केजरीवाल कितनी बदल पाए गुजरात की सियासी बयार?

केजरीवाल कितनी बदल पाए गुजरात की सियासी बयार?
केजरीवाल की सोच साफ है कि अगर हार्दिक उनके साथ आते हैं तो आप जीपीपी की तरह महज वोट कटुआ पार्टी नहीं रहेगी, बल्कि अच्छी खासी सीटें हासिल कर सकती है...

केजरीवाल की सोच साफ है कि अगर हार्दिक उनके साथ आते हैं तो आप जीपीपी की तरह महज वोट कटुआ पार्टी नहीं रहेगी, बल्कि अच्छी खासी सीटें हासिल कर सकती है...

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अहमदाबाद। तीन दिन का गुजरात दौरा पूरा कर आम आदमी पार्टी के संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल वापस लौट गए हैं। राजनीति के जानकार राज्य में उनके दौरे के बाद के सियासी समीकरणों का आकलन करने में जुटे हैं। बीजेपी शासित इस राज्य में आम आदमी पार्टी की जड़ें मजबूत करने में केजरीवाल कितने सफल रहे ये तो वक्त बताएगा लेकिन अपने दौरे में उन्होंने जिस तरह पाटीदारों की नाराजगी को भुनाने और जातिगण समीकरणों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की वो दूसरी पार्टियों के लिए चिंता पैदा कर सकता है।

16 अक्टूबर की सूरत की रैली गुजरात में आप संयोजक अरविंद केजरीवाल की पहली राजनीतिक रैली थी। मंच से बीजेपी पर बेहद तीखे वार हुए। ये दिखाने की कोशिश की गई कि जिस जगह पर बीजेपी रैली नहीं कर सकी वहां, सभी अवरोधों के बावजूद पार्टी ने न सिर्फ रैली की, बल्कि उसे सफल भी बनाया।

अरविंद केजरीवाल ने इस दौरे में पाटीदार कार्ड का भरपूर राजनीतिक फायदा उठाने की कोशिश की। चाहे आरक्षण आंदोलन में मारे गए युवाओं के परिवार से मुलाकात हो, चाहे पाटीदारों की मांगों पर गौर करने की बात हो, चाहे हार्दिक पटेल को गुजरात में आप की सरकार बनने पर मुख्यमंत्री पद देने की घोषणा की बात हो।



केजरीवाल गुजरात में पाटीदारों की ताकत को भलीभांति समझते हैं। बीजेपी से बढ़ी पाटीदारों की दूरियों का वो फायदा उठाना चाहते हैं लेकिन क्या ऐसा हो पाएगा? केजरीवाल साफ कर चुके हैं कि वो 182 सीटों वाली गुजरात विधानसभा के चुनाव में 160 से ज्यादा सीटों पर लड़ेंगे। खासकर गांवों में ‘आप’ के प्रत्याशी होंगे। इसके पीछे का गणित समझने के लिए पिछले विधानसभा चुनावों पर नजर डालनी होगी।
2012 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी को ज्यादा सीटें शहरी इलाकों से मिली थीं। इसकी वजह थी डीलिमिटेशन जिसका फायदा बीजेपी को हुआ और उसकी शहरी सीटों में इजाफा हुआ। उस समय पाटीदारों की नाराजगी का थोड़ा फायदा केशुभाई की गुजरात परिवर्तन पार्टी यानी जीपीपी ने लिया लेकिन वो केवल वोट कटुआ पार्टी बनकर उभरी। जीपीपी ने बीजेपी से ज्यादा, कांग्रेस को नुकसान पहुंचाया। बीजेपी की जीत का अंतर कम जरूर हुआ लेकिन जीपीपी को महज दो सीटें मिल पाईं हालांकि 2012 के मुकाबले अभी परिदृश्य थोड़ा अलग है। इस बार पाटीदारों का एक बड़ा गुट बीजेपी से नाराज है, जिसकी अगुवाई पाटीदारों के युवा नेता हार्दिक पटेल कर रहे हैं।

केजरीवाल की सोच साफ है कि अगर हार्दिक उनके साथ आते हैं तो आप जीपीपी की तरह महज वोट कटुआ पार्टी नहीं रहेगी बल्कि अच्छी खासी सीटें हासिल कर सकती है लेकिन फिलहाल यह मुंगेरी लाल के सपने जैसा है। सोशल मीडिया पर केजरीवाल हार्दिक के समर्थन में भले ही लिखते हों और उनको देशप्रेमी करार देते हों लेकिन हार्दिक ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। वैसे भी हार्दिक अभी 25 साल के नहीं हुए। ऐसे में इस बार के विधानसभा चुनाव तो वे किसी हाल में नहीं लड़ पाएंगे। केजरीवाल भी ये जानते हैं। ऐसे में हार्दिक को सीएम बनाने की बात केवल कहने के लिए ही है, कोशिश यही कि उसके नाम और समर्थन पर‘आप’ की नैया पार हो जाए।

केजरीवाल की नजर सिर्फ पाटीदार वोटों पर नहीं है। तभी तो उनकी पार्टी का एक गुट ओबीसी नेता और हार्दिक पटेल के दोस्त अल्पेश ठाकुर से लगातार संपर्क बनाए हुए है। केजरीवाल अपने मंच से दलित नेता जिग्नेश मेवानी का नाम भी जोरशोर से उठा रहे हैं। कोशिश यही कि सभी युवा नेताओं को एक साथ लाया जाए जिससे पटेल, क्षत्रिय, दलित वोट एक साथ मिलें। हकीकत ये भी है कि हार्दिक केजरीवाल को पसंद करते हैं, जिग्नेश के आप से रिश्ते सार्वजनिक हो चुके हैं। वही अल्पेश को अब साथ लेना है।

गुजरात विधानसभा चुनाव में तकरीबन एक साल का वक्त है। संभावना तो जल्द चुनाव की भी जताई जा रही है। केजरीवाल के लिए युवा नेताओं को साथ लेने से पहले घर को मजबूत करने की जरूरत है। केजरीवाल की गुजरात इकाई में अभी न तो मजबूत संगठन है और न ही कोई बड़ा नेता। फिलहाल जो केजरीवाल के साथ मंच पर दिख रहे हैं उनमें से किसी में भी अपने दमखम पर चुनाव जिताने की काबिलियत नहीं है। ऐसे में दूसरों के सहारे मंजिल तक पहुंचना केजरीवाल के लिए किसी भी सूरत में आसान नहीं होगा।

 
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