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ये समीकरण तय करते हैं किसके सिर होगा पश्‍चिमी उप्र का ताज, अभी तक सपा-बसपा का रहा है कब्‍जा

ये समीकरण तय करते हैं किसके सिर होगा पश्‍चिमी उप्र का ताज, अभी तक सपा-बसपा का रहा है कब्‍जा

गैटी इमेजिज

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पूर्वांचल के बाद पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश ऐसा क्षेत्र है जिसने सूबे को सबसे ज्‍यादा मुख्‍यमंत्री दिए हैं। जिस तरह से दिल्‍ली की राजनीति यूपी तय करता है ठीक उसी तरह से चुनावों के दौरान सूबे की सियासी हवा का रुख काफी हद तक पश्‍चिमी उप्र का वोटर तय करता है।

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नई दिल्‍ली। पूर्वांचल के बाद पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश ऐसा क्षेत्र है जिसने सूबे को सबसे ज्‍यादा मुख्‍यमंत्री दिए हैं। जिस तरह से दिल्‍ली की राजनीति यूपी तय करता है ठीक उसी तरह से चुनावों के दौरान सूबे की सियासी हवा का रुख काफी हद तक पश्‍चिमी उप्र का वोटर तय करता है। कहा जाता है कि यहां मुद्दों से ज्‍यादा जातीय समीकरण पार्टियों का गणित बनाते और बिगाड़ते रहे हैं। लेकिन ये भी सच है कि कम से कम एक वर्ग में ही सही, लेकिन 2014 के लोकसभा चुनावों के बाद मुद्दों के लिए भी आवाज उठने लगी है। मतदान के पहले चरण में शामिल पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश की ऐसी ही 60 विधानसभाओं का राजनीतिक विश्‍लेषण किया न्‍यूज 18 इण्‍डिया डॉट कॉम की टीम ने।

हम जिन 60 विधानसभा क्षेत्रों की बात कर रहे हैं वो आगरा, अलीगढ़, मेरठ और सहारनपुर मंडल से आती हैं। वैसे तो पहले चरण के मतदान में 73 सीट शामिल हैं। लेकिन परिसीमन के बाद 2007 और 2012 की विधानसभाओं में आए अंतर के चलते 2007 से संबंधित 60 सीट ही शामिल की गई हैं।

जानकार बताते हैं कि 2007 में सरकार बनाने वाली बसपा को यहां से 32 सीट मिली थीं। जबकि 2012 में बसपा 23 सीट पर ही सिमट कर रह गई थी। अब बात सपा की करें तो 2007 की तीन सीट के मुकाबले 2012 में 24 सीट हासिल की थी। दोनों के ही मामले में एक खास बात ये है कि पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश के इस क्षेत्र से शुरू हुआ विजय अभियान लखनऊ में सरकार बनाने के बाद ही रुका था। इस क्षेत्र की ऐसी धारणा भी है कि अगर चुनाव के पहले चरण में इस क्षेत्र से आपको वोट मिल जाए तो वोट मिलने का ये सिलसिला पूर्वांचल और बुंदेलखण्‍ड में भी जारी रहता है।

फोटो-गैटी इमेजिज
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अब जरा जीत के आधार की बात करें तो यहां जाट-मुस्‍लिम और दलित-मुस्‍लिम का समीकरण उम्‍मीदवारों संग किसी भी राजनीतिक दल की किस्‍मत बनाता और बिगाड़ता है। जानकार बताते हैं कि ये ही वो समीकरण था जिसने 2007 में बसपा की तो 2012 में सपा की सरकार बनवाई थी।

यहां जरूरी हो जाता है जाट वोटरों को मनाना

जानकारों की मानें तो पहले चरण के चुनाव की 73 में से 51 सीट ऐसी हैं जहां जाट वोटर जिस तरफ करवट लेता है वहीं हार-जीत के समीकरण बदलने लगते हैं। ये वोटर उस वक्‍त और ज्‍यादा अहम हो जाता है जब इसके साथ मुस्‍लिम वोटर आ जाता है। खास बात ये है कि 51 में से 25, 30 सीट वो हैं जहां मुस्‍लिम वोटर भी अच्‍छी खासी संख्‍या में है। जानकार बताते हैं कि इन सीटों पर मुस्‍लिम वोटरों की संख्‍या 25 हजार से लेकर 60 हजार तक है। ग्रामीण क्षेत्रों से ज्‍यादा मुस्‍लिम वोटर शहरी सीट पर हैं। यही वजह है कि 2007 के चुनावों पर निगाह डालें तो मेरठ, आगरा और अलीगढ़ की सभी शहर सीट मुस्‍लिम उम्‍मीदवारों के खाते में गई थी।

ऐसे ही नहीं कही जाती दलितों की राजधानी

पश्‍चिमी उत्‍तर प्रदेश और उससे लगे कुछ जिलों को ऐसे ही दलितों की राजधानी नहीं कहा जाता है। 2007 और 2012 ही नहीं इससे पहले भी बसपा इस खास क्षेत्र में 20 से अधिक सीटों पर कब्‍जा करती रही है। बसपा की स्‍थिति उस वक्‍त और दमदार हो जाती है जब उसके साथ मुस्‍लिम वोटर खुलकर आ जाता है। इसका एक उदाहरण हम आगरा की छह सीट के रूप में देख सकते हैं। यहां दलित-मुस्‍लिमों का गठजोड़ होने पर नौ में से छह सीट बसपा के खाते में गई थी। 2007 में ये आंकड़ा सात सीट पर था।

इन मुद्दों पर मुखर हो सकती है आवाज

केंद्रीय नौकरियों में जाटों के लिए आरक्षण, हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के पीड़ित जाटों को मुआवजा, जाटों पर टिप्‍पणी करने वाले सांसद राजकुमार सैनी पर कार्रवाई की मांग भी यहां मुद्दा बन चुका है। सूत्रों की मानें तो चुनावों के दौरान ये मुद्दे उम्‍मीदवारों के सामने मुखर भी हो सकते हैं।

नौ सीट वाली रालोद को भी नहीं कर सकते नजरअंदाज

सियासी जानकार बताते हैं कि बेशक 2012 में रालोद को नौ सीट मिली थीं1 लेकिन बावजूद इसके इस क्षेत्र में रालोद को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। आज भी पश्‍चिमी उप्र में चौधरी चरण सिंह वाला प्रभाव बाकी है। जानकार बताते हैं कि करीब 20 से 25 सीट ऐसी हैं जहां रालोद जाट वोटर के चलते उलटफेर करने वाली पार्टी मानी जाती है।

इस बारे में सामाजिक और राजनीतिक विश्‍लेषक डॉ. मोहम्‍मद अरशद बताते हैं कि इस बार खास बात ये है कि 15 जिलों की इन 73 सीट पर जातीय समीकरण के साथ-साथ मुद्दे भी हावी रहेंगे। कुछ मुद्दे ऐसे हैं जो केन्‍द्र में भाजपा की सरकार के पास लंबित पड़े हुए हैं। जिसके चलते भाजपा को परेशानी का सामना करना पड़ सकता है।

Tags: BSP, Congress, Rld, Samajwadi party

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