मुलायम से कितना अलग होगा अखिलेश का समाजवाद?

चुनाव आयोग ने सीएम अखिलेश गुट को सपा के चुनावी चिह्न साइकिल का सही हकदार माना है। सवाल यह है कि अखिलेश का समाजवाद मुलायम के समाजवाद से कितना अलग होगा?

चुनाव आयोग ने सीएम अखिलेश गुट को सपा के चुनावी चिह्न साइकिल का सही हकदार माना है। सवाल यह है कि अखिलेश का समाजवाद मुलायम के समाजवाद से कितना अलग होगा?

चुनाव आयोग ने सीएम अखिलेश गुट को सपा के चुनावी चिह्न साइकिल का सही हकदार माना है। सवाल यह है कि अखिलेश का समाजवाद मुलायम के समाजवाद से कितना अलग होगा?

  • Share this:
नई दिल्‍ली। चुनाव आयोग ने समाजवादी पार्टी के नाम और चुनाव चिह्न 'साइकिल' पर उत्‍तर प्रदेश के सीएम अखिलेश यादव और उनके गुट को अधिकार दिया है। 4 अक्‍टूबर 1992 को मुलायम सिंह द्वारा स्‍थापित की गई समाजवादी पार्टी, 22 साल बाद उनके पुत्र अखिलेश यादव हाथों में चली गई है। अब समाजवादी पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष मुलायम सिंह यादव नहीं, बल्‍कि अखिलेश यादव हैं। यूपी में चुनाव से पूर्व आए इस अहम फैसले से राष्‍ट्रीय और क्षेत्रीय राजनीति के कई समीकरण बदल गए हैं। अखिलेश यादव खेमे में खुशी की लहर है, और वे पिता मुलायम सिंह यादव की विरासत से इतर, एक नये समाजवाद का दावा कर रहे हैं।

दरअसल, बीते दो महीने से यूपी की सत्‍ता पर काबिज इस सियासी परिवार की विवादों से भरी इस कहानी के पटाक्षेप के बाद अहम सवाल यह उठ रहा है कि जमीन से जुड़े और धरती पुत्र के नाम से समाजवाद की जड़ों को मजबूत करने वाले मुलायम सिंह यादव के बगैर अखिलेश की पार्टी कैसी होगी?  उनका असली समाजवाद पिता के कथित समाजवाद से कितना अलग होगा?

देखा जाए तो अखिलेश की तुलना में मुलायम सिंह यादव जमीन से जुड़े नेता रहे हैं। उन्‍होंने साइकिल से यूपी के दूर-दराज के इलाकों में प्रचार कर पार्टी को खड़ा किया है। यही नहीं उनके इस पुराने लंबे सफर में मोहन सिंह से लेकर, जनेश्‍वर मिश्र, आजम खां और बेनी प्रसाद वर्मा जैसे नेताओं का साथ भी रहा और सलाह भी, लेकिन इसकी तुलना में अखिलेश के पास सबकुछ नया है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा है कि अखिलेश का नया समाजवाद खुदको कथित रूप से राममनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव, जनेश्‍वर मिश्र, व मधु लिमिये जैसे दिग्‍गज समाजवादी नेताओं की विचारधारा का प्रतिनिधि होने का दावा करने वाले पिता मुलायम सिंह यादव के समाजवाद से कैसे अलग होगा?



मुंबई से वरिष्‍ठ पत्रकार अनुराग चतुर्वेदी कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव विचारवंत नेता कभी नहीं रहे, और न ही वे डॉ. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्र देव या फिर मधु लिमिये जैसे समाजवादी विचारधारा के प्रति प्रतिबद्ध लोगों के कभी प्रतिनिधि रहे हैं। दरअसल, लोहिया जिन मध्‍य जातियों को उभारना चाहते थे, वे उसी के प्रतिनिधि के रूप में उदित हुए हैं।
अनुराग कहते हैं कि 1992 में बाबरी मस्‍जिद विध्‍वंस के मामले पर उनके स्‍टैंड ने उन्‍हें धर्मनिरपेक्षवादियों के खेमे में खड़ा कर दिया और उनकी राष्‍ट्रीय छवि बन गई, लेकिन उन्‍होंने पार्टी में भाई-भतीजावाद, परिवारवाद, और कार्पोरेट कल्‍चर को बढ़ाया ही, जबकि बाद में बॉलीवुड की चमक-धमक ने भी कई तरह के विवाद पैदा किए।

अनुराग के मुताबिक मुलायम सिंह यादव का यह राजनीतिक बियाबान का समय है, और अब यूपी में उनके पुत्र द्वारा इस तरह से पार्टी की कमान अपने हाथों में लेना आना, युवा राजनीति का एक नया उभार है। अहम बात यह है कि वैचारिक समाजवाद अब नहीं है, और अखिलेश की सारी परीक्षा चुनाव ही है, उनके भविष्‍य को समाजवाद से जोड़ना भी जल्‍दबाजी है।

