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‘चिदंबरम चाहते तो रुक सकता था 2जी घोटाला’

‘चिदंबरम चाहते तो रुक सकता था 2जी घोटाला’

पौने दो लाख करोड़ रुपये के टेलीकॉम घोटाले में एक अहम मोड़ आ गया है। अब इस घोटाले के घेरे में गृह मंत्री पी चिदंबरम भी आ गए हैं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय से प्रधानमंत्री कार्यालय को एक लंबी-चौड़ी चिट्ठी भेजी गई है।

पौने दो लाख करोड़ रुपये के टेलीकॉम घोटाले में एक अहम मोड़ आ गया है। अब इस घोटाले के घेरे में गृह मंत्री पी चिदंबरम भी आ गए हैं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय से प्रधानमंत्री कार्यालय को एक लंबी-चौड़ी चिट्ठी भेजी गई है।

पौने दो लाख करोड़ रुपये के टेलीकॉम घोटाले में एक अहम मोड़ आ गया है। अब इस घोटाले के घेरे में गृह मंत्री पी चिदंबरम भी आ गए हैं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय से प्रधानमंत्री कार्यालय को एक लंबी-चौड़ी चिट्ठी भेजी गई है।

  • News18India
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    नई दिल्ली। पौने दो लाख करोड़ रुपये के टेलीकॉम घोटाले में एक अहम मोड़ आ गया है। अब इस घोटाले के घेरे में गृह मंत्री पी चिदंबरम भी आ गए हैं। वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी के मंत्रालय से प्रधानमंत्री कार्यालय को एक लंबी-चौड़ी चिट्ठी भेजी गई है। इस चिट्ठी ने टेलीकॉम घोटाले के वक्त वित्त मंत्री रहे पी चिदंबरम की भूमिका को कठघरे में खड़ा कर दिया है। ये चिट्ठी 25 मार्च 2011 को भेजी गई जिसमें साफ लिखा गया है कि अगर चिदंबरम का मंत्रालय स्पेक्ट्रम की नीलामी के अपने शुरुआती फैसले पर अटल रहता तो टेलीकॉम मंत्रालय को तमाम लाइसेंस रद्द करने पड़ते। टेलीकॉम मंत्रालय उस वक्त था ए राजा के पास जो इस वक्त जेल में कैद हैं। साफ है ये चिट्ठी स्पेक्ट्रम की कम कीमत वसूलने के लिए न सिर्फ राजा, बल्कि चिदंबरम को भी बराबर का जिम्मेदार ठहराती है।

    वित्त मंत्रालय में उप निदेशक पद पर तैनात डॉ. पी जी एस राव ने प्रधानमंत्री कार्यालय में संयुक्त सचिव विनी महाजन को 25 मार्च को ये चिट्ठी भेजी थी। विषय था-2जी स्पेक्ट्रम का आवंटन और मूल्य निर्धारण। वित्त मंत्रालय की ये चिट्ठी आरटीआई कार्यकर्ता विवेक गर्ग ने हासिल की है। प्रणब मुखर्जी का मंत्रालय ऐसी चिट्ठी प्रधानमंत्री कार्यालय को लिख रहा है। इसके मायने साफ हैं, प्रणब मुखर्जी ये संकेत देना चाह रहे हैं कि अगर चिदंबरम अड़ जाते तो शायद टेलीकॉम घोटाले के चलते देश को लाखों करोड़ों रुपयों का नुकसान न होता।

    मंत्रालय पीएमओ को भेजी अपनी चिट्ठी में कहता है कि वित्त मंत्रालय 31 दिसंबर 2008 तक के लाइसेंस 2001 के भाव पर बेचने के लिए तैयार हो गया। तत्कालीन वित्त सचिव और मौजूदा आरबीआई गवर्नर डी सुब्बाराव ने 22 नवंबर 2007 को एक चिट्ठी लिखकर कहा था कि मोबाइल लाइसेंस के लिए 2001 के वक्त की इंट्री फीस यानि 1600 करोड़ रुपए ही लिए जाएंगे, ये इंट्री फीस मौजूदा बाजार भाव से नहीं वसूली जाएगी।

    पीएमओ को भेजे गए वित्त मंत्रालय के नोट में तो ये कहानी और आगे बढ़ जाती है। यहां तक कहा गया था कि 4.4 मेगाहर्ट्ज तक के स्पेक्ट्रम के लिए ज्यादा पैसे नहीं वसूलने की सहमति राजा और चिदंबरम के बीच बन चुकी थी। वित्त मंत्रालय की 11 पन्नों की ये चिट्ठी आने वाले वक्त में चिदंबरम के लिए आफत का सबब बन सकती है। वित्त मंत्रालय की चिट्ठी पौने दो लाख करोड़ के बताए जा रहे टेलीकॉम घोटाले की और गहराई में उतरती है और कई तारीखों का जिक्र करती है।

    15 जनवरी 2008 - यानि ए राजा के टेलीकॉम कंपनियों को 121 लेटर ऑफ इंटेंट देने के 5 दिन बाद चिदंबरम प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को एक अति गोपनीय चिट्ठी भेजते हैं। इसमें चिदंबरम साफ लिखते हैं कि स्पेक्ट्रम आवंटन के पुराने मामलों का किस्सा बंद करें, इसे क्लोज्ड चैप्टर समझा जाए। 30 जनवरी, 2008 - 15 दिन बाद चिदंबरम और ए राजा मिलते हैं। तत्कालीन वित्त मंत्री ये साफ कह देते हैं कि वो अब न टेलीकॉम स्पेक्ट्रम की इंट्री फीस और न ही सरकार की कमाई के सिलसिले में मौजूदा सिस्टम पर दोबारा विचार करेंगे।

    ये हाल तब है जब चिदंबरम के खुद के मंत्रालय ने ए राजा की नीयत को लेकर अपनी भवें टेढ़ी की थीं। ये हाल तब है जब राजा के मंत्रालय के दूरसंचार कंपनियों को लेटर ऑफ इंटेंट देने के एक महीने बाद तक खुद चिदंबरम के मंत्रालय ने उसपर एतराज जताना जारी रखा था।

    Tags: 2G scam, A Raja, Telecom scam

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