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असम में हुई बंपर वोटिंग, क्या आ गया है 'कमल' खिलने का मौसम!

सुधीर झा | News18India.com
Updated: April 8, 2016, 9:38 PM IST
असम में हुई बंपर वोटिंग, क्या आ गया है 'कमल' खिलने का मौसम!
भारतीय जनता पार्टी को 15 साल से चली आ रही कांग्रेसी शासन को उखाड़ फेंकने और असम में सरकार बनाने के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहराना होगा। आइए जानते हैं कैसे असम की सत्ता तक पहुंच सकती है बीजेपी...

भारतीय जनता पार्टी को 15 साल से चली आ रही कांग्रेसी शासन को उखाड़ फेंकने और असम में सरकार बनाने के लिए 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहराना होगा। आइए जानते हैं कैसे असम की सत्ता तक पहुंच सकती है बीजेपी...

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नई दिल्ली। असम में क्या इस बार बदली बदली फिजा है, क्या असम इस बार बदलाव का गवाह बनेगा। असम में 4 अप्रैल को पहले दौर में 78 फीसदी का बंपर मतदान हुआ। अमूमन ऐसा तब ही होता है जब बदलाव की बयार बहती है। इस बार भारतीय जनता पार्टी ताल ठोककर मैदान में है और उसने बिहार चुनाव से सबक लेते हुए सीएम कैंडीडेट भी समय पर घोषित कर दिया।

बीजेपी 15 साल से चली आ रहे कांग्रेसी शासन को उखाड़ फेंकने पर पूरा जोर लगाए हुए है। हवा भी इस बार थोड़ी बहुत बीजेपी के माफिक दिख रही है। स्थानीय चुनावों में बीजेपी को खासी सफलता मिली थी। लेकिन असम में जीत का उसका सपना तभी पूरा होगा जब वह 2014 के लोकसभा चुनाव के प्रदर्शन को दोहरा पाए। क्या हैं उसके सामने चुनौतियां, क्या है उसके पक्ष में, जानने की कोशिश करते हैं।

लोकसभा के आंकड़े

बीजेपी को 2014 के लोकसभा चुनाव में सर्वाधिक 36 फीसदी वोट मिले थे और राज्य की 14 में सात लोकसभा सीटें उसकी झोली में गई थीं। जहां तक विधानसभा चुनाव की बात है तो बीजेपी असम में अब तक दहाई का आंकड़ा नही पार कर पाई है। कुल 14 में से सात सीटें जीतने वाली बीजेपी 66 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही थी, हालांकि लोकसभा और विधानसभा चुनाव में कितना अंतर होता है यह बीजेपी दिल्ली और बिहार विधानसभा चुनावों में देख चुकी है।

बीजेपी के लिए हालांकि हालात इस बार बेहतर हैं, लेकिन रास्ता आसान नहीं है। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का समर्थन करने वाले बोडो समूह भी इस चुनाव में बीजेपी से नाराज दिख रही है। बोडो लगातार यहां रहने वाले बांग्लाभाषी मुसलमानों और देश के विभिन्न हिस्सों से आकर यहां बसने वाले लोगों के साथ हिंसक व्यवहार करते रहे हैं। अलग राज्य की मांग कर रही बोडो केंद्र सरकार द्वारा जारी की गई उस अधिसूचना से भी काफी नाराज हैं जिसमें बीजेपी ने सताए हुए अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को देश में रहने के लिये लंबी अवधि के परमिट जारी करने का फैसला किया है।

बीजेपी ने विजय के लिए मिशन 84 यानी दो तिहाई बहुमत का अति महत्वाकांक्षी लक्ष्य जरूर बना रखा है लेकिन असम के चुनावी समीकरण और पार्टी के चुनावी इतिहास को देखते हुए बहुत मुश्किल चुनौती दिखती है। असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में बीजेपी के पास अभी केवल 5 सीटें है और यह आंकड़ा इस बात का अंदाज़ा लगाने के लिए काफी है कि पार्टी को जीत के लिए कितनी लंबी छलांग लगानी है।

