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इंटरव्यूः कांग्रेस-बीजेपी को क्यों अच्छे लगने लगे अंबेडकर?

संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने आज ही के दिन ठीक सौ साल पहले यानी 2 जून 1915 को कोलंबिया विश्वविद्यालय से बैरिस्टर एट लॉ की उपाधि हासिल की थी।

  • Last Updated: October 15, 2015, 8:14 PM IST
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नई दिल्ली। संविधान निर्माता बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर ने आज ही के दिन ठीक सौ साल पहले यानी 2 जून 1915 को कोलंबिया विश्वविद्यालय से बैरिस्टर एट लॉ की उपाधि हासिल की थी। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी इस मौके पर अंबेडकर की जन्मस्थली मध्यप्रदेश के महू में एक कार्यक्रम में शरीक होंगे और बाबा साहेब की 125वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में साल भर चलने वाले कांग्रेस के कार्यक्रमों की शुरुआत करेंगे। इस मौके पर आईबीएनखबर ने जाने-माने दलित चिंतक और जेएनयू में समाज शास्त्र के प्रोफेसर विवेक कुमार से अंबेडकर और उनकी आज के दौर में प्रासंगिकता को लेकर विस्तार से बातचीत की। पेश हैं उस बातचीत के संपादित अंशः-

 

सवालः बीजेपी-कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक पार्टियां आज अंबेडकर के प्रति प्रेम दिखा रही हैं। आप इसे कैसे देखते हैं?



विवेक कुमारः दो बातें हैं, सकारात्मक और नकारात्मक। सकारात्मक ये है कि बीजेपी का अपना जो वोटबैंक है, जिसकी मदद से उसने ये चुनाव जीता, इसमें उसने यूथ को लुभाया, जो अवसरों की तलाश में था। लेकिन ये यूथ अगर चॉकलेट मांग रहा है और वो मिल गई तो ब्रेड पकौड़ा भी मांगेगा। ये यूथ आकांक्षा रखता है, जिसे पूरा कर पाना किसी के लिए भी संभव नहीं है। तो यूथ किसी के लिए भी स्थिर वोट बैंक नहीं होता है। और उस यूथ पर बीजेपी भरोसा नहीं कर सकती। इसलिए उसको एक ऐसा वोटबैंक भी चाहिए, जिसके साथ वो दूर तक चल सके और दलित वोटबैंक ऐसा लग रहा है, क्योंकि बीएसपी कमजोर हुई है यूपी में, तो बीजेपी को लगता है कि उसकी झोली में दलित वोटबैंक आ सकता है अगर कुछ किया जाए तो। बीजेपी सांकेतिक रूप से दलितों के सबसे बड़े आइकन बाबा साहेब को लेकर दलितों पर डोरे डाल रही है, लेकिन बीजेपी का ये सांकेतिक काम लोगों की समझ में आ चुका है।
अंबेडकर सेंटर बनवा देने से कुछ भी नहीं होगा। कई सेंटर पहले भी बन चुके हैं। कांग्रेस बनवा चुकी है। अंबेडकर प्रतिष्ठान पहले से ही कांग्रेस बनवा चुकी है। अंबेडकर व्याख्यान मालाएं और अंबेडकर चेयर रद्द ही कर दिए गए हैं। ऐसे में कोई गुणवत्तापूर्ण काम जिससे दलितों का सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक-शैक्षणिक रूप से उत्थान हो सके। ऐसा कुछ दिखाई नहीं दे रहा। ये बीजेपी का स्टैंड है। दूसरा कांग्रेस अलग-थलग दिखाई पड़ रही है। राज्य-दर-राज्य कांग्रेस की पराजय हो रही है। इसीलिए वो अपनी खोई हुई जमीन(दलितों की, जो कभी कांग्रेस का वोटबैंक हुआ करता था) उसे रिझाने की कोशिश कर रही है। यद्यपि कांग्रेस ने पहले भी दलितों को नुमाइंदगी के तौर पर कम से कम 6 नेताओं को बड़े पद दिए। जिसमें लोकसभाध्यक्ष, गृहमंत्री, सांस्कृतिक मंत्री के पद पर दलित नेताओं की नियुक्ति हुई। इस तरह दिखने वाले काम कांग्रेस ने जरूर किए हैं, पर इसके बावजूद दलित समाज कांग्रेस के सथ जुड़ाव महसूस नहीं कर पा रहा है। दलितों को सत्ता का स्वाद लग चुका है। इसीलिए वो किसी दलित की अगुवाई में ही लड़ाई चाहता है। दलितों की लड़ाई, दलितों की अगुवाई वाले पैटर्न पर। किसी दूसरे की चौधराहट में वो अपनी अगुवाई नहीं चाहता। इसलिए वो कांग्रेस के साथ बैठ नहीं पा रहा है ठीक से। लेकिन बिना लड़ाई के कांग्रेस पूरे वोटबैंक को बीएसपी की तरफ जाने देने का वॉकओवर भी नहीं दे सकती।

 

सवालः दलितों की अगुवाई में लड़ाई क्या सिर्फ बीएसपी तक ही सीमित है?

