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अजित से सबने क्यों कर लिया किनारा, अब क्यों कन्नी काट रहे सपा से?

सुधीर झा | News18India.com
Updated: June 8, 2016, 4:36 PM IST
अजित से सबने क्यों कर लिया किनारा, अब क्यों कन्नी काट रहे सपा से?
समय के साथ अब परिस्थितियां यहां तक बदल चुकी हैं कि अजित को राज्यसभा में पहुंचने के लिए न सिर्फ लगभग सभी राजनीतिक दलों के दरवाजे खटखटाने पड़े बल्कि इसके बदले उन्हे गठबंधन की शर्तें भी सुननी पड़ीं।

समय के साथ अब परिस्थितियां यहां तक बदल चुकी हैं कि अजित को राज्यसभा में पहुंचने के लिए न सिर्फ लगभग सभी राजनीतिक दलों के दरवाजे खटखटाने पड़े बल्कि इसके बदले उन्हे गठबंधन की शर्तें भी सुननी पड़ीं।

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नई दिल्ली। एक समय पश्चिमी उत्तर प्रदेश का सियासी समीकरण ही कुछ ऐसा था कि अजित सिंह की पूछ परख सभी पार्टियों में थी। अपने पिता और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह की छवि के कारण अजित सिंह की पार्टी का यूपी के जाटों पर अच्छा खासा असर था। लेकिन समय के साथ अब परिस्थितियां यहां तक बदल चुकी है कि अजित को राज्यसभा में पहुंचने के लिए न सिर्फ लगभग सभी राजनीतिक दलों के दरवाजे खटखटाने पड़े बल्कि इसके बदले उन्हे गठबंधन की शर्तें भी सुननी पड़ी।  अजित सिंह अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए फिर अपने लिए सहयोगी तलाश रहे हैं। अजित के ट्रैक रिकॉर्ड ने उन्‍हें ऐसा रुख अपनाने को विवश किया है।

बीजेपी ने क्यों नहीं लिया अजित का साथ- अजित सिंह पश्चिमी यूपी में काफी प्रभावशाली नेता हैं और जाट वोटबैंक पर उनकी काफी पकड़ है। यही नहीं अब तक लोकसभा और विधानसभा चुनावों में आरएलडी का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन बीजेपी के साथ ही हुआ है। लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाट वोटर बीजेपी के साथ आ गए, जिसका नतीजा पिछले लोकसभा चुनाव में देखने को मिला था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे में अब बीजेपी को जाट वोटरों के लिए आजित सिंह की जरूरत नहीं रही।

2009 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के साथ रहने पर आरएलडी के5 सांसद निर्वाचित हुए थे और 2002 के विधानसभा चुनाव में उसके 14 विधायक जीते थे। जाट वोटरों पर पकड़ के लिए जहां केंद्रीय कृषि राज्यमंत्री डॉ. संजीव बालियान लगातार सक्रिय हैं तो स्थानीय स्तर पर भी नेताओं की फौज इस बिरादरी के हिसाब से लगाई गई है।

मायावती ने बनाई दूरी- मुलायम के साथ बढ़ती नजदीकियों से पहले अजित सिंह बसपा से हाथ मिलाना चाहते थे,लेकिन मायावती इसके लिए कतई तैयार नहीं हुईं। गौरतलब है कि बीएसपी का मजबूत कैडर जाटव वोटबैंक का पश्चिमी यूपी में जाट वोटर्स के साथ छत्तीस का आंकड़ा है और दोनों कभी साथ आ ही नहीं सकते। यही नहीं राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस क्षेत्र में गैर जाट वोटों का ध्रुवीकरण भी होता है और अजित सिंह को साथ लाने से मायावती को गैर जाट वोटों से हाथ धोना पड़ सकता है।

कांग्रेस को भी ऐतराज- चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर को कमान देने के बाद भी इस समय यूपी में कांग्रेस सबसे ज्यादा कमजोर स्थिति में है। कमजोर स्थिति में होने के बावजूद भी काग्रसे को आरएलडी के साथ गठबंधन कोई दिलचस्पी नहीं है। यही कारण है कि जब सोनिया गांधी ने अजित सिंह के राज्यसभा भेजने के बदले 2017 में गठबंधन के प्रस्ताव को एक सिरे से खारिज कर दिया।

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सपा को क्यों है जरूरत- यूपी विधानसभा चुनाव की सरगर्मी तेज होते ही सियासी गठजोड़ भी होने लगे हैं। घबराई सपा ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए आरएलडी से तालमेल बिठाना शुरू किया है। यूपी में सत्ता विरोधी लहर के कारण इस बार समाजवादी पार्टी की हालत विधानसभा चुनाव में ज्यादा अच्छी नहीं बताई जा रही है। ऐसे में सपा को निश्तित रूप से सहयोगी की तलाश है। लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के बाद वेस्टर्न यूपी में मुसलमानों और जाटों के बीच जो दूरी बढ़ी है, उसमें समाजवादी पार्टी को अजित सिंह सिंह से गठबंधन करने में फायदे के बजाय घाटा ही दिख रहा है।हालांकि 2012 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी बगैर अजित सिंह के सहयोग से पश्चिमी यूपी को फतह कर चुकी है लेकिन उसके पक्ष में जीत का समीकरण मुसलमान और गैर जाट वोटों का ध्रुवीकरण ही बना था। 403 सदस्यीय यूपी विधानसभा में इस समय अजित सिंह की पार्टी के महज 9 विधायक हैं जबकि संसद में उनका एक भी सांसद नहीं है। जाटों की बहुलता वाले यूपी के 12 जिलों की 60 विधानसभा सीटों में उनकी पार्टी निर्णायक भूमिका में है। ऐसे में समाजवादी पार्टी अजित सिंह के असर को पूरी तरह से नकाराने को तैयार नहीं है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि अजित का समर्थन निर्णायक भूमिका निभा सकता है।

