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दिल्ली विधानसभा चुनाव की खास 10 बातें...

दिल्ली विधानसभा चुनाव की खास 10 बातें...

दिल्ली में चुनाव की घोषणा हो चुकी है और इसी के साथ नई सरकार के लिए होने वाली जंग का मैदान भी सज चुका है। ये जंग पिछले चुनावी मुकाबलों की तुलना में काफी अलग होगी

दिल्ली में चुनाव की घोषणा हो चुकी है और इसी के साथ नई सरकार के लिए होने वाली जंग का मैदान भी सज चुका है। ये जंग पिछले चुनावी मुकाबलों की तुलना में काफी अलग होगी

दिल्ली में चुनाव की घोषणा हो चुकी है और इसी के साथ नई सरकार के लिए होने वाली जंग का मैदान भी सज चुका है। ये जंग पिछले चुनावी मुकाबलों की तुलना में काफी अलग होगी

    श्रवण शुक्ल
    नई दिल्ली। दिल्ली में चुनाव की घोषणा हो चुकी है और इसी के साथ नई सरकार के लिए होने वाली जंग का मैदान भी सज चुका है। ये जंग पिछले चुनावी मुकाबलों की तुलना में काफी अलग होगी। हो भी क्यों न, ये दिल्ली की सत्ता है जिसे हथियाने के लिए न जाने कितने भीषण युद्ध इतिहास ने देखे हैं। आज ये सत्ता बुलेट, बम या हथियारों के दम पर नहीं बल्कि बैलेट के दम पर हासिल की जाती है। जानिए वो 10 बातें जो इन चुनावों को खास बनाती हैं।

    चुनावी रणनीतिः दिल्ली विधानसभा चुनाव में तीनों प्रमुख दलों ने अपनी पूरी ताकत झोंक दी है। आम आदमी पार्टी पूरे देश के कार्यकर्ताओं की फौज चुनाव प्रचार में उतारने को तैयार है, तो बीजेपी ने अपने सभी सांसदों, मंत्रियों को चुनाव प्रचार में उतारा है। इस चुनाव में एक बार फिर से बीजेपी को आरएसएस से मदद मिलेगी, जो हाल के हर चुनाव में बीजपी को निर्णायक बढ़त दिलाने के पीछे रही है। दिल्ली के नगर निगम चुनाव में आरएसएस काडर ने चुनाव से महज 6 दिन पहले दिल्ली में आकर पूरे नतीजों को बदल दिया था और पहली बार तीन नगर निगमों में बंटी दिल्ली के हर निगम में बीजेपी को बहुमत दिलाया था।

    पूर्व सीएम बनाम मौजूदा पीएमः ये चुनाव आम आदमी पार्टी और बीजेपी दोनों के लिए ही निर्णायक है। एक तरफ आम आदमी पार्टी के लिए ये चुनाव उसके अस्तित्व का सवाल है तो दूसरी तरफ बीजेपी के लिए ये मोदी लहर की असली परीक्षा है। पीएम नरेंद्र मोदी खुद प्रचार के लिए हुंकार भर चुके हैं, तो आप के संयोजक अरविंद केजरीवाल पीएम मोदी पर निशाना साधते ही बीजेपी पर बढ़त बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि अरविंद केजरीवाल की इस कोशिश की हकीकत ये है कि पीएम नरेंद्र मोदी दिल्ली की राजनीति में सिर्फ प्रचार कर रहे हैं, किसी से मुकाबला नहीं कर रहे हैं।

    त्रिकोणीय मुकाबलाः दिल्ली में विधानसभा के गठन के बाद पहला ऐसा मौका है जब दो पार्टियां सीधी लड़ाई न लड़कर यहां त्रिकोणीय मुकाबले में हैं। अबतक दिल्ली में सिर्फ बीजेपी और कांग्रेस की सीधी टक्कर होती थी, उसे आप ने दिलचस्प बना दिया है। हालांकि आप पिछले चुनाव में सभी राजनीतिक पंडितों को चौंका चुकी है, ऐसे में आप इस बार अपनी पूरी ताकत झोंककर ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की कोशिश करेगी। वहीं, बीजेपी ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा से जोड़कर अपनी रणनीति बनाई है। बीजेपी नेताओं को भी पता है कि चुनाव इसबार पहले की तरह नहीं है, बल्कि दिल्ली की राजनीति अब उलझ चुकी है।

    तकनीक का इस्तेमालः इस चुनाव में सभी पार्टियां तकनीक का शानदार इस्तेमाल कर रही हैं। एक तरफ बीजेपी लोगों से डोर-टू-डोर कैंपेनिंग के माध्यम से जुड़ रही है, तो आप ने सोशल मीडिया के इस्तेमाल पर जोर देने के साथ ही लोगों के घरों तक पहुंचने का प्लान बनाया है। इस चुनाव में तकनीक का ऐसा इस्तेमाल हो रहा है कि बीजेपी ने अपने प्रत्याशियों के लिए फेसबुक और ट्विटर का इस्तेमाल अनिवार्य बना दिया है। प्रत्याशियों के लिए बीजेपी ने एक शर्त ये भी रखी है कि ट्विटर पर उसके कम से कम 50 हजार फॉलोवर्स हों।

