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इसलिए अब सिर्फ ‘वोट कटवा’ साबित हो रहे निर्दलीय उम्‍मीदवार

इसलिए अब सिर्फ ‘वोट कटवा’ साबित हो रहे निर्दलीय उम्‍मीदवार

फोटो: यूपी विधानसभा

फोटो: यूपी विधानसभा

उत्‍तर प्रदेश के कई विधानसभा चुनाव से निर्दलीय प्रत्‍याशियों की दाल नहीं गल रही है. कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो ज्‍यादातर सिर्फ ‘वोट कटवा’ साबित हो रहे हैं.

उत्‍तर प्रदेश के कई विधानसभा चुनाव से निर्दलीय प्रत्‍याशियों की दाल नहीं गल रही है. कुछ लोगों को छोड़ दिया जाए तो ज्‍यादातर सिर्फ ‘वोट कटवा’ साबित हो रहे हैं. जैसे-जैसे छोटे दलों की संख्‍या और जनाधार बढ़ रहा है, निर्दलीय प्रत्याशियों की सफलता दर कम होती जा रही है. ये बात जरूर है आजाद प्रत्‍याशी पार्टियों के लाखों वोट काटकर उनके लोगों को हराने और उनका वोट परसेंटेज गिराने का काम बखूबी कर देते हैं. निर्दलीय चुनाव जीतने वालों में सबसे बड़ा नाम रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया का है. जो प्रतापगढ़ की कुंडा सीट पर लगातार पांच बार से चुनाव जीत रहे हैं.

आपको लगभग सभी सीटों पर चार-पांच निर्दलीय प्रत्‍याशी मिल जाएंगे. जब क्षेत्रीय दलों का इतना बोलबाला नहीं था, ऐसे दल कम हुआ करते थे तो ज्‍यादा निर्दलीय प्रत्‍याशी उतरते थे. इसलिए आजाद उम्‍मीदवारों की सीटें और वोट प्रतिशत काफी हुआ करता था. सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्‍स के प्रोफेसर एके वर्मा  का कहना है कि कई बड़े दलों के प्रत्‍याशियों की राह में निर्दलीय रोड़ा बन जाते हैं. जिन सीटों पर जीत-हार का अंतर बहुत कम होता है उन पर ये वोट कटवा बहुत खतरनाक साबित होते हैं.

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वरिष्‍ठ पत्रकार विजय विनीत कहते हैं कि छोटे दलों के उभार और अपराधियों का राजनीतिकरण होने के बाद निर्दलीय प्रत्‍याशियों की संख्‍या कम हो रही है. पहले अपराधी और स्‍वार्थी किस्‍म के लोग निर्दलीय चुनाव लड़ते थे क्‍योंकि राजनीतिक दल उन्‍हें अछूत मानते थे. वे बदनामी से डरते थे. अब पार्टियां अपराधियों को खुलेआम टिकट देती हैं. कई अपराधियों ने अपनी पार्टी बना ली है. इसलिए निर्दलीय कम हो रहे हैं. इस चुनाव में ऐसे प्रत्‍याशी और कम हो सकते हैं क्‍योंंकि चुनाव आयोग ने उन्‍हें हतोत्‍साहित करने के लिए विभागों से अनापत्‍ति प्रमाण पत्र लेने और पूरे परिवार की आईटीआर दाखिल करने जैसे नियम लागू कर दिए हैं. बहुकोणीय मुकाबले में कई बार ये निर्दलीय सियासी मलाई खाने में कामयाब हो जाते हैं. ज्‍यादातर मामलों  में निर्दलीय प्रत्‍याशियों की कोई विचारधारा नहीं होती. वे अपने स्‍वार्थ में चुनाव लड़ते हैं. इसलिए जनता उन्‍हें नकार रही है.

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कभी था आजाद उम्‍मीदवारों का जलवा

  • चुनाव आयोग के आंकड़ों के मुताबिक 1951 के चुनाव में 19.66 फीसदी वोट लेकर निर्दलीय प्रत्‍याशियों ने 15 सीटें हासिल की थीं.

  • दूसरे चुनाव यानी 1957 में 28.68 फीसदी वोट के साथ 39 सीटें मिलीं। यह निर्दलीय प्रत्‍याशियों को रिकार्ड वोट प्रतिशत है.

  • वर्ष 1989 में तो उन्‍हें 40 सीटें मिल गईं। इस साल निर्दलीयों को 60,20,921 वोट मिले। वोट शेयर 46 फीसदी था.

  • वर्ष 1993 का आंकड़ा काफी दिलचस्‍प है। इस साल सबसे ज्‍यादा 6557 निर्दलीय प्रत्याशियों ने चुनाव लड़ा.

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