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मोदी के बनारस में बीजेपी के लिए क्‍यों मुसीबत बनेे राहुल-अखिलेश

मोदी के बनारस में बीजेपी के लिए क्‍यों मुसीबत बनेे राहुल-अखिलेश

वर्ष 2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से डेव्‍यू किया था. पहली बार वह लोकसभा चुनाव लड़े, जीते और प्रधानमंत्री बने. यहां की जनता में इसे लेकर खासा उत्‍साह था कि अब यहां काफी विकास होगा. यह शहर तो पहले से ही मशहूर था. अब यह और वीआईपी हो गया है. इसलिए विधानसभा चुनाव में भी इस शहर के परिणाम पर सबकी नजर होगी.

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विधानसभा चुनाव के दौरान इस बार वाराणसी पर सबकी नजर होगी. वो इसलिए क्यों कि यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का संसदीय क्षेत्र है. बनारस के कुल 8 विधानसभा में अभी बीजेपी के पास 03, बीएसपी व सपा के पास 2-2 और कांग्रेस के पास 01 सीट है. बीजेपी के टिकट बंटवारे और सपा-कांग्रेस गठबंधन के बाद कई सीटों पर बीजेपी का समीकरण गड़बड़ा गया है.

यहां सातवें चरण में आठ मार्च को वोट पड़ेंगे. बीजेपी ने अपने तीन मौजूदा विधायकों में से दो लोगों का टिकट काट दिया है. इसमें शहर दक्षिणी से सात बार विधायक रहे श्‍यामदेव राय चौधरी ‘दादा’ की जगह नीलकंठ तिवारी एवं कैंट से ज्‍योत्‍सना के स्‍थान पर उनके बेटे सौरभ श्रीवास्‍तव को टिकट दिया गया है. बताया गया है कि दादा का टिकट कटने से उत्‍तरी, दक्षिणी और कैंट तीनों पर असर पड़ सकता है. अजगरा (सु.) सीट पहले ही बीजेपी ने सहयोगी दल भारतीय समाज पार्टी को सौंपने का निर्णय ले लिया है.

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यहां आंकड़े और सियासी समीकरण ये स्‍थिति बयां कर रहे हैं

शिवपुर: वर्ष 2012 में यहां बीएसपी के उदयलाल मौर्य 26.45 फीसदी वोट लेकर विधायक बने थे. 19.59 फीसदी वोट लेकर सपा के पीयूष यादव दूसरे स्‍थान पर रहे थे. कांग्रेस के वीरेंद्र सिंह को 17.66 फीसदी वोट मिले थे. भाजपा प्रत्‍याशी आरपी कुशवाहा 6.77 फीसदी वोट लेकर छठे स्‍थान पर थे. कांग्रेस और अपना दल की स्‍थिति भाजपा से अच्‍छी थी. यहां सपा-कांग्रेस गठबंधन का वोट मिलकर किसी का भी खेल बिगाड़ सकते हैं. उदयलाल मौर्य बसपा छोड़कर सपा में आए थे लेकिन उन्‍हें टिकट नहीं मिली. ऐसे में भाजपा के खिलाफ भितरघात की भी संभावना है.

अजगरा (सु.): वर्ष 2012 में इस सीट पर बीएसपी के त्रिभुवन राम विधायक थे. उन्‍होंने 32.35 फीसदी वोट हासिल किया था. यहां समाजवादी पार्टी के लालजी ने 31.23 फीसदी वोट लिया था. बीजेपी के हरिनाथ 12.27 फीसदी वोट लेकर तीसरे स्‍थान पर रहे थे. अब भाजपा ने प्रधानमंत्री के गृह क्षेत्र की यह सीट भारतीय समाज पार्टी के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष ओम प्रकाश राजभर को दे दी है. राजनीतिक विश्‍लेषकों का कहना है कि पार्टी को पहले ही लग गया था कि इस सीट पर उसकी दाल नहीं गलने वाली है इसलिए उसने सहयोगी पार्टी को सौंप दी.

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रोहनिया: वर्ष 2012 में यहां पर अपना दल की अनुप्रिया पटेल ने 30.22 फीसदी वोटों के साथ जीत दर्ज की थी. उस वक्‍त बीजेपी के संजय राय 9.67 फीसदी वोट लेकर चौथे स्‍थान पर थे. बसपा और सपा की स्‍थिति भी अच्‍छी थी. बीएसपी को 21.03 और सपा को 13.64 फीसदी वोट मिले थे. लोकसभा चुनाव के बाद 2014 में ही हुए यहां के उप चुनाव में बीजेपी की लहर के बावजूद इस सीट पर सपा के महेंद्र सिंह पटेल ने कब्‍जा किया.

