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अजित सिंह से छिटका जाट वोटर, पहली बार एक सीट पर सिमटी आरएलडी

फाइल फोटो

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दो राज्यों में किसानों की पार्टी कही जाने वाली आरएलडी इस चुनाव में एक सीट पर सिमटकर रह गई है. अपने घर छपरौली में ही आरए ...अधिक पढ़ें

    दो राज्यों में किसानों की पार्टी कही जाने वाली आरएलडी (राष्‍ट्रीय लोकदल) इस चुनाव में एक सीट पर सिमटकर रह गई है. अपने घर छपरौली में ही आरएलडी अपनी साख बचाने में कामयाब हो पाई है. गठजोड़ वाली सियासत के खेल में राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया चौधरी अजित सिंह को बादशाह माना जाता है.

    सरकार किसी की भी हो, लेकिन एक मंत्री पद अजित सिंह के खाते में तय माना जाता है. लेकिन ये पहला मौका होगा जब अजित सिंह न तो केंद्र सरकार के मंत्रिमंडल में दिखाई दे रहे हैं और न ही यूपी में दिखाई देंगे. बेशक गठबंधन किसी और के लिए मुश्‍किल काम होगा, लेकिन रालोद हमेशा से किसी भी पार्टी के साथ अपनी शर्तों पर ही गठबंधन करती आई है. इसकी बड़ी वजह है पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश के जाट वोटर, जिस पर रालोद का खासा प्रभाव बताया जाता है. लेकिन इस चुनाव में ये मिथक भी टूट गया.

    पश्चिमी उप्र में ये रहा हार-जीत का आंकड़ा

    बीजेपी- 171 सीट मिली हैं, 145 सीट का फायदा हुआ.

    सपा- 29 मिली हैं और 84 सीट का नुकसान हुआ.

    आरएलडी- एक सीट मिली और 8 सीट का नुकसान हुआ.

    बसपा- 5 सीट मिली और 43 सीट का नुकसान उठाना पड़ा.

     पिता चौधरी चरण सिंह के नक्‍शेकदम पर अजित सिंह

    कहा जाता है कि गठजोड़ वाली राजनीति के मामले में रालोद मुखिया चौधरी अजित सिंह अपने पिता किसानों के मसीहा और पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह के नक्‍शेकदम पर चल रहे हैं. पश्‍चिमी यूपी की सियासत के जानकार बताते हैं कि 1967 यूपी में कांग्रेस की सरकार थी. सरकार ठीक चल रही थी. लेकिन इसी दौरान चौधरी चरण सिंह ने सरकार गिरा दी और खुद मुख्‍यमंत्री बन गए. इसी तरह से वर्ष 1979  में केंद्र में मोरारजी देसाई की सरकार गिराकर चरण सिंह खुद प्रधानमंत्री बन गए. अजित सिंह ने भी गठजोड़ वाली सियासत की शुरुआत यूपी से ही की. मुलायम सिंह के साथ अजित सिंह की अच्‍छी बनती थी. लेकिन एक दिन अचानक से अजित सिंह ने एक नई पार्टी बनाकर उसका नाम जनता दल अजित सिंह रख दिया। बाद में इसका नाम बदलकर राष्‍ट्रीय लोकदल हो गया.

    पार्टी कोई भी, लेकिन मंत्री बने अजित सिंह    

    वीपी सिंह, नरसिंह राव हों या अटल बिहारी वाजपेयी और मनमोहन सिंह की सरकार, अजित सिंह को कभी फर्क नहीं पड़ा. कहा जाता है कि उनकी मंत्री बनने की जो ख्‍वाहिश होती थी वो हर किसी सरकार में पूरी हो ही जाती थी. अजित सिंह आखिरी बार मनमोहन सिंह सरकार में केंद्रीय उड्डयन मंत्री रहे थे. अजित सिंह लगातार बागपत से सांसद रहे. बस दो बार वो अपनी ही पुश्‍तैनी सीट से चुनाव हार गए थे. इसमें एक बार मोदी लहर के चलते उन्‍हें अपनी सीट गंवानी पड़ी.

    फिर रालोद के गठबंधन की खबर

    2012 का यूपी विधानसभा चुनाव भी रालोद ने कांग्रेस के साथ गठबंधन करके लड़ा था. लेकिन सपा लहर में रालोद और कांग्रेस को वो सफलता नहीं मिल पाई. अब एक बार फिर यूपी के चुनावों में रालोद संग कांग्रेस और सपा के गठबंधन की खबरें आ रही हैं. बताया जा रहा है कि किसी भी वक्‍त तीनों पार्टियों के बीच गठबंधन की खबर आ सकती है।

    कभी यूपी में हुआ करते थे रालोद के 84 विधायक

    कहा जाता है कि एक वक्‍त वो भी था कि जब रालोद के यूपी विधानसभा में 84 विधायक थे. पश्‍चिमी यूही ही नहीं यूपी के और भी दूसरे जिलों में रालोद की अच्‍छी खासी पकड़ थी. जानकार बताते हैं कि जाति समीकरण से दूर रालोद किसानों की पार्टी कही जाती थी. जाट, गुर्जर, मुसलमान हो या फिर राजपूत, सभी सिर्फ और सिर्फ किसान के रूप में जाने जाते थे. यही वजह थी कि चौधरी चरण सिंह को किसानों का मसीहा कहा जाता था. ये बात दूसरी है कि आज अजित सिंह की गठजोड़ वाली सियासत के चलते रालोद पश्‍चिमी यूपी के 15 जिलों में नौ सीटों पर सिमटकर रह गई है. नौ में से दो विधायक रालोद छोड़कर भाजपा में शामिल हो चुके हैं.

    घटती सीट के बाद भी जाटों पर है प्रभाव

    बताया जाता है कि आज भी पश्‍चिमी यूपी में वो पीढ़ी जिंदा है जिसने चौधरी चरण सिंह के साथ गन्‍ने के भुगतान की लड़ाई या फिर प्राकृतिक आपदा के चलते फसलों के मुआवजे की मांग की लड़ाई साथ-साथ लड़ी. बेशक आज चरण सिंह जिंदा नहीं हैं, लेकिन वो पीढ़ी आज भी अजित सिंह के रूप में अपने चौधरी चरण सिंह को सम्‍मान देती है. उस बुजुर्ग पीढ़ी के सम्‍मान में आज की युवा पीढ़ी रालोद की इज्जत बचाने के लिए उसे वोट देती है. लेकिन सवाल है कब तक?

    Tags: Ajit singh, Rld

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