बीजेपी से दूर और AAP के यूं करीब होते गए यशवंत सिन्हा

नरेंद्र मोदी की अगुवाई में 2014 में बनी बीजेपी सरकार आने के बाद से हाशिए पर धकेल दिए गए यशवंत सिन्हा मौजूदा सरकार की नीतियों की अक्सर आलोचना करते रहते हैं. अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में वित्त और विदेश मंत्री जैसे प्रमुख पदों पर रह चुके सिन्हा बीजेपी से अपनी नाराजगी के चलते अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ सकते हैं.

News18Hindi
Updated: September 9, 2018, 2:38 PM IST
बीजेपी से दूर और AAP के यूं करीब होते गए यशवंत सिन्हा
पूर्व वित्त मंत्री यशवंत सिन्हा की फाइल फोटो- PTI
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Updated: September 9, 2018, 2:38 PM IST
लोकसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक सरगर्मियां बढ़ गई हैं. दलों के अंदर-बाहर, समर्थन और विरोध की आवाजें उठनी शुरू हो गई हैं. टिकट हासिल करने की जंग फिलहाल सतह पर तो नहीं आई है, लेकिन अंदरखाने इसके लिए जबरदस्त रस्साकसी चल रही है. इन सबके बीच राजनीति के केंद्र दिल्ली से एक बड़ी खबर आई है.

माना जा रहा है कि पूर्व बीजेपी नेता और अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में विदेश और वित्त मंत्री जैसे अहम पद संभाल चुके यशवंत सिन्हा, अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी (आप) से चुनाव लड़ सकते हैं. केंद्र में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार आने के बाद से ही यशवंत बीजेपी में हाशिए पर चले गए थे. हालांकि, यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत सिन्हा मोदी सरकार में मंत्री हैं, इसके बावजूद यशवंत आए दिन केंद्र की योजनाओं पर निशाना साधते रहते हैं. इसके पीछे उनकी महत्वाकांक्षाएं भी हैं जो कभी-कभार मीडिया के जरिए सामने आ जाती हैं.

बात जुलाई 2014 की है. उससे 2 महीने पहले ही केंद्र में मोदी सरकार बनी थी. झारखंड में एक कार्यक्रम के दौरान जब यशवंत से पूछा गया कि अगर राज्य में बीजेपी की सरकार बनती है तो सीएम कौन बनेगा? इस पर यशवंत आपा खो बैठे और अपशब्द का उपयोग करते हुए कहा... 'कोई भी मुख्यमंत्री बन सकता है.' ऐसे में ये कयास लगाए गए कि वह झारखंड का सीएम बनना चाहते थे.

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जब केंद्र सरकार योजना आयोग को खत्म कर नई संस्था लाने पर मंथन कर रही थी, तब उस टीम में यशवंत भी थे. उस दौरान भी अटकल यही लगाई जा रही थी कि पहली एनडीए सरकार में वित्त मंत्री रहे यशवंत को संस्था में कोई अहम पद मिलेगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ. इसके बाद से ही मोदी सरकार के विरोध में यशवंत के सुर बगावती हो गए.

बीजेपी में लालकृष्ण आडवाणी खेमे के माने जाने वाले यशवंत ने एक बार तो यहां तक कह दिया था, 'मोदी की नजर में मैं ब्रेन डेड हूं'. साल 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में बीजेपी में मिली हार को लेकर भी यशवंत ने पार्टी नेतृत्व पर सवालिया निशान उठाए थे.

यशवंत, मोदी सरकार पर टिप्पणी करते हुए यहां तक कह चुके हैं कि अगले चुनावों में इस सरकार का हाल इंदिरा जैसा होगा.


दूसरी ओर, यशवंत की अगर अपनों दोस्ती टूट रही है तो पराये उन्हें गले लगाने में हिचक नहीं रहे हैं. कभी कांग्रेस नेता मनीष तिवारी के किताब के विमोचन में, तो कभी महाराष्ट्र में किसानों के लिए रैली करने वाले यशवंत, बीजेपी विरोधी दलों की आंख का तारा बन गए हैं. हालांकि, तमाम विपक्षी दलों में से यशवंत की करीबी अगर किसी के साथ सबसे ज्यादा बढ़ी है तो वह आम आदमी पार्टी है.

