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PGI चंडीगढ़ का कमाल; भारत में पहली बार पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट के बाद महिला ने दिया बच्ची को जन्म

PGI चंडीगढ़ का कमाल; भारत में पहली बार पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट के बाद महिला ने दिया बच्ची को जन्म (Image cnva)

PGI चंडीगढ़ का कमाल; भारत में पहली बार पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट के बाद महिला ने दिया बच्ची को जन्म (Image cnva)

उत्तराखंड की 32 वर्षीय किडनी-अग्न्याशय प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ता ने बुधवार को संस्थान में एक बच्ची को जन्म दिया. दावा कि ...अधिक पढ़ें

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चंडीगढ़: पीजीआई चंडीगढ़ यानी यानी पोस्टग्रेजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ मेडिकल एंड रिसर्च (पीजीआईएमईआर) ने प्रत्यारोपण सर्जरी में एक और बड़ी उपलब्धि हासिल की है. पीजीआई में किडनी-अग्न्याशय प्रत्यारोपण करवा चुकी उत्तराखंड की 32 वर्षीय महिला ने बुधवार को संस्थान में एक बच्ची को जन्म दिया. दावा किया जा रहा है कि पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट के बाद बच्चे को जन्म देने का यह भारत का पहला मामला है. सिजेरियन ऑपरेशन के बाद महिला ने स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, रीनल ट्रांसप्लांट सर्जरी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर आशीष शर्मा ने कहा कि भारत में अब तक 150 से कम पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट यानी अग्न्याशय प्रत्यारोपण किए गए हैं और अकेले पीजीआई ने इनमें से 38 का योगदान दिया है. हमारे संस्थान में अग्न्याशय प्रत्यारोपण के बाद यह पहला प्रसव है और संभवत: भारत में यह पहला बच्चा है. हालांकि, अमेरिका में लगभग 35,000 अग्न्याशय प्रत्यारोपण (पैंक्रियाज ट्रांसप्लांट) किए जाने के साथ विश्व स्तर पर अग्न्याशय प्रत्यारोपण काफी सामान्य है. यह हमारे देश में अभी शुरू हुआ है.

वहीं, इस हाई रिस्क वाले मामले में सफल प्रसव पर खुशी जाहिर करते हुए पीजीआईएमईआर में प्रसूति प्रभारी सीमा चोपड़ा ने कहा कि मरीज की प्रेग्नेंसी कंसीव करने को लेकर सबकी अलग-अलग राय थी क्योंकि हाईपरटेंशन और किडनी की विफलता और मधुमेह के पिछले इतिहास को देखते हुए पेशेंट को एक उच्च जोखिम वाला केस माना जा रहा था. हालांकि, अंत में डॉक्टरों की टीम के परामर्श के बाद महिला ने आगे बढ़ने का फैसला किया.

उन्होंने आगे कहा कि राहत की बात यह रही कि गर्भावस्था के दौरान उसका ग्लूकोज, रक्तचाप और किडनी फंक्शन सामान्य रहा. हालांकि, हाई रिस्क की स्थिति को देखते हुए सिजेरियन से डिलीवरी कराने का निर्णय लिया गया और उसने 2.5 किलो वजन की एक बच्ची को जन्म दिया, जो असमान रूप से ठीक हो गया था.

दरअसल, नवजात बच्ची की मां 13 साल की उम्र (2005 में) से ही टाइप वन मधुमेह से पीड़ित है. जब से उसने अपना सेंस खो दिया था, तब से ही पीजीआई के इंडोक्रोनोलॉजी विभाग में उसका इलाज चला था. विभाग के हेड प्रोफेसर संजय भडाडा ने कहा कि महिला की डायबिटीज अस्थिर थी और हर दिन उसे 70 यूनिट इन्सुलिन की जरूरत होती थी. इतना ही नहीं, उसके ब्लड ग्लूकोज की भी मॉनिटरिंग करनी पड़ती थी.

Tags: Chandigarh news, Pgi

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