    काउंटर अटैकः दिल्ली में विधानसभा चुनाव ने पहली बार ऐसा माहौल तैयार कर दिया है, जिसमें सभी पार्टियों को एड़ी-चोटी का जोर लगाना पड़ रहा है। ऐसा पहली बार हो रहा है कि एफएम रेडियो पर एक संदेश आता है, जिसमें किसी पार्टी को निशाना बनाया जाता है, तो थोड़ी ही देर बाद उसी एफएम चैनल पर विपक्षी पार्टी का संदेश आता है, जो दूसरे तो झूठा ठहराता है। ऐसे संदेशों से जनता पर फर्क पड़े या न पड़े, लेकिन जनता राजनीतिज्ञों से मूड को जरूर भांप रही है। राजनीतिक पार्टियां इस तरह के प्रचार से एक दूसरे पर निशाना साधने का ही प्रयास कर रही हैं।

    पुराने ताकतवर चेहरे गायबः दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार वो तमाम चेहरे गायब नजर आ रहे हैं, जो अबतक दिल्ली की राजनीति की धुरी हुआ करते थे। बात अगर कांग्रेस की करें, तो दिल्ली की 15 साल तक मुख्यमंत्री के तौर पर अगुवाई कर चुकीं शीला दीक्षित विधानसभा चुनाव में हार के बाद से ही सक्रिय राजनीति से गायब हैं (हालांकि वो चुनाव प्रचार करेंगी), तो लोकसभा चुनाव के बाद से बीजेपी के अहम चेहरे डॉ हर्षवर्धन और विजय गोएल केंद्र की राजनीति कर रहे हैं। इस बार न ही कांग्रेस और न ही बीजेपी (पीएम नरेंद्र मोदी को छोड़कर) के पास कोई चेहरा है, जिसके दम पर वो वोट मांग सकें। वहीं, आप पूरी तरह से अरविंद केजरीवाल के भरोसे है और केजरीवाल आगे बढ़कर पार्टी का नेतृत्व भी कर रहे हैं। हालांकि केजरीवाल के लिए बीजेपी का तूफान थामना आसान नहीं होगा, क्योंकि एक तरफ बीजेपी के लिए पीएम नरेंद्र मोदी ने प्रचार की बागडोर थाम ली है, तो बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने दिल्ली चुनाव के लिए विशेष रणनीति बनाई है।

    मुद्दों में बदलाव- भ्रष्टाचार न होकर विकासः दिल्ली में पिछले विधानसभा चुनाव और इस चुनाव में मुख्य बात मुद्दे का बदलना रहा। पिछले चुनाव में मुद्दा भ्रष्टाचार का था, वहीं इस चुनाव में मुद्दा विकास है। आप ने भ्रष्टाचार विरोधी अपने मुद्दे में बदलाव कर सब्सिडी देने और स्थानीय सरकार को प्राथमिकता दी है। वो अब लोगों को समझाने में जुटी है कि दिल्ली में पिछली बार सरकार से भागना उनकी गलती थी, लेकिन अब वो नहीं भागेगी। वहीं बीजेपी इस बार सिर्फ विकास के मुद्दे को हथियार बनाए हुए है।

    सिर्फ चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि पूर्ण बहुमत की लड़ाईः दिल्ली विधानसभा के इस चुनाव में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की लड़ाई लड़ी जा रही है। बीजेपी केंद्र में पूर्ण बहुमत की सरकार की दुहाई दे रही है, तो आप पूरी तरह से बहुमत की आस में है। केजरीवाल लोगों से वादे कर रहे हैं, कि जनता इस बार चुनाव में उन्हें पूर्ण बहुमत दे, ताकि वो 5 साल तक राज्य की सेवा करें।

    बागियों से निपटनाः आंतरिक विद्रोहों से निपटना इस बार सभी पार्टियों के लिए बड़ी चुनौती है। कांग्रेस पिछले चुनाव से इस समस्या से जूझ रही है। उसके तमाम नेता लगातार पार्टी से किनारे जा रहे हैं, वहीं बीजेपी के सामने ऐसी दिक्कत तो है, लेकिन बड़ी टूट की संभावना नजर नहीं आती। आम आदमी पार्टी के साथ ये दिक्कत पिछले दिल्ली चुनाव के साथ ही शुरू हो गई थी। आप की सरकार बनने के साथ ही विनोद कुमार बिन्नी ने बगावत की, तो सरकार जाने के बाद अश्विनी महाजन और एमएस धीर जैसे पार्टी के बड़े नेताओं ने। इस समय योगेंद्र यादव जैसा बड़ा नेता पार्टी के लिए सक्रिय नजर नहीं आ रहा, जोकि आप के लिए बड़ी चुनौती है।

    कमजोर कांग्रेसः ये विधानसभा चुनाव ऐसा पहला चुनाव है, जिसमें कांग्रेस कहीं से भी लड़ाई में नजर नहीं आ रही। दिल्ली कांग्रेस का सबसे बड़ा चेहरा रही और 15 साल तक सरकार की अगुवाई करने वाली शीला दीक्षित के बाद कांग्रेस का कोई बड़ा नेता नजर नहीं आता। कांग्रेस के पास दूसरी पीढ़ी के नेता बीजेपी के पीएम नरेंद्र मोदी के सामने कहीं नहीं ठहरते, वहीं आम आदमी पार्टी के पास भी केजरीवाल के अलावा कोई चेहरा नहीं है। ये चुनाव कांग्रेस की नई लीडरशिप के लिए भी चुनौती है, जिसकी अगुवाई अरविंदर सिंह लवली और हारुन यूसुफ जैसे नेता कर रहे हैं।

    Tags: AAP, BJP, Congress, New Delhi

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