पंजाब: कैप्टन बनाम कप्तान की लड़ाई में सिद्धू को बढ़त, मौका भुनाने में जुटे AAP और अकाली

पिछले काफी समय से पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू में विवाद चल रहा है. (फाइल फोटो)

Navjot Singh Sidhu Vs Amarinder Singh: कैप्टन खेमे में सबसे असंतोष की बात ये है कि सिद्धू ने अपनी इच्छा पूरी करने के लिए प्रियंका गांधी वाड्रा तक अपनी पहुंच का इस्तेमाल किया. साथ ही तीन महीने पहले तक आगामी विधानसभा चुनाव में आसान दिख रही जीत अब हाई कमान के हस्तक्षेप के बाद गड़बड़ा रही है.

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नई दिल्ली. पंजाब में कैप्टन बनाम कप्तान की जंग में नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) हावी नजर आ रहे हैं. मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह (Amarinder Singh) की इच्छा के खिलाफ कांग्रेस आलाकमान ने सिद्धू को पंजाब कांग्रेस का अध्यक्ष नियुक्त किया है. पूर्व क्रिकेटर को पंजाब कांग्रेस का कप्तान बनाए जाने के बाद 2022 में होने वाले त्रिकोणीय राज्य विधानसभा चुनाव की गर्मी और बढ़ने वाली है. सिद्धू की नियुक्ति को पंजाब कांग्रेस (Punjab Congress) में एक फ्रेश चेहरे को आगे करके कैप्टन की अगुवाई वाली राज्य सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर को कुंद करना है. साथ ही जीवन के आठवें दशक में पहुंचे कैप्टन के बाद पीढ़ीगत बदलाव की दिशा में बढ़ने का एक प्रयास भी है. बता दें कि कैप्टन अमरिंदर सिंह देश के सभी मुख्यमंत्रियों में सबसे बुजुर्ग हैं. इसके अलावा पार्टी हाईकमान ने सिद्धू प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त करके पार्टी पर अपनी पकड़ को भी स्पष्ट कर दिया है. बावजूद इसके कैप्टन ने सिद्धू को रोकने के लिए लगातार अपनी चालें चलीं और चुनाव बाद कांग्रेस की जीत की स्थिति में सिद्धू को सीएम बनने से रोकने से भी वे पीछे नहीं हटेंगे.

कांग्रेस बनाम कांग्रेस
दूसरी ओर जिस तरह पार्टी में जारी विरोधाभासों के बीच सिद्धू को पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष नियुक्त किया गया है, इससे साफ है कि पंजाब में भी अब कांग्रेस बनाम कांग्रेस की स्थिति बन गई है. मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने साफ कह दिया है कि वे सिद्धू द्वारा अपने ट्वीट और मीडिया इंटरव्यूज में मुख्यमंत्री के खिलाफ दिए गए बयानों के लिए सार्वजनिक तौर पर माफी मांगने के बाद ही मिलेंगे. सिद्धू को पार्टी की ओर पंजाब कांग्रेस की कमान दिए जाने के खिलाफ मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने सोनिया गांधी को पत्र लिखा और फोन किया, लेकिन इनका कोई असर नहीं हुआ. आने वाले दिनों में कैप्टन और सिद्धू चुनावी सभाओं में एक मंच पर दिख सकते हैं, फोटो के लिए एक दूसरे को पंजाबी झप्पी दे सकते हैं, लेकिन उनके बीच पैदा हुई अविश्वास की स्थिति और टिकट बंटवारे को लेकर खींचतान से इनकार नहीं किया जा सकता.

कैप्टन खेमे में सबसे असंतोष की बात ये है कि सिद्धू ने अपनी इच्छा पूरी करने के लिए प्रियंका गांधी वाड्रा तक अपनी पहुंच का इस्तेमाल किया. साथ ही तीन महीने पहले तक आगामी विधानसभा चुनाव में आसान दिख रही जीत अब हाई कमान के हस्तक्षेप के बाद गड़बड़ा रही है. सिद्धू के मामले में प्रियंका गांधी ने राहुल गांधी और सोनिया गांधी को समझाया कि पंजाब में पार्टी को जीत तभी मिलेगी, जब सिद्धू को बड़ा पद मिलेगा, अन्यथा सत्ता विरोधी लहर पार्टी की नैया डुबो देगी. पंजाब में कांग्रेस ने वह किया है, जो उसने मध्य प्रदेश में ज्योतिरादित्य सिंधिया और राजस्थान में सचिन पायलट को नहीं दिया- शीर्ष पदों पर युवाओं को जगह देना.

