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पंजाब में सिद्धू के कांग्रेस चीफ बनने की खबरों पर कैप्टन अमरिंदर सिंह खेमे में क्यों मची है हलचल, समझिए

पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच तनाव चल रहा है.

पंजाब में मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच तनाव चल रहा है.

Punjab Politics: सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह के मीडिया सलाहकार ने गुरुवार को कहा था कि कैप्टन 2022 विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को 2017 चुनाव की तरह ही जीत दिलाएंगे. 79 वर्षीय कैप्टन भी हथियार डालने के मूड में नहीं हैं.

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नई दिल्ली. पंजाब कांग्रेस अध्यक्ष पद पर नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) की संभावित नियुक्ति का मतलब ये हो सकता है कि अगर 2022 में कांग्रेस राज्य में जीतती है और अधिकांश विधायक उनका समर्थन करते हैं तो वह कैप्टन अमरिंदर के उत्तराधिकारी भी हो सकते हैं. पंजाब, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में ऐसा उदाहरण देखने को मिल चुका है. हालांकि, यह इतना आसान भी नहीं लगता है क्योंकि सीएम कैप्टन अमरिंदर सिंह के मीडिया सलाहकार ने गुरुवार को कहा था कि कैप्टन 2022 विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को 2017 चुनाव की तरह ही जीत दिलाएंगे. 79 वर्षीय कैप्टन भी हथियार डालने के मूड में नहीं हैं.

इस बीच, कांग्रेस भी कैप्टन को सीएम पद का चेहरा घोषित नहीं करना चाह रही है. अगर पार्टी जीतती है तो यह चुनावों के बाद तय किया जाएगा. हालांकि, कांग्रेस आलाकमान को सिद्धू के रूप में एक 'भविष्य' दिख रहा है. कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने न्यूज18 को बताया कि 2017 में कैप्टन ने कहा था कि यह उनका अंतिम चुनाव है, लेकिन एक साल पहले वह अपनी बात से पलट गए और कहा कि वह 2022 में भी इस पद के दावेदार हैं. उधर, कैप्टन सिद्धू के राज्य कांग्रेस चीफ बनाए जाने का विरोध कर रहे हैं. दरअसल, इसके पीछे इतिहास जुड़ा है.

टिकट बंटवारे में पार्टी चीफ की अहम भूमिका
हाल के दिनों में कांग्रेस में ऐसा उदाहरण देखने को मिला है कि जिसे भी कांग्रेस चीफ बनाया गया अगर उसे जीते हुए विधायकों का समर्थन मिलता है तो वह सीएम बना है. कांग्रेस चीफ बनने के बाद टिकटों के बंटवारे में उसकी भूमिका काफी अहम होती है. दरअसल, 2017 विधानसभा चुनाव के पहले भी ऐसी ही स्थिति देखने को मिली थी. कैप्टन अमरिंदर सिंह ने पार्टी आलाकमान को प्रताप सिंह बाजवा की जगह उन्हें पंजाब कांग्रेस चीफ बनाने को मजबूर किया. बाद में कैप्टन को चीफ बनाया गया और राहुल गांधी ने बाद में उन्हें चुनाव से ठीक पहले पार्टी का सीएम चेहरा घोषित कर दिया.

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2019 में कमलनाथ और भूपेश बघेल क्रमश: मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ के कांग्रेस चीफ थे, उसी दौरान इन राज्यों में चुनाव हुए और कांग्रेस की जीत के बाद दोनों नेता अपने-अपने राज्य के सीएम बने. कमलनाथ को भी राज्य विधानसभा चुनाव के ठीक पहले अरुण यादव की जगह कांग्रेस का चीफ नियुक्त किया गया था. ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी राज्य कांग्रेस चीफ बनने की कोशिश की थी, लेकिन पार्टी ने कमलनाथ को इस पद के लिए चुना. इसके बाद कमलनाथ को अधिकांश विधायकों का समर्थन भी मिला, वह मध्य प्रदेश के सीएम भी बने. कमलनाथ बाद में भी सीएम के साथ-साथ एमपी कांग्रेस चीफ बने रहे और इसी के कारण सिंधिया को कांग्रेस छोड़ना पड़ा. इसी तरह भूपेश बघेल ने भी सीएम की कुर्सी अपनी तरफ की और टीएस सिंह देव को मौका नहीं मिला. दरअसल, बघेल राज्य के पार्टी चीफ थे और अधिकांश विधायकों का समर्थन उन्हें मिला.

राजस्थान के अलावा तीन राज्यों में ही हुआ 
केवल राजस्थान में ही ऐसा नहीं हुआ. जहां राज्य कांग्रेस चीफ सचिन पायलट की जगह अशोक गहलोत को सीएम बनाया गया. पायलट ने पंजाब, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ का उदाहरण देते हुए पार्टी हाईकमान से उन्हें सीएम बनाने की मांग की, लेकिन आलाकमान ने उनकी मांग नहीं मानी और उन्हें डिप्टी सीएम का पद दिया. बाद में गहलोत ने पायलट को डिप्टी सीएम और राजस्थान कांग्रेस चीफ के पद से भी बेदखल कर दिया.

इन उदाहरणों के कारण ही पंजाब में कैप्टन अमरिंदर हथियार डालने को तैयार नहीं है. दोनों नेता इस बात के लिए पूरा जोर लगा रहे हैं कि उनके समर्थकों को ज्यादा से ज्यादा टिकट मिले ताकि पार्टी की जीत की स्थिति में उनके समर्थकों की संख्या ज्यादा हो और उन्हें सीएम का पद नसीब हो. इस बीच, पार्टी ये चाहती है कि दोनों नेता मिलकर काम करें और पंजाब में जीत दर्ज करें.

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