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बुंदेलखण्‍ड में मुद्दे नहीं ओबीसी-दलित वोटों का ध्रुवीकरण दिलाता है जीत

बुंदेलखण्ड  की एक तस्वीर, फोटो-गैटी इमेजिज

बुंदेलखण्ड की एक तस्वीर, फोटो-गैटी इमेजिज

बुंदेलखण्‍ड की बात करें तो घास की रोटी खाने के सामने सभी मुद्दे बौने हो जाते हैं, लेकिन यहां राजनीतिक दलों को मुद्दे नहीं जातीय समीकरणों की कदमताल जीत का स्‍वाद चखाती है. जिधर ओबीसी संग दलित वोटरों के कदम चल पड़ते हैं उसी पार्टी के खाते में सबसे ज्‍यादा जीत आती है.

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बुंदेलखण्‍ड की बात करें तो घास की रोटी खाने के सामने सभी मुद्दे बौने हो जाते हैं, लेकिन यहां राजनीतिक दलों को मुद्दे नहीं जातीय समीकरणों की कदमताल जीत का स्‍वाद चखाती है. जिधर ओबीसी संग दलित वोटरों के कदम चल पड़ते हैं उसी पार्टी के खाते में सबसे ज्‍यादा जीत आती है. पिछले तीन विधानसभा चुनावों के नतीजे तो ये ही साबित कर रहे हैं. और तो और राजनीतिक दल भी इसी समीकरण को देखते हुए उम्‍मीदवारों की बिसात बिछाते हैं. सत्‍ता मिलने पर मंत्रिमंडल को भी वैसे ही सजाते हैं। चौथे चरण के दौरान बुंदेलखण्‍ड क्षेत्र सहित 11 जिलों की 52 सीट पर वोट डाले जाएंगे.

बुंदेलखण्‍ड के जालौन, हमीरपुर, झांसी, कौशाम्‍बी, बांदा, प्रतापगढ़, ललितपुर, चित्रकूट, महोबा आदि जिले सूबे की राजनीति में अहम रोल निभाते आए हैं. जातीय समीकरणों के चलते यहां बड़े से बड़ा मुद्दा बौना हो जाता है. अगर 11 जिलों की बात करें तो यहां ओबीसी पहले और दलित दूसरे नम्‍बर पर आते हैं. ओबीसी की यहां करीब 50 से अधिक जातियां रहती हैं. वहीं दलित 25 से 30 प्रतिशत तक हैं. यही वजह है कि हर बार की सियासी जंग में सभी राजनीतिक दल भी अपनी-अपनी फौज को उसी हिसाब से तैयार करते हैं.

बात बसपा की करें तो सरकार बनने पर पार्टी ओबीसी वोटों के लिए रतनलाल अहीरवार, दद्दू सिंह, नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा, आरके सिंह पटेल सरीखे ओबीसी चेहरों से अपने मंत्रिमंडल को सजाती रही है. कुशवाहा जाति का यहां 6 से 10 प्रतिशत तक वोट है. वहीं लोधी जाति की बात करें तो 5 से 10 प्रतिशत तक है. कुशवाहों को साधने के लिए भाजपा ने स्‍वामी प्रसाद मौर्य का सहारा लिया है तो लोधी वोट लेने के लिए पुराना दांव आजमाते हुए कल्‍याण सिंह को तवज्‍जो दी है.

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नोट: दलित जाति के ये आंकड़े प्रतिशत में हैं.  

कुर्मी वोट की बात करें तो 6 से 10 प्रतिशत है। सपा ने कुर्मी वोट पर निशाना लगाते हुए बेनी प्रसाद वर्मा को साथ बैठाया है. फिर से उन्‍हें पहले जैसी तवज्‍जो दी गई है. लेकिन जीत के लिए अकेले ओबीसी वोट ही काफी नहीं होता है. उसके लिए दलित वोट का साथ होना जरूरी है। राजनीतिक विश्‍लेषक डॉ. मोहम्‍मद अरशद बताते हैं कि जातीय समीकरण का ये एक ऐसा गठजोड़ है कि जिस पर सपा-बसपा की खासी अच्‍छी पकड़ है. तभी तो 2012 के चुनावों में सपा को बुंदेलखण्‍ड में 53 में से 24 सीट मिली थीं. वहीं बसपा को 15 सीट पर ही सब्र करना पड़ा था. जबकि 2007 के चुनावों में बसपा को 24 और सपा को 6 सीट मिली थीं. इसी तरह से 2002 में बसपा को 13 और सपा को 11 सीट मिली थीं. जबिक भाजपा को यहां 5, 4 और 10 तक सीट मिली हैं।

सपा फिर से उठा सकती है फायदा

अलीगढ़ मुस्‍लिम यूनिवर्सिटी में राजनीति विज्ञान पढ़ाने वाले मुहीबुल हक बताते हैं कि 53 में से 24 सीट जीतने वाली सपा एक बार फिर फायदा उठा सकती है. बलिया से लखनऊ तक एक्‍सप्रेस-वे बनवाने की घोषणा अखिलेश यादव पहले ही कर चुके हैं. उसका प्रचार भी खूब जोरशोर से किया गया. बलिया से नजदीक होने के चलते बुंदेलखण्‍ड के कुछ जिलों को इस एक्‍सप्रेस-वे का सीधा फायदा मिलेगा. दूसरी सबसे बड़ी बात ये भी है कि अखिलेश यादव हमीरपुर से चुनाव लड़ने इच्‍छा जाहिर कर चुके हैं. दो साल से उनकी एक टीम भी वहां काम कर रही है.

जगह बनाने को भाजपा के लिए भी हो सकता है सुनहरा मौका

बेशक लम्‍बे समय से भाजपा सूबे की सत्‍ता से दूर रही है, बावजूद इसके इस चुनाव में जीत हासिल कर वह बुंदेलखण्‍ड में जगह बना सकती है. सभी इस बात से अच्‍छी तरह से वाकिफ हैं कि बुंदेलखण्‍ड कई गंभीर मुद्दों से जूझ रहा है. केन्‍द्र में भाजपा की सरकार है। इस बात का फायदा भाजपा चौथे चरण्‍ के 11 जिलों में उठा सकती है.

 

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