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सपा-कांग्रेस की हालत टाइट, तो क्या यूपी में बीएसपी-बीजेपी में होगी असली फाइट!

सपा-कांग्रेस की हालत टाइट, तो क्या यूपी में बीएसपी-बीजेपी में होगी असली फाइट!

चुनाव में अभी तकरीबन छह महीने की देरी है तब तक हर रोज नए सियासी दांवपेंच सामने आएंगे और सत्ता का ऊंट कभी इस करवट तो कभी उस करवट बैठता दिखेगा।

चुनाव में अभी तकरीबन छह महीने की देरी है तब तक हर रोज नए सियासी दांवपेंच सामने आएंगे और सत्ता का ऊंट कभी इस करवट तो कभी उस करवट बैठता दिखेगा।

चुनाव में अभी तकरीबन छह महीने की देरी है तब तक हर रोज नए सियासी दांवपेंच सामने आएंगे और सत्ता का ऊंट कभी इस करवट तो कभी उस करवट बैठता दिखेगा।

    नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दांव-पेंच खूब चल रहे हैं, आखिर चले भी क्यों न? अगले साल विधानसभा चुनाव के लिए घमासान जो होना है। हर पार्टी अपना पूरा जोर लगा रही है, ताकि किसी भी तरह से देश के इस सबसे महत्वपूर्ण विधानसभा चुनाव में फतह हासिल कर सके। आम लोगों के बीच भी चुनाव को लेकर चर्चाएं हैं, आखिर उन्हें अगले 5 साल के लिए अपने प्रदेश की जिम्मेदारी किसी एक दल के हाथ जो देनी है।

    मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य को देखें तो समाजवादी पार्टी के पास इस समय तगड़ी जमीन है, पर वो पार्टी के हाथों में न होकर स्थानीय नेताओं के हाथ में है। ये नेता अधिकतर दबंग किस्म के हैं, जिनके हाथों से ये जमीन कई बार फिसलती रहती है। समाजवादी पार्टी कई मुद्दों पर अपनी भद्द पिटवा चुकी है। सांप्रदायिक तनाव के मसले हों या गुंडागर्दी के मामले। सत्तासीन नेताओं की आपसी प्रतिद्वंद्विता के चलते सरकार की बदनामी रही हो, या बयानवीरों की बदजुबानी। फिर सत्ताविरोधी लहर की अपनी जगह है। अखिलेश यादव ने सांप्रदायिक तनावों के बाद माहौल को काफी संभालने की कोशिश की, विकास के नारे दिए और इसमें संदेह नहीं है कि उन्होंने काम भी किया। पर जिस तरह से बाहुबली नेताओं को पार्टी में लाने जैसी बातें हुईं, या ग्रेटर नोएडा में गौमांस का मुद्दा उठा, उन्हें बैकफुट पर ही रहना पड़ा। ये वो वजह हैं, जिनकी वजह से समाजवादी पार्टी को आगामी चुनाव में भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।

    बात कांग्रेस की करें, तो कांग्रेस ने अपने पत्ते अभी से खोल दिए हैं। पार्टी की कमान राज बब्बर के हाथों में है, जिनकी अपनी जमीनी पकड़ उस तरह की नहीं है कि वो मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव, मायावती, राजनाथ सिंह के सामने ठहर सकें, फिर कांग्रेस ने रही सही कसर ब्राह्मण चेहरे पर दांव खेलकर पूरी कर दी। शीला दीक्षित दिल्ली आने से पहले उत्तर प्रदेश कांग्रेस में सक्रिय रहीं, पर दिल्ली की मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों पर ऐसी टिप्पणी कर दी थी कि वो अब भी उनका पीछा नहीं छोड़ रही। पार्टी द्वारा मजबूरी में उन्हें सामने लाना भी लोगों को कांग्रेस से दूर कर रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि शीला दीक्षित कांग्रेस के बेहद सक्षम नेताओं में से हैं, पर आम लोगों के बीच 'रिटायर्ड कैंडिडेट' ज्यादा अपील नहीं कर रहा।



    भारतीय जनता पार्टी की बात करें तो जमीन पर बड़े नेताओं की कमी साफ दिखती है। पार्टी ने अबतक प्रदेश में अपने पोस्टर बॉय की तस्वीर साफ नहीं की है। वैसे, बीजेपी के पास छोटे-छोटे क्षेत्रों के बड़े-बड़े कई नेता मौजूद हैं। पूर्वांचल में योगी आदित्यनाथ बड़ा चेहरा हैं, तो पश्चिम में राजनाथ सिंह (हालांकि राजनाथ सिंह निर्विवाद रूप से प्रदेश के ही नहीं, देश के भी बड़े नेताओं में शामिल हैं), महेश शर्मा, रामशंकर कठेरिया हैं। मध्य यानि अवध रीजन में वरुण गांधी प्रभावी चेहरा हो सकते हैं, पर उन्हें आगे बढ़ाया नहीं जा रहा। बुंदेलखंड में उमा भारती भी हैं, पर वो अबतक उत्तर प्रदेश की राजनीति में फायरब्रांड हिंदुत्ववादी चेहरा ही बनी हुई हैं। ऐसे में राजनाथ ही सर्वमान्य वो चेहरा हैं, जिन्हें पूरे प्रदेश में स्वीकार किया जा सकता है। हालांकि सवर्ण चेहरे के तौर पर वो ब्राह्मण, क्षत्रिय मतों में क्लीनस्वीप कर पाएंगे, ये देखना होगा। फिर भी बीजेपी अभी सपा-कांग्रेस से ऊपर ही दिख रही है। वैसे, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ इस चुनाव में निर्णायक भूमिका अदा कर सकता है, इस बात से कोई इनकार भी नहीं कर सकता। पूरे प्रदेश में आरएसएस का बेस काफी मजबूत हुआ है और चुनावों के समय अब तक का रिकॉर्ड देखें, तो आरएसएस काडर हमेशा से बीजेपी के लिए बेहद जमीनी काम करता रहा है।



