गढ़ माने जानी वाली सीट से आदित्‍य ने जीत दर्ज की. इसके बाद उन्‍हें मंत्रिमंडल में भी शामिल किया गया. यही नहीं उनके मंत्रालय को लेकर भी काफी सोच-विचार किया गया और उन्‍हें पर्यावरण व पर्यटन मंत्रालय (Environment and Tourism Minister) का भार सौंपा गया. अब उन पर ठाकरे परिवार को राज्‍य में और मजबूत करने की बड़ी जिम्‍मेदार होगी. सवाल ये है कि क्‍या वह महाराष्‍ट्र में शिवसेना के साथ ही ठाकरे परिवार की पकड़ और मजबूत कर पाएंगे.

पहली बार महाराष्‍ट्र की सरकार में साथ आए पिता-पुत्र
महाराष्‍ट्र विधानसभा चुनाव 2019 में शिवसेना-बीजेपी ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था. गठबंधन को पूर्ण बहुमत मिला, लेकिन मुख्‍यमंत्री पद को लेकर दोनों दलों में लंबा संघर्ष चला. आखिर में शिवसेना ने बीजेपी (BJP) से गठबंधन तोड़कर एनसीपी (NCP) और कांग्रेस (Congress) के साथ मिलकर महाराष्‍ट्र में सरकार बना ली. शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे मुख्‍यमंत्री बनाए गए. इससे पहले ठाकरे परिवार से कोई भी व्‍यक्ति कभी भी सरकार में शामिल नहीं हुआ था. महाराष्‍ट्र में ठाकरे परिवार सरकारों को बाहर से समर्थन देता रहा था. सरकार बनने के बाद सभी को चौंकाते हुए सीएम उद्धव ठाकरे ने आदित्‍य को भी मंत्रिमंडल (Cabinet) में शामिल किया. महाराष्‍ट्र की सियासत में ये भी पहली बार हुआ कि पिता-पुत्र दोनों सरकार में शामिल हों.

रोजगार पैदा करने में अहम साबित होगा पर्यटन मंत्रालय
गृह या शहरी विकास मंत्रालय के उलट आदित्‍य ठाकरे को बतौर पर्यटन व पर्यावरण मंत्रालय में रहते आम लोगों से सीधे संवाद की ज्‍यादा जरूरत नहीं होगी. हालांकि, उनका मंत्रालय राज्‍य में रोजगार सृजन के साथ ही सामाजिक तौर पर काफी असर डालने वाला है. 90 के दशक की शुरुआत में ठाकरे आवास 'मातोश्री' जाने वाले लोग बताते हैं कि जब भी बाल ठाकरे किसी बात पर गुस्‍सा होने लगते थे तो उनकी पत्‍नी मीना ताई पहले चाय-नाश्‍ता भेज देती थीं ताकि थोड़ी देर के लिए चर्चा रुक जाए और शिवसेना संस्‍थापक शांत हो जाएं. अगर इससे भी बात नहीं बनती थी तो वह आदित्‍य को उनकी गोद में बैठा देती थीं. बताया जाता है कि बाल ठाकरे आदित्‍य को बहुत प्रेम करते थे. इस पर वह हर बार शांत हो जाते थे.

आदित्‍य ठाकरे ने बॉम्‍बे स्‍कॉटिश स्‍कूल के बाद सैंट जेवियर कॉलेज से अपनी पढ़ाई की. इसके बाद उन्‍होंने वकालत की पढ़ाई की.
शिवसैनिकों को भी पार्टी में बेहतर बदलाव की है उम्‍मीद
शिवसेना मुखिया को भी शांत करने वाला प्रभाव रखने वाले आदित्‍य ठाकरे अपनी स्थिति मजबूत कर क्‍या पार्टी में प्रगतिशील बदलाव ला पाएंगे. अमूमन सख्‍त भाषा का इस्‍तेमाल करने वाले शिवसैनिक भी अब महसूस करने लगे हैं कि हर तबके में अपनी स्‍वीकार्यता बढ़ाने के लिए पार्टी को बदलाव की दरकार है. आदित्‍य ने बॉम्‍बे स्‍कॉटिश स्‍कूल के बाद सैंट जेवियर कॉलेज से अपनी पढ़ाई की. इसके बाद उन्‍होंने वकालत की पढ़ाई की. अब पार्टी कार्यकर्ताओं और नेताओं को उनसे शिवसेना में बेहतर बदलाव की उम्‍मीद है. पार्टी के कई नेताओं का कहना है कि आदित्‍य ठाकरे ने शिवसेना के पारंपरिक सिद्धांतों को किनारे रखकर चुनावी राजनीति में कदम रखा है. इससे पहले हर पार्टी नेता के लिए चुनावी राजनीति में प्रवेश के कुछ कायदे थे.