सिद्धू की नियुक्ति के साथ कांग्रेस हाईकमान ने यह भी संदेश दे दिया है कि उसका फैसला सबसे महत्वपूर्ण है. कैप्टन के हाथों में अभी भी चुनाव प्रचार समिति के मुखिया की जिम्मेदारी है, जबकि राज्य सभा सांसद प्रताप सिंह बाजवा को कांग्रेस की मेनिफेस्टो कमिटी का प्रभार मिल सकता है. लेकिन, पार्टी में दो शक्ति केंद्र, एक सरकार में और दूसरा पार्टी संगठन में बनने से स्पष्ट है कि दोनों गुट साथ काम करने के बजाय अलग-अलग काम करेंगे और सबसे बड़ा मुद्दा ये होगा कि अगर कांग्रेस को पंजाब में जीत मिलती है, तो अगला मुख्यमंत्री कौन होगा. सिद्धू की चुनावी अपील और प्रशासनिक क्षमता से कैप्टन कोई खासे प्रभावित नहीं दिखते और उनका मानना है कि सिद्धू के पास अपना कोई वास्तविक आधार बेस भी नहीं है, उन्हें अविश्वसनीय मानते हैं.

हालांकि सिद्धू ने पंजाब के विधायकों, मंत्रियों और पूर्व पंजाब कांग्रेस प्रमुख से मुलाकात करके अपने आलोचकों को जवाब देने की कोशिश की है, वे एक दूसरे को साथ लेकर चलने वाले हैं. दूसरी ओर बदलाव की हवा और भविष्य को देखते हुए पंजाब में कांग्रेस के बहुत सारे मंत्री और विधायक सिद्धू के साथ हो लिए हैं. सिद्धू समर्थक एक विधायक ने कहा, "उनका कैंपेन हाई वोल्टेज होगा. बादल परिवार पर सिद्धू जैसा हमला कोई नहीं कर सकता. उन्होंने कहा कि अमृतसर और स्वर्ण मंदिर के दौरे के बाद सिद्धू के कैंपन से कांग्रेस काडर में भी जोश आएगा और विधानसभा चुनाव के लिए टोन भी सेट होगा.''

सुखबीर की अगुवाई में SAD की नई रणनीति
पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद पर सिद्धू की नियुक्ति से विधानसभा चुनाव में पूर्व क्रिकेटर (57) और सुखबीर बादल (59) के बीच सीधी लड़ाई देखने को मिलेगी. अकाली दल ने सुखबीर सिंह बादल को अपना मुख्यमंत्री पद का चेहरा प्रोजेक्ट किया है. अकाली दल ने विधानसभा चुनाव के लिए बसपा के साथ गठबंधन किया है और दोआब क्षेत्र में दोनों दलों का गठबंधन कांग्रेस को कड़ी टक्कर दे सकता है. लेकिन, अकाली दल को इसके लिए नए एजेंडा और अपनी स्थिति में बड़ा बदलाव करना होगा, क्योंकि 2017 के चुनाव में पार्टी को बहुत बड़ी सत्ता विरोधी लहर का सामना करना पड़ा था. पंजाब में अकाली दल की छवि भ्रष्ट, अपने व्यापार को बढ़ाने वाले और विशेषाधिकार वाले लोगों की पार्टी की बन गई है.

