तो क्या इस संस्था का पद भी जाएगा कांग्रेस के हाथ से?
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तो क्या इस संस्था का पद भी जाएगा कांग्रेस के हाथ से?
जलियांवाला बाग ट्रस्ट में बदलाव

जालियांवाला बाग ट्रस्ट के ट्रस्टियों की सूची से जल्द ही कांग्रेस अध्यक्ष बाहर हो सकते हैं. केंद्र सरकार ने सोमवार को जालियांवाला बाग ट्रस्ट राष्ट्रीय स्मारक संशोधन बिल लोकसभा में पेश किया.

  • Last Updated: July 9, 2019, 1:01 PM IST
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जालियांवाला बाग ट्रस्ट के ट्रस्टियों की सूची से जल्द ही कांग्रेस अध्यक्ष बाहर हो सकते हैं. केंद्र सरकार ने सोमवार को जालियांवाला बाग ट्रस्ट राष्ट्रीय स्मारक संशोधन बिल लोकसभा में पेश किया. अब तक के नियम के मुताबिक जो भी कांग्रेस अध्यक्ष होता है, वो अपने-आप इस ट्रस्ट के ट्रस्टियों में शुमार हो जाता है. लेकिन सरकार अब इस नियम में बदलाव करना चाहती है. सरकार का कहना है कि पिछले चालीस-पचास सालों में कांग्रेस पार्टी ने इस राष्ट्रीय स्मारक के लिए कुछ नहीं किया. इस साल जालियांवाला बाग गोलीकांड के सौ साल पूरे हो रहे हैं.

क्या बदलाव चाहती है सरकार?
सोमवार को केंद्र सरकार ने लोकसभा में जालियांवाला बाग राष्ट्रीय स्मारक (संशोधन) विधेयक पेश किया. सरकार चाहती है कि जो भी कांग्रेस अध्यक्ष हो, उसके स्वत: ट्रस्टी बनने के नियम को बदला जाए. इस ट्रस्ट के ट्रस्टियों में चैयरमेन के रूप में प्रधानमंत्री होते हैं. उनके अलावा संस्कृति मंत्रालय के मंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता, पंजाब के राज्यपाल, पंजाब के मुख्यमंत्री के अलावा जो भी कांग्रेस अध्यक्ष हो, वो सभी सदस्य रहते हैं. साथ ही तीन लोगों को ट्रस्टी के रूप में केंद्र सरकार नामांकित करती है. यदि ये बिल पास हो जाता है तो कांग्रेस अध्यक्ष अपने आप इस ट्रस्ट के ट्रस्टी नहीं हो सकेंगे.

Jaliawala bagh golikand के सौ साल पूरे
जलियांवाला बाग गोलीकांड के सौ साल पूरे




'ऐतिहासिक ट्रस्ट के इतिहास से खिलवाड़ की कोशिश'


लोकसभा में ये बिल पेश होते ही कांग्रेस की ओर से सांसद शशि थरूर ने इसका जोरदार विरोध किया. उन्होंने कहा कि इस ट्रस्ट के साथ देश की सबसे पुरानी पार्टी होने के नाते कांग्रेस का गहरा संबंध है. सरकार कांग्रेस अध्यक्ष को ट्रस्टियों में से हटाकर ट्रस्ट के इतिहास के साथ खिलवाड़ करने का कोशिश कर रही है.

'राष्ट्र की गरिमा का विषय, इस पर राजनीति नहीं' 
संस्कृति और पर्यटन मंत्री प्रह्लाद सिंह पटेल ने जोरदार जवाब देते हुए कहा कि कांग्रेस ने पिछले चालीस-पचास सालों में इस स्मारक के लिए कुछ नहीं किया. जब बिल पर बहस शुरू होगी, तो वो विस्तार में तथ्यों को सामने रखेंगे. पटेल का कहना है कि ये राष्ट्र की गरिमा का विषय है और इसमें राजनीति नहीं होनी चाहिए.

राज्यसभा में पास नहीं हो पाया था बिल
दरअसल मोदी सरकार ने अपने पहले कार्यकाल में भी इस बिल को पास करवाने की कोशिश की थी. इस साल फरवरी में मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सरकार ने लोकसभा से इस बिल को पास भी करवा लिया था. लेकिन राज्यसभा में विपक्ष खासतौर से कांग्रेस के कड़े विरोध के बाद सरकार इसे पारित नहीं करवा पाई थी. जिसके बाद सरकार का कार्यकाल समाप्त हो गया था.

जलियांवाला बाग गोलीकांड के सौ साल पूरे
साल 1919 में 13 अप्रैल को बैसाखी के दिन अमृतसर के स्वर्ण मंदिर के पास जालियांवाला बाग में बड़ी सभा हो रही थी. अंग्रेजों के रौलेट एक्ट का विरोध करने के लिए हजारों लोग इस सभा में इकट्ठा हुए थे. जनरल डायर नाम के अंग्रेज अधिकारी ने सभा में उपस्थित लोगों पर गोलियां चलवा दी थीं, जिसमें सैकड़ों लोग शहीद हुए और बड़ी संख्या में लोग घायल हुए थे. इस घटना को भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे जघन्य हत्याकांड के रूप में जाना जाता है.

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