विवेक कुमारः नहीं, मुझे नहीं लगता कि ऐसा है। क्योंकि जो छोटे-छोटे अलग ग्रुप देखें, जैसे कि रामविलास पासवान की एलजेपी, रामदास अठावले, रामराज (उदित राज) जैसे लोगों का भले ही बड़ा वोटबैंक न हो, लेकिन ये लोग फौरी तौर पर वोटरों को भ्रम में डालने का काम करते हैं। ये सिर्फ अस्थाई वोटरों को ही प्रभावित कर पाते हैं। इनकी व्यक्तिगत वैल्यू तो है, इनकी पार्टियों की वैल्यू नहीं है। जबकि बीएसपी की है।

 

सवालः आज के दौर में बाबा साहेब डॉ अंबेडकर का दर्शन कितना महत्वपूर्ण और प्रभावी है?

विवेक कुमारः बाबा साहेब अंबेडकर एक ऐसे लीडर हैं, जो समय के साथ और भी प्रासंगिक होते जा रहे हैं क्योंकि उन्होंने जो बातें उस समय उठाईं, वो अपने समय से आगे थीं। खासकर मानव अधिकारों को लेकर  शिक्षा की बात है या अंतराराष्ट्रीय शिक्षा की बात है। पूना पैक्ट के समय उन्होंने 1932 में कहा था कि उच्च शिक्षा के लिए प्रति व्यक्ति 10 हजार रुपये रखें। उस समय के 10 हजार की वैल्यू आप समझ सकते हैं क्योंकि तब सोना 5 रुपये तोला हुआ करता था। ये उनकी व्यापक सोच दर्शाता है। वो खुद उच्च शिक्षित थे। वो विद्वान थे। वो डेमोक्रेसी, सार्वभौमिक मूल्य के लिए हमेशा संघर्ष करते रहे। वो इदारों यानि इंस्टीट्यूशंस के महत्व पर जोर देते थे। विकास पर उन्होंने जितना जोर दिया, चाहे वो प्लानिंग कमीशन हो, रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया हो, या महिलाओं के अधिकारों की बात हो। ये सब के सब बाबा साहेब अंबेडकर ने अपने मसौदे में शामिल किए थे। चाहे वो पार्टिशन ऑफ इंडिया हो, चाहे वो रिजर्वेशन हो। मुझे लगता है कि वो इसलिए और भी प्रासंगिक होते जा रहे हैं कि उन्होंने सार्वभौमिकता के आधार पर अधिकारों और प्रतिनिधित्व की जो लड़ाई लड़ी, वो आज भी उसी नजरिए से देखी जा रही है। प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है लोगों को। एक तरफ सत्ता में ब्यूरोक्रेसी, ज्यूडीशरी, पॉलिसी, यूनिवर्सिटी, इंडस्ट्री में दलितों, वंचितों का प्रतिनिधित्व आज भी नहीं दिखाई देता। इसके लिए गणना की आवश्यकता नहीं है। यहां पता चल जाता है कि सामाजिक स्थिति में कोई परिवर्तन नहीं हुआ। वंचित आज भी वंचित है। मुझे लगता है कि जबतक प्रतिनिधित्व पूरा मिल नहीं जाता, तबतक अंबेडकर की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

 

सवालः आरक्षण की बात अगर करें तो क्या सिर्फ आर्थिक स्थिति पर हो या प्रतिनिधित्व के स्तर पर?