    आखिर में बात करें बहुजन समाज पार्टी की, तो बहुजन समाज पार्टी अपने लक्ष्य की ओर चुपचाप बढ़ रही है। अगर आप लगातार खबरों में बहुजन समाज पार्टी से जुड़ी खबरों को नहीं पाते हैं, तो इसका मतलब ये बिल्कुल न निकालें कि बीएसपी चुनावी मैदान में किसी से पीछे रहेगी। बहुजन समाज पार्टी पहले से ही उपचुनावों, स्थानीय चुनावों से दूर रहने की रणनीति पर काम कर रही है, ताकि उसकी कमजोरियां किसी की पकड़ में न आएं। वो जमीनी बेस तैयार करने में जुटी है। खुद पार्टी के नेताओं को बयानबाजी से दूर रहने को कहा गया है, यहां तक कि उन्हें टीवी चैनलों की डिबेट से भी दूर ही रखा जाता है। पार्टी के पास खुद की करिश्माई नेता मायावती हैं, जो सबसे ज्यादा बार यूपी की सीएम रहने का संयुक्त रिकॉर्ड भी रखती हैं।



    बहुजन समाज पार्टी के पास इस समय सर्वजन(ब्राह्मण, दलित, पिछड़ों, मुस्लिमों) का साथ है, जो उन्हें 2007 में पूर्ण बहुमत भी दिला चुका है। पार्टी के पास अपना मजबूत आधार है, जो लोकसभा चुनावों में भी दिखा। पार्टी भले ही एक भी सीट नहीं जीत पाई, पर राज्य में करीब 20 फीसदी वोट पाकर वो तीसरे स्थान पर रही। ये वो समय था, जब भारतीय जनता पार्टी के पास नरेंद्र मोदी नाम की आंधी रही। सभी राजनीतिक दलों का सफाया हो गया, पर बीएसपी सफाए के बावजूद 4.1 फीसदी वोट लेकर पूरे देश की तीसरी सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी बनी रही। उसे ये फायदा इन चुनावों में भी मिलेगा। फिर मुस्लिम वोट बैंक को ब्राह्मण चेहरे की वजह से कांग्रेस से दूर हो रहा है, उसे भी बीएसपी अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है। समाजवादी पार्टी से मुस्लिम मतदाता थोड़ी दूरी बना रहे हैं, जिसका फायदा उठाने के लिए हरेक जिले में बहुजन समाज पार्टी अपने मुस्लिम नेताओं को पूरी छूट दे रही है, ताकि वो मतदाताओं को उसकी तरफ खींच सकें। दलितों के वोटों पर तो जैसे सिर्फ बहुजन समाज पार्टी का निशान छपा हो। ये वर्ग भी 2014 में खिसका था, पर हालिया विवाद उसे बीजेपी से दूर और बीएसपी के पास ला रहे हैं।


    इन सब तथ्यों को ध्यान में रखें, तो बहुजन समाज पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ही मुकाबले में सबसे आगे दिख रही हैं। दोनों ही पार्टियां इस बात को बखूबी जानती हैं। यही वजह है कि खुद मायावती जहां बहुजन समाज पार्टी से बहुजनों को जोड़ रही हैं, तो भारतीय जनता पार्टी के मुखिया अमित शाह लंबे समय से उत्तर प्रदेश में डेरा डाले हुए हैं। अमित बिना हो-हल्ले के सभी छोटे-बड़े कार्यकर्ताओं से मिल रहे हैं। वो स्थानीय ताकतों पर भी ध्यान दे रहे हैं। चुनाव में अभी तकरीबन छह महीने की देरी है तब तक हर रोज नए सियासी दांवपेंच सामने आएंगे और सत्ता का ऊंट कभी इस करवट तो कभी उस करवट बैठता दिखेगा। अंत में जीत उसी पार्टी की होगी जो संगठन की पूरी ताकत, कार्यकर्ताओं के जोश और नेताओं की सटीक रणनीति के साथ मैदान में उतरेगी।

    Tags: Akhilesh yadav, Bahujan samaj party, BJP, BSP, Congress, Mayawati, Mulayam Singh Yadav, Narendra modi, Rajnath Singh, Samajwadi party, Yogi adityanath

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