2017 के विधानसभा चुनाव में सपा इस गठबंधन को अपना ट्रंपकार्ड मान कर चल रही थी। पर अब अजीत सपा से कटते दिख रहे है। अजित सिंह के साथ जुड़ने में सपा को न सर्फ पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी फायदे की उम्मीद है बल्कि इस पूरे क्षेत्र में बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को किसी तरह कम करना या गायब करना। इस क्षेत्र में बीजेपी की ओर से वोटों के धुव्रीकरण की संभावित कोशिश पर पानी फेरने के साथ मुस्लिम-यादव के साथ जाट और गुज्जर समुदाय को भी अपने पाले में करना चाहती है।

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राजनीतिक विश्लेषकों का यह भी मानना है कि इस गठबंधन के बनने से चुनाव में बीजेपी के साथ बसपा का भी चुनावी गणित गड़बड़ा सकता है। दोनों दलों के साथ आने से सपा का मुस्लिम और आरएलडी के जाट वोटरों का गठजोड़ बनता है,तो पश्चिमी उत्तर प्रदेश की 145 विधानसभा सीटों पर सपा-रालोद की राह आसान हो सकता है। गौरतलब है कि पिछले दो चुनावों में सपा और बसपा के बीच करीब चार फीसदी वोट के अंतर पर हार जीत हुई है, जबकि आरएलडी करीब तीन फीसदी वोट हासिल करने में सफल रहा है। सपा के परंपरागत यादव वोटर पश्चिम में न होने के कारण सपा गुर्जर-मुस्लिम समीकरण से बसपा और भाजपा का मुकाबला चाहती है।

जबकि दूसरी तरफ दलित-मुस्लिम समीकरण बनाकर बसपा बीजेपी के पक्ष में एकतरफा ध्रुवीकरण को खत्म करना चाहती है। बसपा की मंशा यह है कि वह इस समीकरण के सहारे बीजेपी से सीधी टक्कर में दिखाई दे, जिससे मुस्लिम एकतरफा उसके पाले में खड़ा हो। अब तक बीजेपी लगातार यही कहती रही है कि उसका मुख्य मुकाबला सपा से ही है।

क्यों कट रहे हैं अजित- दादरी की नई फोरंसिक रिपोर्ट के बाद अखलाक के घर में गौमांस होने की पुष्टि के बाद अजीत सिंह भी सपा से कुछ अलग अलग दिख रहे हैं। गौरतलब है कि गौमांस की पुष्टि होने के बाद जाटों के बीच सपा सरकार से नाराजगी है। अजीत सिंह अपनी पार्टी के अस्तित्व को लेकर पहले से ही चिंता में हैं और वो खतरा मोल नहीं लेना नहीं चाहते। जाहिर है अजित सिंह के इस कदम से पश्चिम यूपी में बचा-खुचा जनाधार भी आरएलडी से दूर हो जाए। ऐसे में सपा से संभावित गठबंधन खटाई में पड़ता दिख रहा।

जाट आंदोलन का होगा असर- हरियाणा में आरक्षण के लिए जाटों का आंदोलन पूरे हरियाणा में फैलने के साथ ही इसकी धमक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में भी महसूस होने लगी है। जाट समुदाय के लोग उत्तर प्रदेश में भी आरक्षण को लेकर खुलकर सामने आ गए हैं। भारतीय किसान यूनियन के राकेश टिकैत द्वारा नतीजा भुगतने की धमकी की सीधा अर्थ अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनावों में इस आंदोलन के होने वाले प्रभाव से है।

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जाट बहुल क्षेत्रों में विधानसभा की करीब 136 सीटें आती हैं और इस क्षेत्रों में मुसलमानों की जनसंख्या भी अच्छी खासी है है। 2012 के विधानसभा चुनाव में इस इलाके की 136 में से 26 सीटों पर मुसलमान उम्मीदवार जीते थे। जैसे-जैसे राज्य में जाट बनाम गैर जाट का मुद्दा गर्माता जा रहा है विभिन्न राजनीतिक दलों को सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील पश्चिमी उत्तर प्रदेश को लेकर अपनी आगामी चुनावी रणनीति में आमूलचूल परिवर्तन करना पड़ेगा।

क्यों नहीं है अजीत सिंह पर विश्वास- गौरतलब है कि अजीत सिंह यूपी में सभी पार्टियों के साथ कभी न कभी साझेदारी कर चुके हैं और ऐसे में गठबंधन का भविष्य पक्का नहीं है और यही बात उनके लिए मुसीबतें खड़ी कर रही है। 2002 में यूपी में मायावती के साथ रहे अजीत सिंह ने 2004 में समाजवादी पार्टी के साथ गठबंधन किया और 2009 वो बीजेपी के साथ चुनाव लड़े। 2011 में वो यूपीए में शामिल हो गए। 2014 के लोक सभा चुनाव में भी कांग्रेस ने उनके लिए आठ सीटें छोड़ी थीं- लेकिन न तो उनकी सीट बची न बेटे की। इन हालातों में आरएलडी से गठबंधन करने की हिम्मत कोई नहीं जुटा पा रहा।

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First published: June 7, 2016, 2:48 PM IST
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