संघ को भरोसा, यूपी की रेस में आगे है बीजेपी

यूपी में बीजेपी की परिवर्तन यात्राएं चल रही हैं। सरकार और संगठन के तमाम बड़े नेता इसमें शामिल हैं और पार्टी की नैया पार लगाने की जुगत में हैं।

अमिताभ सिन्हा | News18India.com
Updated: November 9, 2016, 4:15 PM IST
संघ को भरोसा, यूपी की रेस में आगे है बीजेपी
यूपी में बीजेपी की परिवर्तन यात्राएं चल रही हैं। सरकार और संगठन के तमाम बड़े नेता इसमें शामिल हैं और पार्टी की नैया पार लगाने की जुगत में हैं।
अमिताभ सिन्हा | News18India.com
Updated: November 9, 2016, 4:15 PM IST
नई दिल्ली। यूपी में बीजेपी की परिवर्तन यात्राएं चल रही हैं। सरकार और संगठन के तमाम बड़े नेता इसमें शामिल हैं और पार्टी की नैया पार लगाने की जुगत में हैं। बिहार से इतर अब सब जानते हैं कि लड़ाई 2019 की है इसलिए ढिलाई की गुंजाइश भी नहीं। चिंता 2019 की ही है, तभी तो संघ भी पीछे नहीं हट रहा। संघ जानता है कि एक प्रचारक पीएम हैं और केंद्र में बहुमत तक पहुंचने में लाखों कार्यकर्ताओं को अपना खून पसीना बहाना पड़ा है। ऐसे में यूपी में भी संघ की भागीदारी खासी नजर आने लगी है।

संघ की कई महत्वपूर्ण बैठकें यूपी के विभिन्न इलाकों में हो चुकी हैं। संघ प्रमुख मोहन भागवत खुद कई बार यूपी के चक्कर लगा चुके हैं। संघ के कई वरिष्ठ नेताओं का हेडक्वार्टर इन दिनों लखनऊ ही नजर आने लगा है। जाहिर है संघ की भी साख दांव पर है। संघ के शीर्ष सूत्रों की मानें तो यूपी में बात बनने लगी है। संघ का मानना है कि मुलायम सिंह यादव के कुनबे में मचे घमासान के बाद भले ही अल्पसंख्यक वोट बैंक मायावती की ओर खिसकने के आसार नजर आने लगे हैं लेकिन दलित और अल्पसंख्यकों को वोट पूरी तरह से मायावती को नहीं पड़ेंगे। संघ का मानना है कि दलितों में भी शत प्रतिशत वोट मायावती को नहीं मिलने वाले। इसलिए बीजेपी हर सीट पर रेस में है जिसे जीत में बदलने के लिए रणनीति बन चुकी है।

संघ के एक शीर्ष नेता का मानना है कि सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव का लालू, अजीत सिंह और दूसरे नेताओं के साथ लखनऊ में मंच साझा करना ही जता रहा है कि मुलायम ने हार मान ली है। तभी तो महागठबंधन के लिए मुलायम ने एक बार फिर जोर शोर से पहल शुरू की है। लेकिन संघ के उच्च पदस्थ सूत्र की मानें तो यही है मुलायम का ‘एडमिशन ऑफ डिफीट’ यानि हार की स्वीकारोक्ति। हालांकि बीजेपी को चिंता इस बात की भी है कि अगर दलित और अल्पसंख्यक वोट मिल गए तो मायावती फिर से सत्ता पर काबिज हो जाएंगी। इसलिए नेतृत्व को लगता है कि महागठबंधन का बनना जरूरी है जिससे न सिर्फ अल्पसंख्यक वोट बंटे बल्कि पिछड़ी जातियों के वोटों का पेंच भी फंस जाए। अब दुआ तो यही हो रही है कि महागठबंधन बने और त्रिकोणीय संघर्ष हो ताकि बीजेपी की जीत का रास्ता खुला रहे।

अब बात मुद्दे की, जिसमें जय श्रीराम का राग छेडा गया। हिंदुओं के पलायन का मुद्दा भी उठाया गया। पर चुनाव के पहले यूपी में 'बीजेपी का चेहरा कौन' के सवाल से आलाकमान अब तक बचता चला आ रहा है। हालांकि संकेत दिए गए थे कि मायावती और मुलायम के कद का नेता प्रोजेक्ट किया जाएगा। लेकिन बात अभी नहीं बनी। इंतजार लंबा हो रहा है।

संघ के उच्च पदस्थ सूत्र की मानें तो अभी ये मुद्दा खत्म नही हुआ है। संघ और पार्टी का आलाकमान एक नेता प्रोजेक्ट करने के लिए मन बना रहा है। शायद चेहरे को लेकर कोई गेम प्लान तैयार है जिसका खुलासा करने को फिलहाल कोई तैयार नहीं। पर इतना तो साफ है कि परिवर्तन यात्राएं और पीएम मोदी की ताबड़तोड़ रैलियां कर पार्टी ये साबित करना चाहती है कि यही एक चेहरा है जो वोटरों को भाता है।

 
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