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अजीत के साथ कौन सा गणित बिठाना चाहते हैं मुलायम?

अफसर अहमद | News18India.com
Updated: June 8, 2016, 4:52 PM IST
अजीत के साथ कौन सा गणित बिठाना चाहते हैं मुलायम?

बीते रविवार को दोपहर के करीब यकायक यूपी की सियासी जमीन पर एक नया रंग उड़ा। दिग्गज मुलायम से मिलने आरएलडी के अजीत सिंह पहुंचे। मुलायम-अजीत की ये मेल मुलाकात ऊपरी तौर पर भले ही ...

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नई दिल्ली। बीते रविवार को दोपहर के करीब यकायक यूपी की सियासी जमीन पर एक नया रंग उड़ा। दिग्गज मुलायम से मिलने आरएलडी के अजीत सिंह पहुंचे। मुलायम-अजीत की ये मेल मुलाकात ऊपरी तौर पर भले ही औपचारिक नजर आती हो लेकिन इसके राजनीतिक मायने बहुत ज्यादा हैं। सवाल उठता है कि यूपी चुनाव के लिए कमर कसते मुलायम को अजीत से मिलने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या वो बीएसपी की संभावित बढ़त की काट ढूंढ़ रहे हैं या अजीत को बीजेपी के पाले में जाने से पहले ही लपक लेना चाहते हैं?

दरअसल यूपी का सत्ता संग्राम जीतने के लिए बड़े दलों का छोटे दलों को अपना साथ लाना राजनीतिक मजबूरी है। ऐसा न करने पर वो जीतेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। हाल में बिहार और असम के चुनाव ये बता रहे हैं कि चुनावों से पहले  गोलबंदी कारगर साबित हो सकती है। बिहार में नीतिश ने अपने दो दशकों पुराने विरोधी लालू से हाथ मिलाकर बीजेपी को चारों खाने चित कर दिया वहीं बीजेपी ने असम गण परिषद से हाथ मिलाकर असम में कांग्रेसी किले को ढहा दिया।

अब यूपी की बारी है। यूपी में कमोवेश बिहार जैसा ही राजनीतिक गणित है लेकिन कुछ बातें पत्थर की लकीर की तरह साफ नजर आती हैं। वो ये कि एसपी और बीएसपी कभी साथ नहीं आ सकते। साथ ही इस बात के भी कोई आसार नहीं हैं कि कांग्रेस एसपी के साथ कोई समझौता कर ले। और ऐसा न होना एसपी के लिए बेहद मुसीबत भरा साबित हो सकता है। एक तो एंटी इंनकंबेंसी और दूसरा मुस्लिम वोटों का अस्थिर होना सपा मुखिया को परेशान कर रहा है।

अजीत को साथ लाकर मुलायम एक नया गणित बिठाना चाहते हैं। वो दरअसल यादव-मुस्लिम-जाट का एक कॉम्बिनेशन बिठाना चाहते हैं। ऐसा करके मुलायम अपने से छिटकते उन मुस्लिम वोटरों के ये भरोसा भी दिला सकते हैं कि उनके जीतने के आसार हैं। यहां बताते चलें कि अजीत यूपी में एकमात्र स्थापित जाट नेता हैं और जाट बैल्ट में उनका अच्छा खासा प्रभाव है। ये बात अलग है कि बीते लोकसभा चुनावों में न तो उनका बेटा मथुरा से और न ही वो बागपत से चुनाव जीत सके।

वोटों के लिहाज से पश्चिम प्रदेश को जाट बैल्ट कहा जाता है इसमें मथुरा, अलीगढ़, मेरठ और मुजफ्फरनगर आते हैं। जानकार मुलायम का ये कदम काफी नपा तुला मान रहे हैं। वजह साफ है कि हरियाणा प्रकरण के कारण जाट बीजेपी से बेहद खफा हैं। मुलायम दरअसल इसी नाराजगी और अजीत की दोस्ती को आगे चलकर सीटों में तब्दील करने की इच्छा रखते हैं। बताते चलें कि बीते लोकसभा चुनावों में जाटों ने बीजेपी को जोरदार समर्थन दिया था। पर इस बार हालात बदले हुए हैं। जाट समुदाय हरियाणा आरक्षण प्रकरण को लेकर बीजेपी से खफा नजर आ रहा है। दूसरा ये कि जाट यूपी सरकार में अपनी हिस्सेदारी चाहते हैं।

इस बीच ये जानना भी जरूरी है कि इस पूरी बहस का केंद्र बिंदु बने अजीत सिंह को इस गठजोड़ से क्या मिलने वाला है। सूत्रों के मुताबिक अजीत दरअसल बीजेपी के साथ गठजोड़ करना चाहते थे लेकिन वहां उनकी दाल नहीं गली। बीजेपी का एक बड़ा वर्ग उनसे गठजोड़ के खिलाफ था। पिछले बार उनके साथ गठजोड़ कर घाटे में रही बीजेपी ने उनके सामने ऐसी शर्त रखी जिसे वो स्वीकार करने को तैयार नहीं थे। दरअसल बीजेपी चाहती थी कि वो अपनी पार्टी का बीजेपी में विलय कर दें और बदले में एक राज्यसभा सीट और केंद्र में मंत्री पद ले लें। अजीत सिंह को यह स्वीकार नहीं था। लिहाजा वो कोशिश परवान नहीं चढ़ सकी।

इसी बीच सपा के कद्दावर नेता शिवपाल सिंह उनसे मिलने उनके घर पहुंचे। यहीं से सपा के साथ उनके गठजोड़ की चर्चाएं जोर पकड़ने लगीं। उसके जब वो मुलायम से मिलने पहुंचे तो यह तय हो गया कि ये दोस्ती चुनाव वाली है। इस बीच सपा के राम गोपाल का बयान आया जिसे जानकार आरएलडी पर दबाव बनाने की रणनीति का एक हिस्सा मान रहे हैं। रामगोपाल ने कहा था कि अपनी विश्वसनीयता खो चुके लोगों से हाथ मिलाना सपा के लिए समझदारी भरा नहीं होगा।जानकारों की नजर में अजीत सिंह अपनी हालिया स्थिति को देखते हुए बड़े दलों के साथ ज्यादा बड़ी सौदेबाजी करने की स्थिति में नहीं हैं लेकिन वो ये पूरी कोशिश करेंगे कि जीतने की स्थिति में उनका बेटा मंत्री बने और उनकी पार्टी की विधानसभा में अच्छी सीटें आएं ताकि वो चुनाव बाद जीतने की स्थिति में एसपी पर ज्यादा मंत्री पदों के लिए दबाब बना सकें। लेकिन ये दोस्ती होगी और होगी तो क्या टिकी रहेगी, इस सवालों के जवाब अभी भविष्य के गर्त में हैं।

 

 

 

 

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First published: June 1, 2016, 3:00 PM IST
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