बादल परिवार को 2017 के चुनाव में बेदअबी मामले के चलते जनता के गुस्से का सामना करना पड़ा. साथ ही ड्रग का मुद्दा भी अकाली दल के खिलाफ गया. सिद्धू का पंजाब कांग्रेस की कमान मिलने के बाद ये मुद्दे एक बार हवा में रहेंगे और इन दोनों मुद्दों पर जनता के बीच जाने के लिए अकाली दल को अपनी रणनीति में बदलाव करना होगा. आने वाले दिनों में बादल पिता-पुत्र को एसआईटी गिरफ्तार भी कर सकती है, क्योंकि दोनों से पूछताछ चल रही है. हालांकि बादल पिता-पुत्र की गिरफ्तारी से अकाली दल को फायदा भी हो सकता है और जनता की सहानुभूति उनके साथ हो सकती है, जिससे अकाली दल का संगठन एकजुट हो सकता है. अकाली दल के लिए पंजाब में बिजली संकट भी ऐसे समय आया है, जो उसकी परेशानी को बढ़ा सकता है, क्योंकि 2017 के चुनाव में जाते वक्त अकाली दल ने दावा किया था कि राज्य में बिजली का संकट नहीं है और कोई पावर कट नहीं होता है. लेकिन, पांच साल बाद अकाली दल द्वारा बिजली खरीद के लिए प्राइवेट कंपनियों के साथ किया गया समझौता अब भी एक बड़ा मुद्दा है.

AAP के लिए मौका!
कांग्रेस में भीतरी घमासान और अकाली दल को लेकर जनता के बीच फैली नकारात्मकता के बीच आम आदमी पार्टी अपने लिए मौका देख रही है. सियासी बिसात पर आम आदमी पार्टी ने अभी तक अपनी सभी चालें सटीक चली हैं. जैसे एसआईटी के पूर्व चीफ कुंवर प्रताप सिंह को अपने साथ लेना, सिंह के आने से अमृतसर मांझा क्षेत्र में आम आदमी पार्टी को काफी फायदा हो सकता है, क्योंकि इस बार यहां बेअदबी का मामला काफी चर्चा में है. आप ने चुनावों से पहले ये ऐलान कर दिया है कि पार्टी को जीत मिली तो पंजाब में कोई सिख ही मुख्यमंत्री होगा. कहा जा रहा है आम आदमी पार्टी पंजाब में अपनी संभावनाओं को बढ़ाने के लिए किसान नेता बलबीर सिंह राजेवाल के साथ भी बातचीत कर रही है. केजरीवाल ने अपने हालिया दौरे में पंजाब के लोगों को 300 यूनिट फ्री बिजली का वादा किया है और जीत की स्थिति में बिजली को लेकर हुए समझौतों को रद्द करने की भी बात कही है. लेकिन, पंजाब जीतने के लिए आम आदमी पार्टी को अभी और मेहनत करनी होगी.

आम आदमी पार्टी के सामने पंजाब में बीजेपी की भी चुनौती है, जो पंजाब में केजरीवाल एंड कंपनी को जीतने से रोकने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ेगी. अकाली दल के साथ गठबंधन टूटने और पंजाब में किसान आंदोलन के चलते बीजेपी की संभावनाएं क्षीण हो गई हैं. न्यूज18 के साथ बातचीत में अकाली दल के नेता नरेश गुजरात ने खुलासा करते हुए कहा कि 2017 के चुनाव में आम आदमी पार्टी को जीत से रोकने के लिए बीजेपी ने अपना वोट कांग्रेस को ट्रांसफर कर दिया. इसका मतलब है कि पंजाब में आम आदमी पार्टी को रोकने के लिए बीजेपी पर्दे के पीछे से किसी के साथ भी काम कर सकती है.

इन सबके बावजूद एक बड़ा सवाल ये है कि क्या कैप्टन अमरिंदर सिंह पार्टी हाईकमान की ओर से सार्वजनिक तौर पर हुई छीछालेदर के बावजूद कांग्रेस को जीत दिलाने के लिए कमर कस मैदान में उतरेंगे या फिर अपनी पार्टी बनाएंगे या किसी और के साथ हाथ मिलाएंगे. अभी तक ये असंभव दिख रहा है, लेकिन पंजाब में जो कुछ हुआ है, उसे देखते हुए सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि राजनीति असंभव को संभव बनाने का खेल है.

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