कांग्रेस से सीधे टक्कर का होगा फायदा
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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस के साथ सीधी टक्कर बीजेपी को फायदा पहुंचा सकती है और ऐसा देखा भी गया है कि लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी की टक्कर जहां भी सीधे कांग्रेस के साथ हुई है वहां बीजेपी को सीधे फायदा मिला है। दिल्ली और बिहार में हुई करारी हार के बाद बीजेपी यूपी चुनाव से पहले अपने मनोबल का दोबारा पाना चाहती है और ऐसे में और पांच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनावों में असम उसके लिए तुरूप का पत्ता साबित हो सकता है।

लोकसभा चुनाव के बाद से ही असम चुनाव में बीजेपी के लिए संभावानाएं मजबूत मानी जा रही है। बीजेपी ने असम गण परिषद (अगप) के अलावा आदिवासी नेतृत्व वाले अन्य तीन दलों के साथ गठबंधन किया है जो उसके लिए फायदे का सौदा है। जबकि कांग्रेस ने राज्य में अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया है। इसके अलावा बिहार चुनाव से सबक लेते हुए बीजेपी ने इस बार समय रहते सीएम पद के लिए सर्वानंद सोनोवाल को अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया है।

modi fan

असम में बीजेपी का इतिहास

असम में बीजेपी के चुनावी इतिहास की बात करें तो असम में पहली बार 1985 में विधानसभा चुनाव लड़ा था और तब उसे 1.1 फीसदी वोट हासिल हुए थे। 1991  के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 10 सीटें और 6.6 फीसदी वोट मिले और इसी के साथ उसने राज्य में पहली बार अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। बाद के विधानसभा चुनावों में 1996 में उसे चार सीटें और 10.4 फीसदी वोट और 2001 में आठ सीटें और 9.4 फीसदी वोट मिले।

असम में 2006 में हुए विधानसभा चुनावों में बीजेपी को सबसे ज्यादा 12 फीसदी वोट और दस सीटें हासिल हुईं लेकिन 2011 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में पार्टी को उस समय बड़ा झटका लगा जब सीटें घटकर आधी हो गई। जहां तक सीटों का सवाल है तो वह 5 रह गईं और वोट भी आधा फीसदी गिर गया। राज्य की 126 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस पिछले तीन चुनावों में 2001 में 71, 2006 में 53 और 2011 में 79 सीटें जीतकर पहले स्थान पर रही।

सीएम पद के लिए उम्मीदवार का ऐलान

बिहार चुनाव के नतीजों से सबक लेते हुए बीजेपी ने असम में सीएम पद के लिए अपना उम्मीदवार घोछित कर दिया है। केंद्रीय मंत्री बनने के बाद से ही सीएम पद के उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल का कद काफी बड़ा हो चुका है और पार्टी भी एक चमत्कार की उम्मीद उनसे कर रही है लेकिन बाहरी होने की छवि कहीं न कहीं पार्टी के लिए नुकसानदेह हो सकता है। जहां तक जातीय समीकरण की बात है तो मुसलमानों की अधिक आबादी (34.2 फीसदी) वाले असम में जनजातियों की संख्या (15-20 फीसदी) किसी भी राजनीतिक समीकरण को बदलने के लिए काफी है।

Congress Party supporters gather at a ra

इसमें कोई शक नहीं कि मोदी लहर में अब वो रफ्तार नहीं है लेकिन बीजेपी की उम्मीद 15 साल के शासन के ख़िलाफ सत्ता विरोधी माहौल से है, लेकिन सच ये भी है कि इसी तरह की उम्मीद को बिहार चुनाव में बड़ा झटका लग चुका है।

