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गुजरात में युवा चेहरों की फैन फॉलोविंग से सियासी माथों पर चिंता की लकीरें

गुजरात में युवा चेहरों की फैन फॉलोविंग से सियासी माथों पर चिंता की लकीरें

गुजरात में विधानसभा चुनाव को अभी 11 महीने जितना वक्त है, लेकिन इन दिनों गुजरात की राजनीति में युवा नेता जिस तरह से अपनी हैसियत दिखा रहे हैं उसने प्रमुख राजनीतिक दलों को सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है.

गुजरात में विधानसभा चुनाव को अभी 11 महीने जितना वक्त है, लेकिन इन दिनों गुजरात की राजनीति में युवा नेता जिस तरह से अपनी हैसियत दिखा रहे हैं उसने प्रमुख राजनीतिक दलों को सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है.

गुजरात में विधानसभा चुनाव को अभी 11 महीने जितना वक्त है, लेकिन इन दिनों गुजरात की राजनीति में युवा नेता जिस तरह से अपनी हैसियत दिखा रहे हैं उसने प्रमुख राजनीतिक दलों को सिरे से सोचने पर मजबूर कर दिया है.

गुजरात में विधानसभा चुनाव को अभी 11 महीने का वक्त है, लेकिन इन दिनों गुजरात की राजनीति में युवा नेता जिस तरह से अपनी हैसियत दिखा रहे हैं उसने प्रमुख राजनीतिक दलों की चिंंता बढ़ा दी है. जी, हां हम बात कर रहे हैं गुजरात में उभरते हुए नए चेहरों की. चाहे बात पाटीदार नेता हार्दिक पटेल की हो, चाहे ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर की, इन युवा नेताओं के लिए भारी भीड़ जुटने लगी है.

अब सवाल ये उठता है कि ऐसा क्या है कि लोग इतनी संख्‍या में उन्हें सुनने आने लगे? सवाल ये है कि क्या युवा नेताओं ने लोगों की उम्मीदें जगाई हैं? क्या उनसे लोगों की उम्मीदें बंधी हैं. फिलहाल तो कुछ ऐसा ही लग रहा है.

पाटीदारों को आरक्षण मिले इसको लेकर आंदोलन शुरू करने वाले हार्दिक पटेल राजद्रोह के आरोप में 180 दिन गुजरात से बाहर सशर्त जमानत पर रहे. 180 दिन 16 जनवरी को ख़त्म हो गए. छह महीने तक कांग्रेसी नेता के घर शरण लेने वाले हार्दिक 17 जनवरी को गुजरात पहुंचे और पाटीदारों को संबोधित करते हुए आरक्षण आंदोलन दोबारा छेड़ने का सियासी दांव चला.

हार्दिक केे आंदोलन को फिर मिलने लगा बल 

हार्दिक की गुजरात में एंट्री और स्थानीय मीडिया के लगातार कवरेज ने राज्य सरकार की चिंता बढ़ा दी है. इस बार फिर हार्दिक अपनी सियासी चाल चलने जा रहे हैं. गांव-गांव घूमकर वह आरक्षण आंदोलन को हवा देना चाहते हैं जो उनकी गैर मौजूदगी मैं बिलकुल खामोश हो गया था. हार्दिक भी जानते हैं कि आरक्षण किसी भी हाल में नहीं मिल सकता. फिर भी वह बिखरी हुई टीम के बीच एक राजनेता की तरह माहौल बनाने में सफल रहे हैं. यह सब इसलिए क्‍योंकि अगर आप सिस्टम से बाहर की बात करते हैं तो लोगों को उम्मीद बनती है और यही उम्मीद इनदिनों भीड़ का रूप ले रही है.

अल्‍पेश ने छूआ युवाओं का दिल

एक ओर हार्दिक आरक्षण के मुद्दे पर सियासी अखाड़े में हैं तो वहीँ बेरोजगारी के मुद्दे पर ओबीसी नेता अल्पेश ठाकोर भी लोगों को सीधे छूने वाले मुद्दे लेकर आजमाईश कर रहे हैं. आरक्षण, बेरोजगारी युवाओं को छूने वाले मुद्दे हैं और इन्ही मुद्दों को जोरशोर से उठाया जा रहा है जिससे युवा वर्ग अपने भीतर भविष्य के सपने को संजोये इन्हें समर्थन दे रहा है.

जहां तक अल्पेश की बात करें तो शराबबंदी के खिलाफ छेड़ी गई उनकी मुहिम के चलते सरकार को कानून सख्त बनाना पड़ा. यह मुद्दा उनके रिपोर्ट कार्ड में एक सफलता के रूप में दर्ज है. वो मुद्दा अभी शांत भी नहीं हुआ था कि उन्‍होंने बेरोजगारी के मुद्दे पर राग छेड़ा. यह भी ऐसा विषय है जो समाज के हर कोने को असर करें.

इसको लेकर अल्पेश ने हार्दिक से भी एक कदम आगे एक बड़ी चाल चली. न की केवल ओबीसी बल्कि पाटीदार, आदिवासी, दलित, मुस्लिम सभी तबको में खुद की स्वीकृति बने. इसको लेकर उन समुदायों के युवा नेताओं को एक मंच पर लाया गया वह भी वायब्रंट गुजरात ग्लोबल समिट के चंद दिन पहले ही. बेरोजगार यात्रा आयोजित की गयी, लेकिन इस यात्रा में ज्यादातर ठाकोर समुदाय का समर्थन ही मिला जिसके नेता अल्पेश हैं. इससे उन्हें एक बात तो समझ आ गयी कि राजनीति अपने समुदाय तक खेली जाये तो ही इसका नतीजा असरदार होगा.

हालांकि इन युवा नेताओं के मनोबल को तोड़ने के प्रयास समय-समय पर होते रहे. चाहे राजद्रोह का मुक़दमा हो चाहे रासुका लगाने की धमकी हो. कई बार धमकियां काम आ भी गयी और मुद्दों को कुछ समय तक सफलतापूर्ण दबाया भी गया और थोड़े समय के लिए ही सही सरकार के लिए राहत रही लेकिन वो भी कबतक यह भी एक बड़ा सवाल है?

आंकड़े जुटा रहा सरकार का खुफिया तंत्र 

17 जनवरी को सुरेंद्रनगर के रैली में तक़रीबन 20 हज़ार लोग अल्पेश को सुनने पहुंचे. वहीं हार्दिक को भी सुनने 8 से दस हज़ार लोग गए थे. इन रेलियों में आ रहे लोगों के आकड़ों को जुटाने में राज्य सरकार का पूरा ख़ुफ़िया विभाग जुट गया .यह दर्शाता है कि सरकार इसे कितनी गंभीरता से ले रही है.

ये बात अलग है कि भीड़ वोटों में कितनी तब्दील होगी? होगी भी या नहीं ? क्या यह केवल एक ब्रांड इमेज के तौर पर ही रह सकेगा या इसका राजनतिक फायदा भी होगा? फिलहाल दोनों युवा नेता राजनीति से दूर रहने की दुहाई दे रहे हैं लेकिन यह अब छुपा नहीं है कि किंग बनने से ज्यादा किंगमेकर की भूमिका में रहना पसंद कर रहे हैं. जो भी हो इन युवा नेताओं के आक्रामक तेवरों ने प्रमुख राजनीतिक दलों को यह सोचने पर जरुर मजबूर कर दिया है की लोगों को अब युवाओं से ही ज्यादा उम्मीद है.

Tags: Alpesh thakor, Hardik Patel

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