पिंडरा: इस सीट पर 2012 में कांग्रेस के अजय राय ने जीत दर्ज की थी. उन्‍होंने 29.31 फीसदी वोट लेकर बीएसपी के जय प्रकाश को हराया था. भाजपा के पूर्णमासी को सिर्फ 1.84 फीसदी वोट से संतोष करना पड़ा था. वह यहां पांचवें नंबर पर थे. यहां अपना दल और समाजवादी पार्टी की स्‍थिति भाजपा से बहुत अच्‍छी थी. गठबंधन ने अजय राय का रास्‍ता इस बार भी आसान कर दिया है.

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सेवापुरी: 2012 में इस सीट पर समाजवादी पार्टी का कब्‍जा था. सपा के सुरेंद्र सिंह पटेल ने 31.87 फीसदी वोट लेकर 2012 में अपना दल के नील रतन पटेल को हराया था. 5.50 फीसदी वोट लेकर बीजेपी के देवेंद्र प्रताप छठे नंबर पर थे. बीएसपी तीसरे, कांग्रेस चौथे और कौमी एकता दल का प्रत्‍याशी पांचवें नंबर पर था.

वाराणसी कैंट: यह सीट वर्ष 1991 से लगातार बीजेपी के पास है. दूसरे नंबर पर जनता दल, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस जगह बनाते रहे हैं. वर्ष 2012 में 32.05 फीसदी वोट लेकर बीजेपी की ज्‍योत्‍सना श्रीवास्‍तव विधायक बनी थीं. इस सीट पर कांग्रेस को 24.94 और समाजवादी पार्टी को 20.99 फीसदी वोट मिले थे. इसलिए सपा और कांग्रेस का गठबंधन इस सीट पर भाजपा के लिए मुश्‍किल खड़ी कर सकता है. अपना दल को इस सीट पर सिर्फ एक फीसदी 1800 वोट यानी 01 फीसदी वोट मिले थे.

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शहर उत्‍तरी: 2012 में इस सीट पर बीजेपी का कब्‍जा था. 26.49 फीसदी वोट लेकर रविंद्र जयसवाल विधायक बने थे. बीएसपी के सुजीत कुमार मौर्य 25.20 फीसदी वोट लेकर दूसरे स्‍थान पर थे. कांग्रेस और सपा गठबंधन के बाद यह सीट भाजपा के हाथ से फिसलती नजर आ रही है. इस सीट पर 1996 से 2007 तक समाजवादी पार्टी का कब्‍जा रह चुका है. उसका वोटबैंक बना हुआ है. 2012 में यहां सपा को 20.67 और कांग्रेस को 17.13 फीसदी वोट मिले थे. यदि दोनों का वोट जुटता है तो फिर बीजेपी मुश्‍किल में फंस सकती है.

शहर दक्षिणी: यह बीजेपी की पारंपरिक सीट मानी जाती है. दादा के नाम से मशहूर श्‍यामदेव राय चौधरी 1989 से लगातार विधायक रहे हैं. लेकिन इस बार उनका टिकट कट गया है. वह नाराज बताए जा रहे हैं। इसलिए बीजेपी को नुकसान की आशंका है. कांग्रेस और सपा दोनों यहां दूसरे नंबर पर आते रहे हैं. 2012 के चुनाव में यहां कांग्रेस के दयाशंकर मिश्र ने 29.09 और सपा के मोहम्‍मद इस्‍तकबाल ने 9.67 फीसदी वोट हासिल किए थे. कौमी एकता दल को यहां पर 13.51 फीसदी वोट हासिल हुए थे. इन सभी के वोटबैंक को मिलाने पर बीजेपी खतरे में पड़ सकती है.

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पीएम के क्षेत्र में भी पूरा खर्च नहीं हुआ एमपीलैड का पैसा

आमतौर पर सांसदों से उम्‍मीद की जाती है कि वह एमपीलैड (मेंबर ऑफ पार्लियामेंट लोकल एरिया डेवलपमेंट स्‍कीम) का पैसा पूरा खर्च कर देंगे. लेकिन अधिकांश सांसद ऐसा नहीं कर पाते. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी अपने क्षेत्र में इस फंड का अभी तक पूरा इस्‍तेमाल नहीं कर पाए हैं. उन्‍होंने 68.56 फीसदी रकम खर्च की है. स्‍कीम की रिपोर्ट के अनुसार उन्‍होंने 10.73 करोड़ रुपये में से 6.86 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं. जबकि 3.88 करोड़ रुपये अभी बचे हुए हैं.

