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प्रेमचंद की कहानी 'त्रिया चरित्र' - भाग एक

कहानी का नाम है त्रिया चरित्र. पहली नजर में यह शब्द कुछ अजीब लग सकता है लेकिन इसे जिस सुदंरता के साथ प्रेमचंद ने लिखा है, वह हमारी आपकी कल्पना से परे की बात है.

कहानी का नाम है त्रिया चरित्र. पहली नजर में यह शब्द कुछ अजीब लग सकता है लेकिन इसे जिस सुदंरता के साथ प्रेमचंद ने लिखा है, वह हमारी आपकी कल्पना से परे की बात है.

कहानी का नाम है त्रिया चरित्र. पहली नजर में यह शब्द कुछ अजीब लग सकता है लेकिन इसे जिस सुदंरता के साथ प्रेमचंद ने लिखा है, वह हमारी आपकी कल्पना से परे की बात है.

दोस्तों न्यूज 18 हिन्दी के आज के पॉडकास्ट में आपका स्वागत है. स्वीकार करिए पूजा प्रसाद का नमस्कार. दोस्तो, जीवन बहुत छोटा है. दुनिया भी बहुत छोटी है. कब किस से किस मोड़ पर मुलाकात हो जाए, यह कोई नहीं जानता. आज जो कहानी मैं आपके सामने पेश करने जा रही हूं उसमें इस बात को कालजयी कथाकार प्रेमचंद ने बेहद खूबसूरती से पिरोया है. कहानी का नाम है त्रिया चरित्र. पहली नजर में यह शब्द कुछ अजीब लग सकता है लेकिन इसे जिस सुदंरता के साथ प्रेमचंद ने लिखा है, वह हमारी आपकी कल्पना से परे की बात है. तो आइए उनकी कल्पना में हम शरीक हों और सुनें यह कहानी….

त्रिया-चरित्र

सेठ लगनदास जी के जीवन की बगिया फलहीन थी। कोई ऐसा मानवीय, आध्यात्मिक या चिकित्सात्मक प्रयत्न न था जो उन्होंने न किया हो। यों शादी में एक पत्नीव्रत के कायल थे मगर जरूरत और आग्रह से विवश होकर एक-दो नहीं पॉंच शादियॉं कीं, यहॉं तक कि उम्र के चालीस साल गुजए गए और अँधेरे घर में उजाला न हुआ। बेचारे बहुत रंजीदा रहते। यह धन-संपत्ति, यह ठाट-बाट, यह वैभव और यह ऐश्वर्य क्या होंगे। मेरे बाद इनका क्या होगा, कौन इनको भोगेगा। यह ख्याल बहुत अफसोसनाक था। आखिर यह सलाह हुई कि किसी लड़के को गोद लेना चाहिए। मगर यह मसला पारिवारिक झगड़ों के कारण के सालों तक स्थगित रहा। जब सेठ जी ने देखा कि बीवियों में अब तक बदस्तूर कशमकश हो रही है तो उन्होंने नैतिक साहस से काम लिया और होनहार अनाथ लड़के को गोद ले लिया।

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उसका नाम रखा गया मगनदास। उसकी उम्र पॉंच -छ: साल से ज्यादा न थी। बला का जहीन और तमीजदार। मगर औरतें सब कुछ कर सकती हैं, दूसरे के बच्चे को अपना नहीं समझ सकतीं। यहॉं तो पॉंच औरतों का साझा था। अगर एक उसे प्यार करती तो बाकी चार औरतों का फज्र था कि उससे नफरत करें। हॉं, सेठ जी उसके साथ बिलकुल अपने लड़के की सी मुहब्बत करते थे। पढ़ाने को मास्टर रक्खें, सवारी के लिए घोड़े। रईसी ख्याल के आदमी थे। राग-रंग का सामान भी मुहैया था। गाना सीखने का लड़के ने शौक किया तो उसका भी इंतजाम हो गया। गरज जब मगनदास जवानी पर पहुँचा तो रईसाना दिलचास्पियों में उसे कमाल हासिल था। उसका गाना सुनकर उस्ताद लोग कानों पर हाथ रखते।

कहानी साभार- https://epustakalay.com/​

Tags: Books, Lifestyle, Podcast

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