विवेक कुमारः देखिए, मेरा मानना है कि आरक्षण की मांग प्रतिनिधित्व के स्तर पर थी। जिन समाजों को सदियों से, मैं एक साल या सौ साल की बात नहीं कर रहा हूं। मैं हजारों सालों से उत्पीड़ित की बात कर रहा हूं, जिन्हें सत्ता की संस्थाओं से येन-केन प्रकारेण वंचित किया गया। उनमें प्रतिनिधित्व को लेकर आरक्षण आया। लेकिन समाज ने आरक्षण को चंद नौकरियों का सवाल बनाकर उसे गरीबी उन्मूलन से जोड़ दिया, कि इससे आर्थिक उन्नति, आर्थिक तरक्की होगी। जबकि आरक्षण गरीबी उन्मूलन का कार्यक्रम नहीं है। आरक्षण के जरिए सत्ता के प्रतिष्ठानों में भागीदारी बढ़ाने की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि दलित इसके योग्य नहीं हैं। दरअसल, समाज अभी तैयार नहीं है कि दलितों को भी प्रतिनिधित्व दिया जाए। समाज अभी भी धार्मिक-सामाजिक अनुष्ठानिक व्याधियों से घिरा पड़ा है। उसे दूर करने के लिए आरक्षण का प्रावधान किया गया। लेकिन उसके बाद भी आरक्षण को गरीबी उन्मूलन का आधार बना दिया गया। इसके बावजूद अगर वंचित वर्ग को आगे बढ़ाना है, तो आरक्षण देना ही होगा। इंडियन लेबर कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर 1 करोड़ 98 लाख नौकरियां हैं, इस लिहाज से 15 प्रतिशत+7.5 प्रतिशन यानी 22.5 फीसदी आरक्षण दलितों का बनता है। इसके हिसाब से 45 लाख नौकरियों पर दलितों का हक बनता है, लेकिन 65 सालों में सरकारों ने 25 करोड़ की जनसंख्या को महज 35 लाख नौकरियां दी गईं। ये तो ऊंट के मुंह में जीरे समान है, लेकिन इसका ढिंढोरा सरकारों ने खूब पीटा। हम इसपर श्वेत पत्र की भी मांग करते हैं कि 65 सालों में कितने पदों का सृजन किया गया। कितनी नौकरियां दी गईं।

 

सवालः आईआईटी-मद्रास में हालिया विवाद पर आप क्या कहेंगे?

विवेक कुमारः पेरियार-अंबेडकर स्टडी सर्किल पर विवाद गैर-जरूरी था। देखिए, शिक्षण संस्थानों में पके-पकाए बच्चे तो आते नहीं। वो गलतियों से ही सीखते हैं। ऐसे में गलती पर प्रतिबंध लगाना कहां तक सही है? अब अगर मद्रास विश्वविद्यालय को देखें, तो वहां 422 शिक्षक हैं, जिसमें से 400 ब्राह्मण, जबकि महज 2 दलित शिक्षक हैं। वहीं 10 फीसदी से भी कम दलित छात्र। ऐसे में वो किस तरह से बहुसंख्यकों को भ्रमित कर रहे थे, ये बड़ा सवाल है। ऐसी गलतियों पर पहरा देने और बैन लगाने की जगह उन्हें सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए था। बच्चे गलतियां नहीं करेंगे, तो सीखेंगे कैसे? वैसे आईआईटी-मद्रास तो ऐसी जगह है, जहां पेरियार का आंदोलन चला। उन्होंने ब्राह्मणवाद को खुली चुनौती दी। उसमें बच्चे किस तरह से वैमनस्य फैला सकते हैं?

 

सवालः पेरियार और अंबेडकर के दर्शन में क्या समानताएं हैं?

विवेक कुमारः चूंकि उत्तर भारत खासकर आज की पीढ़ी पेरियार से ज्यादा परिचित नहीं है। पेरियार-अंबेडकर के दर्शन में काफी समानताएं हैं। आंदोलन के नजरिए से देखें तो दोनों ही ब्राह्मणवाद-मनुवाद के खिलाफ थे। बाबा साहेब ने फिलॉसफी ऑफ हिंदुइज्म में बताया कि किस तरह से यहां पर समानता का नितांत अभाव है। पेरियार-अंबेडकर एक-दूसरे से मिले भी। लेकिन, अंबेडकर का अपना रास्ता था। पेरियार-अंबेडकर दोनों ने ही राजनीतिक शुरुआत कांग्रेस से ही, लेकिन दोनों ने ही ब्राह्मणवाद का विरोध करते हुए कांग्रेस को त्याग दिया। अंबेडकर-पेरियार ने कांग्रेस का विरोध किया, दोनों ने गांधी का विरोध किया। ब्राह्मणवाद का विरोध किया। चौथी समानता वंचित वर्गों के अधिकार की मांग की है। मुझे लगता है कि दोनों की सामाजिक क्रांति में काफी समानताएं रहीं। पेरियार का आंदोलन जातिप्रथा के विरोध में था। दोनों के ही समाज में छुआछूत थी। दोनों ही पीड़ित थे। बाबा साहेब विदेश में पढ़े लिखे थे, इसलिए उन्होंने शिक्षा के स्तर पर भी बड़ी लड़ाई लड़ी। वहीं, पेरियार का आंदोलन विचारधारा के आधार पर था। दोनों में मतभिन्नता थी। बाबा साहेब अंबेडकर शिक्षा के साथ थे, इसीलिए उन्हें अंग्रेजों का करीबी भी कहा गया, जबकि पेरियार पूरी तरह से देशज थे।
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