2014 में कांग्रेस की हार के लिए सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह के फैसले कितने जिम्मेदार? प्रणब मुखर्जी ने किताब में बताया

पूर्व उपराष्ट्रपति दिवंगत प्रणब मुखर्जी की नई किताब अगले महीने बाजार में आएगी. (फाइल फोटो)

The Presidential Years नाम की यह किताब जनवरी महीने में आएगी. किताब में अन्य बातों के अलावा कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर विवादों से संबंधित बातें भी होंगी.

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नई दिल्ली. कांग्रेस (Congress) में नया अध्यक्ष चुनने के लिए चुनाव अगले कुछ महीने में संभव है. पार्टी अपने रिकवरी प्लान की तैयारी कर रही है. इस बीच एक ऐसे व्यक्ति की नई किताब बाजार में आने वाली है जो कांग्रेस के सभी राज जानता था. ये किताब यूपीए के उभार और पतन को लेकर कई खुलासे करेगी जिसे लेकर विवाद-बहस भी हो सकती है. भारत के पूर्व राष्ट्रपति दिवंगत प्रणब मुखर्जी (Pranab Mujkherjee) की यह किताब बीते सालों में कांग्रेस की लगातार चुनावी हारों में लीडरशिप के रोल की भी पड़ताल कर सकती है.

सोनिया ने मनमोहन सिंह को चुना, इस बात से उबर नहीं पाए प्रणब
The Presidential Years नाम की यह किताब जनवरी महीने में आएगी. किताब में अन्य बातों के अलावा कांग्रेस में प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर विवादों से संबंधित बातें भी होंगी. अब यह बात लगभग सर्वविदित है कि प्रणब मुखर्जी कभी इस बात से नहीं उबर सके कि सोनिया ने उनपर विश्वास न करके 'भरोसेमंद' मनमोहन सिंह को चुना. एक और बात जो उन्हें उलझन में डालती थी वो ये कि उन्हें एक ऐसे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करना होता था जिसके पास उनसे कम राजनीतिक अनुभव थे. मनमोहन सिंह की कैबिनेट मीटिंग में विवाद की खबरें भी आती रही हैं.

कई पार्टी नेताओं की प्रणब के पक्ष में थी राय
इससे यह भी सवाल उठता है कि क्या सीरीज में घोटालों के बाद मनमोहन सिंह की धूमिल होती छवि के बावजूद पीएम न बदलकर कांग्रेस ने गलती की थी? प्रणब मुखर्जी ने अपनी किताब में इसका जिक्र किया है- कुछ कांग्रेस सदस्यों ने थ्योरी बना ली थी कि अगर मैं 2004 में पीएम बना होता तो शायद 2014 की बुरी हार टाली जा सकती थी. हालांकि मैं इस दृष्टिकोण से सहमत नहीं हूं. मेरा मानना है कि मेरे राष्ट्रपति बनने के बाद पार्टी लीडरशिप ने अपना फोकस खो दिया था. सोनिया गांधी पार्टी मामलों को हैंडल कर पाने में सक्षम नहीं थीं तो वहीं डॉ. सिंह की लोकसभा में लंबी अनुपस्थिति की वजह से सांसदों से कॉन्टैक्ट नहीं हो पाता था.

तो न हुई होती 2014 की बुरी हार
यूपीए 2 के खराब दिनों की शुरुआत अन्ना हजारे के आंदोलन के वक्त शुरू हुई थी. तब प्रणब मुखर्जी प्रदर्शनकारियों से बातचीत के पक्ष में नहीं थे लेकिन उन्हें इसमें शामिल होने पड़ा क्योंकि मनमोहन सिंह और उनके सलाहकार नर्वस थे. पार्टी की छवि खराब हो रही थी लेकिन किसी भी कांग्रेसी नेता द्वारा पीएम बदलने का कोई भी सुझाव सोनिया गांधी की तरफ से बुरी तरह से नकार दिया जाता था. 2014 के चुनावों के नतीजों ने उन नेताओं को सही भी साबित किया था जो मानते थे कि प्रणब को पीएम होना चाहिए था.

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