वाराणसी के वरिष्‍ठ पत्रकार विजय विनीत कहते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी ने अपने क्षेत्र में विकास की पहल तो की लेकिन अब तक वह दिख नहीं रहा. जिस जयापुर गांव को उन्‍होंने गोद लिया उसकी स्‍थिति अब बहुत खराब है. खडंजे और टॉयलेट खराब हो चुके हैं. गंगा सफाई के नाम पर सिर्फ प्रचार हुआ. अब तक जमीन पर कुछ नहीं दिख रहा. नावों को मॉडर्न बनाने का सपना दिखाया गया था लेकिन वह काम अब तक अधूरा है.

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विनीत बताते हैं लालपुर में बुनकर सेंटर का अच्‍छा काम किया गया है. बिजली की लाइनों को अंडरग्राउंड करवाने का काम यहां के लोगों को लाभ पहुंचाएगा. वाराणसी में कांग्रेस के पूर्व जिलाध्‍यक्ष रईस अहमद कहते हैं कि मोदी ने यहां पर सिर्फ प्रचार किया, काम कहीं नहीं दिख रहा है. यहां रेलवे स्‍टेशन से उतरिए शहर में जाइए तो आपको गड्ढे ही गड्ढे मिलेंगे. जबकि बीजेपी के क्षेत्रीय मीडिया प्रभारी संजय भारद्वाज कहते हैं कि वाराणसी में मोदी सरकार ने रिकार्ड काम करवाए हैं और उसी के आधार पर जनता वोट देगी.

मोदी की वजह से यहां के चुनाव परिणाम पर होगी सबकी नजर

ईटीवी, यूपी के राजनीतिक संपादक मनमोहन राय कहते  हैं  कि  वर्ष 2014 के आम चुनाव में नरेंद्र मोदी ने वाराणसी से डेव्‍यू किया था. पहली बार वह लोकसभा चुनाव लड़े, जीते और प्रधानमंत्री बने. यहां की जनता में इसे लेकर खासा उत्‍साह था कि अब यहां काफी विकास होगा. यह शहर तो पहले से ही मशहूर था. अब यह और वीआईपी हो गया है. इसलिए विधानसभा चुनाव में भी इस शहर के परिणाम पर सबकी नजर होगी.

चुनाव का दौर है इसलिए यहां का भी विकास डिबेट का विषय है. यहां विकास की कई बड़ी योजनाएं शुरू हुई हैं. यहां के लोगों की बात अब पीएमओ तक पहुंचती है. पीएमओ का एक कार्यालय भी यहां खुल गया है, जिसमें वरिष्‍ठ मंत्री बैठते हैं. चुनाव सिर पर है इसलिए सीटों के बंटवारे को लेकर असंतोष के स्‍वर बीजेपी में भी दिखाई दे रहे हैं.

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शहर दक्षिणी सीट से  श्‍यामदेव राय चौधरी की जगह नीलकंठ तिवारी एवं कैंट से ज्‍योत्‍सना श्रीवास्‍तव के स्‍थान पर उनके बेटे सौरभ श्रीवास्‍तव को टिकट दिया गया है. टिकट को लेकर यहां बीजेपी में इसलिए असंतोष ज्‍यादा दिख रहा है क्‍योंकि पार्टी की पकड़ यहां मजबूत है. ज्‍यादातर प्रत्‍याशियों को जीत की संभावना दिख रही है. उनकी स्‍थिति मजबूत है. अपना दल से गठबंधन के बाद बीजेपी के अच्‍छे रिजल्‍ट की उम्‍मीद है. इस गठबंधन का वाराणसी के आसपास ज्‍यादा फायदा मिलेगा.

मोदी के पीएम बनने के बाद सरकार पर वाराणसी का काफी फोकस है. यहां के कई लोगों को अवार्ड मिले हैं. यहां के लोगों को कई अहम पदों पर बैठाया गया है. यूपी में पीएम की 14 रैलियां होनी हैं, जिनमें से वाराणसी की रैली खास होगी. यहां से पूरे प्रदेश को संदेश देने की कोशिश होगी. चूंकि यह मोदी का लोकसभा क्षेत्र है ऐसे में अगर परिणाम बीजेपी के अनुरूप नहीं आए तो उनके यहां के काम पर सवाल उठेंगे. विपक्ष उन्‍हें घेर सकता है.

 

Tags: वाराणसी

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