कोर्ट के इस आदेश से अयोध्या केस की सुनवाई में हो सकती है और देरी

Ehtesham Khan | News18Hindi
Updated: January 10, 2019, 10:10 PM IST
कोर्ट के इस आदेश से अयोध्या केस की सुनवाई में हो सकती है और देरी
प्रतीकात्मक तस्वीर

इस मामले में 88 गवाह हैं जिनके बयान 13,886 पन्नों में हैं. 257 एक्जीबिट हैं. इन एक्जीबिट में तीन एएसआई की रिपोर्ट है जो कई पन्नों में है.

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अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को सुनवाई 29 जनवरी तक के लिए टाल दी है. वजह बनी जस्टिस यूयू ललित की बेंच में मौजूदगी. क्योंकि पांच जजों के संविधान पीठ में से जस्टिस ललित ने सुनवाई से खुद को अलग कर लिया. अब नई बेंच का गठन होगा. इसमें जस्टिस ललित की जगह कोई और जज रहेंगे. लेकिन, आज के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में एक और बात अहम है. अगर इस आदेश पर गौर करेंगे तो पता चलेगा कि इस मामले में सुनवाई शुरू होने में कुछ समय और लग सकता है.

आज के आदेश में सीजेआई रंजन गोगोई ने लिखा है कि इस मामले में 88 गवाह हैं जिनके बयान 13,886 पन्नों में हैं. 257 एक्जीबिट हैं. इन एक्जीबिट में तीन एएसआई की रिपोर्ट है जो कई पन्नों में है. हाईकोर्ट का जजमेंट 4,304 पन्नों में है जोकि टाइप करने पर 8,533 पन्नों में आता है. इसके अलावा 15 बक्सों में दस्तावेज़ हैं, जिन्हें सील करके एक सीलबन्द कमरे में रखा गया है. इसमें दस्तावेज़ फारसी, संस्कृत, अरबी, गुरुमुखी, उर्दू, हिंदी और कई जुबान में हैं.

सीजेआई गोगोई ने सुनवाई के दौरान कहा कि अभी ये साफ नहीं है कि इन सबका अनुवाद हुआ है या नहीं. उन्होंने आगे लिखा कि 10 अगस्त 2015 के सुप्रीम कोर्ट के आदेश से साफ है कि कुछ पक्षकारों ने अनुवाद को लेकर आपत्ति जताई थी.

रंजन गोगोई ने कहा कि इसके मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री को आदेश दिया जाता है कि इन दस्तावेज़ों की जांच करें और ये पता करें कि क्या सारे अनुवाद हो गए हैं? और सुनवाई के लिए तैयार हैं. अगर ज़रूरत हो तो सुप्रीम कोर्ट के अनुवादक से मदद ली जाए. रजिस्ट्री कोर्ट को बताए कि ये सब करने में कितना समय लगेगा. इस बाबत एक रिपोर्ट कोर्ट को 29 जनवरी तक सौंपी जाए.

यानी अगर अनुवाद को लेकर कोई आपत्ति किसी भी पक्षकार के तरफ से उठाई जाती है तो फिर सुनवाई से पहले अनुवाद का काम किया जाएगा. और इसमें काफी समय लग सकता है.

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इससे पहले 2015 में सुनवाई के दौरान मुस्लिम पक्षकारों की तरफ से वकील कपिल सिब्बल ने जस्टिस दीपक मिश्रा के सामने ये बात उठाई थी. उन्होंने कहा था कि अनुवाद का काम सुप्रीम कोर्ट के ऑफिसियल अनुवादक से ही कराया जाए. ये इसलिए ज़रूरी था क्योंकि हर पक्ष अनुवाद अपनी तरह से करेगा. इससे निष्पक्षता नहीं रहेगी. लेकिन तभी जस्टिस मिश्रा ने कहा था कि हर पक्ष अपना अपना अनुवाद जमा कर दे.
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जिस अनुवाद पर आपत्ति होगी उसे किसी अन्य अनुवादक से अनुवाद कराया जाएगा. उस आदेश के बाद दोनों ही पक्षों ने अपने अपने दावों से जुड़े दस्तावेज़ अपने अनुवादक से अनुवाद करके कोर्ट में जमा कर दिया था. अब अगर अनुवाद का मामला दोबारा उठाया जाता है तो सुनवाई शुरू होने में और देरी हो सकती है.

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First published: January 10, 2019, 7:19 PM IST
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