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कोई जीते कोई हारे... बादल का अपना रिकॉर्ड बरकरार
Amritsar News in Hindi

News18Hindi
Updated: March 11, 2017, 12:47 PM IST
कोई जीते कोई हारे... बादल का अपना रिकॉर्ड बरकरार
प्रकाश सिंह बादल के राजनीतिक सफर की शुरुआत कांग्रेस से हुई, लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस से किनारा कर शिरोमणि अकाली दल का दामन थाम लिया. ये वो दौर था जब पंजाब की राजनीति में बादल और शिरोमणि अकाली दल दोनों का कद बढ़ रहा था.

प्रकाश सिंह बादल के राजनीतिक सफर की शुरुआत कांग्रेस से हुई, लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस से किनारा कर शिरोमणि अकाली दल का दामन थाम लिया. ये वो दौर था जब पंजाब की राजनीति में बादल और शिरोमणि अकाली दल दोनों का कद बढ़ रहा था.

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  • Last Updated: March 11, 2017, 12:47 PM IST
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दिल्ली. कोई जीते कोई हारे मेरा रिकॉर्ड तो चंगा है न! ऐसा प्रकाश सिंह बादल तो कम से कम कह ही सकते हैं. उनके राजनीतिक सफ़र को देखकर शायद उनके राजनीतिक विरोधी भी रश्क खाते हों.. एक बार फिर लांबी कि जनता ने अपने इस उम्रदराज नेता पर भरोसा दिखाया और बादल को फिर जीत मिली. हालांकि, उन्हें ये सीट जीतने के लिए काफी मशक्कत भी करनी पड़ी, जैसा कि जीत का अंतर इशारा कर रहा है.

लांबी सीट से उनके खिलाफ कांग्रेस के दिग्गज नेता कैप्टन अमरिंदर सिंह मैदान में थे. इस सीट पर बादल ने 22,770 मतों से जीत दर्ज की है. ये अंतर उनकी पिछली जीत से भी कम है. चुनावी रैलियों में बादल उनके निशाने पर भी खूब रहे. बादल ने  भले ही सत्ता गंवा दी, लेकिन जीतने का उनका व्यक्तिगत रिकॉर्ड शानदार रहा है.

7 दशक पुराना है राजनीतिक सफर
प्रकश सिंह बादल का राजनीतिक सफर सात दशक पुराना है. बादल पांच बार पंजाब के मुख्यमंत्री रह चुके हैं. 1970 में जब वह मुख्यमंत्री बने थे तब वह सबसे युवा मुख्यमंत्री थे. दिलचस्प पहलू ये भी है कि 5 साल पहले उन्होंने 84 साल की उम्र में सबसे उम्रदराज मुख्यमंत्री के तौर पर भी शपथ ली थी.

सरपंच के चुनाव से हुई शुरुआत
प्रकाश सिंह बादल 1947 में पहली दफा सरपंच का चुनाव जीतकर राजनीति के मैदान में आये थे. तब उनकी उम्र महज 20 साल ही थी. इस लिहाज से देखें तो उनकी राजनीति और भारत की आज़ादी सामानांतर ही अब तक आगे बढ़ रही है.

1957 में पहली बार वो कांग्रेस के टिकट पर विधानसभा पहुंचे. इसके बाद 1969 में उन्हें जनता ने दोबारा विधानसभा पहुंचाया. 70 के दशक में ही पहली दफा उन्हें मंत्री पद मिला और इसके बाद उनकी राजनीति का विस्तार होता चला गया. 1970-71 में वो पहली दफा पंजाब के मुख्यमंत्री बनाए गए.बादल के राजनीतिक सफर की शुरुआत कांग्रेस से हुई, लेकिन बाद में उन्होंने कांग्रेस से किनारा कर शिरोमणि अकाली दल का दामन थाम लिया. ये वो दौर था जब पंजाब की राजनीति में बादल और शिरोमणि अकाली दल दोनों का कद बढ़ रहा था.

परिवारवाद का लगता रहा आरोप
प्रकाश सिंह बादल पर विपक्षी परिवारवाद का आरोप भी लगते आये हैं. इसके पीछे कि वजहें भी साफ़ नजर आती हैं. बादल परिवार के कई सदस्य राजनीति में सक्रिय हैं और राज्य व केंद्र सरकार में अलग-अलग ओहदों पर हैं. उनके बेटे सुखबीर सिंह बादल राज्य के उपमुख्यमंत्री हैं. सुखबीर कि पत्नी हरसिमरत कौर बादल केंद्र में मंत्री हैं और हरसिमरत के छोटे भाई बिक्रम सिंह मजीठिया भी इस समय राज्य की मंत्री परिषद में शामिल हैं. इसके आलावा भी कई पदों पर इस परिवार या करीबी ही जमे हुए हैं.

1997 से किसी और की नहीं हुई लांबी
1997 से बादल लांबी सीट से लगातार जीत दर्ज कर रहे हैं. इस दफा लांबी के मतदाता अपने इस उमदराज राजनेता को दोबारा चुनते हैं या फिर कांग्रेस कि और से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी घोषित किए गए कैप्टन अमरिंदर सिंह को सिर आँखों पर बिठाते हैं, ये देखना दिलचस्प रहेगा. कैप्टन पहले ही इस विधानसभा चुनाव को अपना आखिरी चुनाव बता चुके हैं.

पंजाब की राजनीति में गुजारी उम्र
पांच बार पंजाब के सीएम बनने वाले भी बादल इकलौते नेता हैं। वो 1972, 1980 और 2002 के चुनावों में हार के बाद पंजाब विधानसभा में विपक्ष के नेता भी रहे हैं. प्रकाश सिंह बादल पंजाब की राजनीति में ही सक्रिय रहे, हालांकि 1977 में मोरारजी देसाई की सरकार में वो केंद्र में भी कुछ समय के लिए मंत्री रहे हैं.

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First published: March 11, 2017, 12:45 PM IST
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