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कांग्रेस के नेता भले ही यशवंत के बयानों की हां में हां मिला दें, लेकिन आजीवन कांग्रेस विरोध की राजनीति करने वाले यशवंत के लिए पार्टी में शामिल होना इतना आसान नहीं होगा. वहीं, कांग्रेस भी यशवंत को शामिल कराने को लेकर असहज हो सकती है. रही बात अन्य विपक्षी दलों की तो उनके साथ यशवंत सिर्फ हाथ मिलाते ही दिख रहे है. अगर 'आप'  की बात करें तो यहां यशवंत के दिल भी मिल रहे हैं और हाथ भी.

बीते दिनों दिल्ली से सटे नोएडा में 'आप' की एक जनअधिकार रैली में यशवंत सिन्हा शामिल हुए थे. इसमें खुद दिल्ली के सीएम केजरीवाल भी मौजूद थे.


इस दौरान केजरीवाल ने कहा था, 'आप कह चुके हैं कि चुनाव नहीं लड़ेंगे. लेकिन अगर आप जैसे अच्छे लोग चुनाव नहीं लड़ेंगे तो फिर कौन लड़ेगा?" इसके बाद दिल्ली के मुख्यमंत्री ने जनता से सवाल किया, 'आप बताइये कि यशवंत सिन्हा को चुनाव लड़ना चाहिए या नहीं?' हालांकि यशवंत ने केजरीवाल की तारीफ तो की, लेकिन इस सवाल का कोई जवाब नहीं दिया. इससे पहले भी कई बार 'आप' यशवंत की तारीफ कर चुकी है. साल 2016 में दिल्ली सरकार ने अपना बजट पेश करने से पहले कहा था कि यशवंत सिन्हा बजट पर केजरीवाल सरकार के मार्गदर्शक हैं.

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यशवंत ने 'आप'  विधायकों को बजट की बारीकियां भी सिखाई थीं. वहीं, केंद्र की आर्थिक नीतियों पर यशवंत के हमलों के चलते खुद उनके बेटे जयंत को मैदान में आना पड़ा. यशवंत ने एक ओर जहां नोटबंदी, जीएसटी और डिजिटल पेमेंट को लेकर केंद्र की मोदी सरकार की आलोचना की थी, वहीं जयंत ने इन सभी नीतियों को गेमचेंजर बताया था. जीएसटी पर यशवंत ने एक लेख के जरिए कहा था, 'वर्तमान वित्त मंत्री ने जीएसटी लागू करते वक्त दिमाग का इस्तेमाल ही नहीं किया.'

यशवंत सिन्हा की 'आप'  से करीबी की बात करें तो इसी साल जनवरी में राष्ट्रपति की ओर से पार्टी के 20 विधायकों को अयोग्य घोषित करने को वह तुगलकी फरमान बता चुके हैं. ऐसे में केजरीवाल के हालिया प्रस्ताव और यशवंत की ओर से तारीफ किए जाने के बाद यह अटकलें लगाई जा रही हैं कि सिन्हा फिर से चुनावी राजनीति में उतर सकते हैं.

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यूं तो अभी तक यशवंत को बीजेपी ने अब तक पार्टी से बाहर का रास्ता नहीं दिखाया है लेकिन अप्रैल में उन्होने कहा था कि उनका अब किसी दल से कोई संबंध नहीं है और वह दलगत राजनीति से संन्यास ले रहे हैं. जानकारों का मानना है कि यशवंत को 'आप' में  लाकर केजरीवाल पार्टी में मचे घमासान पर कुछ हद तक लगाम लगाने में सफल हो सकते हैं.

अब यह देखना दिलचस्प होगा कि खुद ही दलगत राजनीति से संन्यास का ऐलान कर चुके यशवंत क्या केजरीवाल पर हामी भरेंगे या अपनी बात पर कायम रहेंगे.


अगर यशवंत अपनी बात पर यूटर्न लेते हुए चुनावी राजनीति में आ भी जाते हैं तो क्या वह साल 2019 के लोकसभा चुनाव में  कोई बड़ा नुकसान पहुंचा सकेंगे?

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