संपादकीय: आम आदमी पार्टी का नग्न होना!

संपादकीय: आम आदमी पार्टी का नग्न होना!
बीते कुछ दिनों ने ये बात पुख्ता की है कि आम आदमी पार्टी का डीएनए ठीक वैसा ही है जैसा कांग्रेस, बीजेपी, एसपी, बीएसपी का है।

बीते कुछ दिनों ने ये बात पुख्ता की है कि आम आदमी पार्टी का डीएनए ठीक वैसा ही है जैसा कांग्रेस, बीजेपी, एसपी, बीएसपी का है।

  • Last Updated: March 5, 2015, 9:13 AM IST
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मैं और मेरे जैसे कई लोग जो इस उम्मीद में थे कि कहीं न कहीं से भारत में एक राजनीतिक सुधार की शुरुआत जरूर होगी, कहीं न कहीं कोई जमीनी परिवर्तन जरूर आएगा, को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि दिन रात ईमानदारी, खुलेपन, लोकतंत्र का ढिंढोरा पीटने वाली आम आदमी पार्टी इतनी बुरी तरह भरे चौराहे पर अपने लोकतंत्र के आवरण को उतार कर नग्न हो जाएगी। हां, मैं ये बात इसलिए कहूंगा क्योंकि आप की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बुधवार को हुई मीटिंग की स्क्रिप्ट केजरीवाल के हाथों पहले ही लिख दी गई थी।

केजरी इफेक्ट पहली बार ही देखने को नहीं मिला। बीते वक्त में भी कई लोग सीधे केजरीवाल पर तानाशाही का आरोप लगाकर पार्टी छोड़ गए। लेकिन पार्टी उन आरोपों का सामना कर अपना बचाव करने में कामयाब रही। आप को दिल्ली का भरपूर जनादेश मिला। पर हालिया प्रकरण ने पार्टी के कड़वे सच को आखिरकार सबके सामने ला ही दिया। मयंक गाधी के ब्लॉग ने साफ कर दिया कि योगेंद्र और प्रशांत की पीएसी से छुट्टी दरअसल केजरीवाल की इच्छा का परिणाम भर ही है। एक बार फिर उंगली केजरीवाल की तरफ उठी है। जो बार-बार जवाब देने के लिए सबको चुनौती देने के लिए जाने जाते हैं। वो हर नेता से सवाल पूछते हैं लेकिन क्या ये उचित नहीं है कि वह खुद जनता के सामने आएं और ये बताएं कि अपनी ही पार्टी में लोकतंत्र का गला घोंटे जाने के हालात क्यों बने। पर केजरीवाल में लगता है कि अपनी ओर आते सच के गोलों का सामना करने की जरा भी ताकत नहीं है। उन्होंने ऐलान कर दिया कि 5 तारीख से वो इलाज कराने के लिए बाहर जा रहे हैं। क्या जनता को ये नहीं दिख रहा कि वो सवालों के तीरों से बचने की कोशिश में बाहर जा रहे हैं।

ये पूरा प्रकरण दुखद और हैरान करने वाला है क्योंकि नई पार्टी से लोकतंत्र की नई परंपराएं स्थापित करने की उम्मीद सभी को थी लेकिन हुआ वही जो बाकी पार्टियों में होता रहा है। पार्टी व्यक्तिवाद की ओर बढ़ चली है, लोकतंत्र किसी एक की मर्जी का गुलाम बन चुका है। आदर्शों पर बेईमानी ने व्यावहारिकता का मुलम्मा ओढ़कर दबाव बना लिया है। इस दमघोंटू माहौल में किसी की तो बलि चढ़नी ही थी और वो चढ़ी...पर सवाल ये है कि अगर बाकी पार्टियों के वही दंद-फंद, वही व्यक्तिवाद के मुलम्मे अगर आप ओढ़ती है तो फिर ईमानदारी, लोकतंत्रवादी होने का स्वांग क्यों रचती है।



इस पार्टी के निर्माण से ही देशभर के लोगों के मन में ये बात घर कर गई कि जो भी हो लेकिन केजरीवाल की पार्टी ईमानदारों की टोली है जिसे न सिर्फ बाहर बल्कि अपने घर में भी लोकतंत्र में भी यकीन है लेकिन बीते कुछ दिनों ने ये बात पुख्ता की है कि आम आदमी पार्टी का डीएनए ठीक वैसा ही है जैसा कांग्रेस, बीजेपी, एसपी, बीएसपी का है।



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