आसान नहीं है गठबंधन की राह

असम गण परिषद-बीजेपी गठबंधन की घोषणा के बाद से इन दोनों दलों में आतंरिक संघर्ष तेज हो गया है। सूत्रों के मुताबिक संघ बीजेपी के अकेले चुनाव लड़ने के पक्ष में था। ऐसा माना जाता है कि अगप को जो 24 सीटें दी गई हैं, उनमें से कई सीटों पर बीजेपी की अच्छी स्थिति है और इससे पार्टी कार्यकर्ताओं में निराशा देखी जा रही है। कई ऐसी भी सीटें अगप को दी गई है जहां वर्तमान में बीजेपी के विधायकों का कब्जा है। कई सीटों पर बीजेपी को वोटकटुआ बागी उम्मीदवारों का सामना करना पड़ सकता है और टिकट बंटवारे में भी असंतोष बढ़ेगा। लिहाजा इस गठबंधन से भाजपा को लाभ से अधिक नुकसान ही होगा। केंद्रीय नेतृत्व के इस कदम से भी प्रदेश बीजेपी में नाराजगी है।

सभी 24 सीटों को जीत पाना अगप के लिए मुश्किल है लेकिन अब उसके ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतने की संभावना बढ़ गई है। राजनीतिक विश्लेषकों मानना है कि बीजेपी-बीपीएफ गठबंधन बेहतर था और अगप के साथ चुनाव बाद गठबंधन सही होता, क्योंकि अगप कांग्रेस के साथ सरकार में कभी शामिल नहीं होगी। विश्लेषक मानते हैं कि अगप-बीजेपी गठबंधन से उपजे विद्रोह का लाभ कांग्रेस को मिलेगा।

पूर्वोत्तर भारत का प्रवेशद्वार माना जाने वाला यह राज्य संघ परिवार के लिये रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण है। 79 साल के तरुण गोगोई के नेतृत्व में पिछले 15 साल से सत्ता पर काबिज कांग्रेस को सत्ता विरोधी लहर का भी सामना करना पड़ सकता है। बीजेपी के कुछ सहयोगी दलों का मानना है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में अपने चुनावी घोषणापत्र में किये गए वायदों पर खरा उतरने में नाकाम रही है जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है।



असम में करीब 33 सीटों पर इत्र कारोबारी बदरुद्दीन अजमल खां की एआईयूडीएफ का भी खासा असर मुसलमानों पर रहा है, लेकिन इस बार ज्यादातर मुस्लिम मतदाताओं का रुझान अगर इनकी तरफ हुआ तो इसका सीधा नुकसान कांग्रेस को और फायदा बीजेपी को होगा। वहीं, असम गण परिषद और बोडो पीपुल्स फ्रंट के साथ गठबंधन करके बीजेपी ने अपनी स्थित खासी मजबूत कर ली है।

क्या है मुश्किलें

असम बीजेपी ईकाई चाहती है कि अहोम, मटोक, शोतिया, कोच राजबंधी और टी ट्राइब्स समेत छह समुदाय को एसटी का दर्जा दिए जाने की मांग संबंधी विधेयक को चुनाव से पहले संसद में पेश किया जाए लेकिन बीजेपी आलाकमान द्वारा इस बारे में कोई ठोस फैसला नहीं ले पाने के कारण राज्य बीजेपी ईकाई नाराज है। माना जाता है कि असम बीजेपी को लगता है कि सरकार इस बिल की मदद से असम की राजनीति में बड़ा बदलाव ला सकती है।

हालांकि 22 फरवरी को करीब 5,000 से अधिक कार्यकर्ताओं ने केंद्र सरकार पर दबाव बनाने के लिए कोकराझाड़ में रेलवे ट्रैक को बाधित कर दिया था। ऐसे में एक तरफ जहां सरकार के सुस्त रवैये से निराश ये समुदाय चुनाव मे बीजेपी का विरोध कर सकते हैं तो दूसरी तरफ कांग्रेस इसका इस्तेमाल अपने राजनीतिक फायदे के लिए कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इनकी मांग लेने से बीजेपी को तो फायदा होगा ही साथ ही जमीनों की खरीद बिक्री नियंत्रित हो जाने ले बांग्लादेशी घुसपैठ की समस्या से निपटने में मदद मिलेगी।

 

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First published: April 5, 2016, 10:34 AM IST
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