वरिष्‍ठ पत्रकार अरविंद मोहन कहते हैं कि मुलायम सिंह यादव का समाजवाद हमेशा सवालों के घेरे में रहा। पहले उन्‍होंने पिछड़ों की  पॉलिटिक्‍स की, उसके बाद मुस्‍लिमों की, बाद में दलितों की। अवसरवाद उनकी राजनीति में दिखाई देता है। अखिलेश के पास भी समाजवाद इस रूप है कि वे कम्‍युनल पॉलिटिक्‍स करते नहीं दिखाई देते। ये एक अच्‍छी बात है। अरविंद के मुताबिक समाजवादी पार्टी का नाम होने से अखिलेश समाजवादी हो जाएंगे ऐसा नहीं है, सवाल समाजवादी नीतियों का है, हालांकि ये अच्‍छी बात है कि वे युवा हैं, और उनके पास कम से कम मुलायम सिंह वाली नीतियां नहीं दिखाई देती, जिसने समाजवाद को सबसे ज्‍यादा हाशिये पर डाला। देखने वाली बात होगी कि वे किस रूप में उभरते हैं।

न्‍यूज 18 इंडिया के डिप्‍टी मैनेजिंग एडिटर सुमित अवस्‍थी कहते हैं कि यूपी में यादव परिवार, समाजवाद के केवल नाम भर का प्रयोग कर रहा था। नेता जी लोहिया के जिस समाजवाद की विरासत का दावा करते रहे, वह कभी व्‍यवहार में नहीं रहा, बल्‍कि मुलायम ने परिवारवाद, भाई-भतीजावाद को बढ़ाया और समाजवाद को नुकसान ही पहुंचाया, जबकि उसी परिवारवाद की जंग को आज हम चौराहे पर देख रहे हैं।

सुमित के मुताबिक पिता से अलग होकर नये समाजवाद का दावा करने वाले अखिलेश के पास चुनौती होगी कि आने वे जल्‍द ही समाजवाद के उस ओरिजनल थॉट को पुनर्जीवित करें। अखिलेश ने विकास किया है, लेकिन उन्‍हें समाजवाद के असली थॉट, सामाजिक समरसता को टूटने से बचाना होगा, क्‍योंकि बीते कुछ सालों में सूबे में सांप्रदायिक तनाव बढ़ा है। उन्‍हें पिता की तरह एक ही धर्म और जाति के लोगों को साधने की सियासत करने से बचना होगा क्‍योंकि समाजवाद की असली कसौटी ही सामाजिक समभाव और समरसता है।

सुमित कहते हैं कि इस बात में कोई दो राय नहीं कि अखिलेश के पास सीनियर लीडर नहीं हैं, जैसे एक जमाने में मुलायम के पास मोहन सिंह, जनेश्‍वर बाबू जैसे लोग थे, (ये और बात है कि उन्‍हें भी नेता जी ने हाशिये पर ही रखा) लेकिन अखिलेश प्रचार के तहत पुराने समाजवादी नेताओं का सम्‍मान कर इस बात के संकेत दे रहे हैं कि वे समाजवाद के मूल्‍यों को समझते हैं।

रांची से युवा पत्रकार मुकेश सिन्‍हा कहते हैं- अखिलेश के अपने समाजवाद पर बात करना अभी जल्‍दबाजी होगी। उन्‍होंने जो भी किया है, अब उसकी असली परीक्षा चुनाव में जनता के बीच होगी और वो भी उस असली समाजवादी मूल्‍यों के साथ ही, जिसका दावा कर वे नेता जी से अलग हुए हैं। देखना यह है कि पिता मुलायम सिंह यादव की तरह ही उनके समाजवाद में, अवसरवाद, सामंतशाही और दागियों, गुंडों को जगह मिलती है, या फिर वे साफ-सुथरी छवि के नये समाजवाद का उदय करते हैं।

बाहरहाल, 40 साल पुराने कथित समाजवाद को छोड़ अब युवा अखिलेश यादव के लिए आगे की दिशा पर जितनी जनता की नजर है, उतनी ही उनके समकालीन नेताओं की भी। वे राहुल गांधी के साथ मिलकर गठबंधन की सियासत में कदम रखने जा रहे हैं, तो वहां से उनका राष्‍ट्रीय राजनीति का दरवाजा खुलता है, और समाजवाद की नई धारा का भी। देखना यह है कि पिता के साथ उनके अलगाव की यह नई राहें समाजवादी पार्टी को किस मंजिल पर पहुंचाती हैं, और मुलायम सिंह यादव के समाजवाद से कितना अलग होता है, अखिलेश यादव का समाजवाद..!
अगली ख़बर

फोटो

टॉप स्टोरीज