आम मुद्दों को लेकर मराठी भाषी भी कर रहे थे किनारा
कुछ नेताओं का कहना है कि उन्‍हें उनकी भाषण शैली, सौम्‍य तौर-तरीकों, अंतरराष्‍ट्रीय कानून व कूटनीति और पर्यावरण मामलों में रुचि के कारण सीधे-सीधे चुनावी राजनीति में उतारा गया. आम लोगों के मुद्दों को छोड़कर मराठी मानुष को लेकर अपने रुख के कारण हिंदी भाषी से ज्‍यादा मराठी भाषी लोग शिवसेना से किनारा करने लगे थे. महाराष्‍ट्र राज्‍य का निर्माण 1960 में हुआ था और इसकी राजधानी बॉम्‍बे बनाई गई थी. तब मराठी भाषी लोग यहां बहुसंख्‍यक नहीं थे बल्कि अल्‍पसंख्‍यक थे. इस कारण मराठी भाषी लोगों में असुरक्षा की भावना थी. शिवसेना ने लोगों के इसी डर का फायदा उठाया. बाद में पार्टी ने हिंदुत्‍व के मुद्दे पर गैर-मराठियों के बीच भी अपनी स्थिति मजबूत कर ली.

आदित्‍य ठाकरे ने वर्ली विधानसभा से चुनाव लड़ने के दौरान मराठी के साथ अन्‍य भाषाओं में भी अपने पोस्‍टर लगवाए.


प्रचार में आदित्‍य ने हर भाषा में लगवाए अपने पोस्‍टर
मराठी मानुष के मुद्दे पर ही राजनीति करने वाली राज ठाकरे की महाराष्‍ट्र नवनिर्माण सेना ने शिवसेना की स्थिति थोड़ी कमजोर की. अब आदित्‍य ठाकरे ने वर्ली विधानसभा से चुनाव लड़ने के दौरान मराठी के साथ अन्‍य भाषाओं में भी अपने पोस्‍टर लगवाए. इस सीट पर मराठी मतदाताओं की बड़ी संख्‍या के बावजूद उत्‍तर भारतीय मतदाता निर्णायक भूमिका में रहते हैं. इसी के चलते 1951 में इस सीट पर सोशलिस्‍ट पार्टी के उत्‍तर भारतीय प्रत्‍याशी पंडित भगीरथ झा ने जीत दर्ज की थी. शिवसेना नेताओं के मुताबिक, आदित्‍य खुद पर्यटन व पर्यावरण मंत्रालय चाहते थे. हो सकता है कि वह किसी खास रणनीति के तहत ये मंत्रालय चाहते हों. पर्यटन क्षेत्र रोजगार पैदा करने के मामले में बहुत उपयोगी साबित हो सकता है.

आदित्‍य के सामने खड़ी हैं कई तरह की चुनौतियां
महाराष्‍ट्र की पिछली सरकारों ने पर्यटन क्षेत्र को उतनी तव्‍वजो नहीं दी, जितनी दी जानी चाहिए थी. वहीं, उनको मिला पर्यावरण मंत्रालय चुनौतियों से भरा है. एक तरफ आदित्‍य को उद्योग जगत के हितों का ध्‍यान रखना होगा तो दूसरी तरफ परिस्थितिकी संतुलन का ख्‍याल रखना होगा. पिछली देवेंद्र फडणवीस सरकार में भी ये मंत्रालय शिवसेना के ही पास था, लेकिन इसका प्रदर्शन बहुत अच्‍छा नहीं रहा था. हालांकि, पर्यावरण मंत्रालय ने राज्‍य में डिस्‍पोसेबल और सिंगल यूज प्‍लास्टिक पर पाबंदी लगाई थी. माना जाता है कि ये पाबंदी आदित्‍य की ही सोच का नतीजा थी. तमाम बातों के बीच सवाल यही है कि क्‍या आदित्‍य शिवसेना को बदलने के साथ ही सुशासन देने में सफल हो पाएंगे?
(लेखक एक पत्रकार हैं. वह 'द कजिंस ठाकरे: उद्धव, राज एंड शैडो ऑफ देयर सेनाज' के लेखक भी हैं. लेख उनके निजी विचार हैं.)

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First published: January 9, 2020, 12:36 PM IST
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