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Street Food ज़ायकाः बंटवारे से पहले से बेच रहे हैं लस्सी, 'पर-दादा' का ज़ायका संभाल रहे हैं अंशुमन

अमृतसरी लस्सी

अमृतसरी लस्सी

पंजाबियों की आन, बान और शान, लस्सी. जो बनती है दही, मलाई और ढेर सारे प्यार से. आज की कहानी पंजाब-पाकिस्तान बॉर्डर पर बस ...अधिक पढ़ें

    पंजाब गए और लस्सी नहीं पी तो क्या किया? कम चीनी, दही और मलाई में घुटी लस्सी, पंजाबियों की आन, बान और शान है. हर दुकान पर बड़े-से लोटे में दही उडेली होती है. फेटकर, बादाम, पिस्ता और काजू से सजाकर इसे परोसा जाता है. पंजाब की लस्सी का ज़ायका ही अलग होता है. आज मिलते हैं अंशुमन लस्सी वाला’ से जो इस कारोबार में तीसरी पीढ़ी हैं.

    इनकी कहानी शुरू हुई पंजाब-पाकिस्तान बॉर्डर पर बसे छोटे से शहर गुजरांवाला से. लस्सी और दूध की फ्लेवर्ड बोतल बेचने का काम बंटवारे से पहले का है. जिसे स्व. राधेशाम चावला ने शुरू किया था. बंटवारे के बाद पाकिस्तान छोड़कर अमृतसर आ बसे. साल था 1947-48. यहां एक साल गुजारा. जिसमें लस्सी और दूध की बोतले ही बेची.



    साल 1949 में राधेश्याम अमृतसर छोड़कर, दिल्ली आए. यहां साइकिल पर दुकान लगाकर काम किया. साइकिल की पिछली सीट पर काला संदूक बांधे, उसमें बर्फ, दूध की बोतल और ठंडी लस्सी बांधकर सड़क पर बेचने निकलते. जब साइकिल न होती तो सिर पर बोझा ढोते.

    थोड़े समय बाद पिताजी स्व. सुरेंद्र चावला भी यही काम करने लगे. चांदनी चौक, फतेहपूरी में दुकान किराए पर ली. दूध की बोतल और लस्सी के अलावा पनीर भी बेचा. साल 1971 में दुकान खरीदी. तब तक दादाजी गुज़र चुके थे. पिताजी ने लस्सी पर फोकस किया. तब दो तरह की लस्सी बेचते थे. मलाई और नमकीन.



    मैं 12वीं क्लास में था, पिताजी गुज़र गए. साल 2000 में मैंने, अंशुमन चावला ने लस्सी का काम शुरू किया. 16 साल की उम्र में दुकान के साथ दिल्ली विश्वविद्यालय से बी.कॉम किया. बाद में मार्केटिंग की पढ़ाई इलाहाबाद विश्वविद्यालय से मन लगाकर की. आज 2018 में हम दो नहीं, छह तरह की लस्सी बेचते हैं.

    क्यों है अमृतसरी लस्सी वाला खास
    अंशुमन ने बताया कि “लस्सी में बाहर की बर्फ का इस्तेमाल नहीं करते. न ही बिना फिल्टर का पानी मिलाते. आर.ओ प्लांट लगा है. पानी मिलाने की जरूरत लगे तो वही इस्तेमाल करते हैं. लस्सी बनाकर फ्रिज में ठंडी होने के लिए रखते हैं. फ्लेवर्ड लस्सी की बात करें, तो इसमें असली केसर, पिस्ता, बादाम मिलाए जाते हैं. किसी भी तरह का कलर या स्वाद मिक्स नहीं किया जाता. कोशिश रहती है कि अच्छी से अच्छी चीज लोगों को परोस सकें.”



    दादाजी ने जो शुरुआत की थी, उसे आज मैं देख रहा हूं. इसे बेहद पसंद करता हूं और ये कारोबार मेरे दिल के बहुत करीब है. इससे उनकी याद मेरे साथ जुड़ी है.

    लस्सी के रेट
    चार तरह की लस्सी- 50 रुपये में
    दो तरह की लस्सी- 60 रुपये में

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    Tags: Curd, Food business, Food diet, Health Explainer, Health News, Healthy Foods, Nutritious Foods, Street Food, Weight Loss

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