OPINION: कृषि कर्ज और पराली जलाने के मुद्दे पर अटके पंजाब में लाया गया किसान बिल महज दिखावा है

खेतों में पराली जलाने के कारण को दिल्ली में वायु प्रदूषण के कारणों में से एक माना गया.  (फाइल फोटो)
खेतों में पराली जलाने के कारण को दिल्ली में वायु प्रदूषण के कारणों में से एक माना गया. (फाइल फोटो)

धान की कटाई के बाद खेतों में बची पराली आकार में छोटी है, लेकिन पंजाब में यह समस्या बहुत बड़ी है. यहां अभी तक किसानों को इससे निपटने का कोई तरीका नहीं मिल पाया है. दिल्ली की हवा बिगाड़ने वाली पंजाब की पराली के आगे सरकार भी कुछ बड़ा कदम नहीं उठा रही है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 22, 2020, 2:47 PM IST
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भावदीप कंग
चंडीगढ़. पंजाब (Punjab) के किसान संसद के मानसून सत्र (Monsoon Session) में पास हुए तीन कृषि विधेयकों-2020 (Farm Act-2020) पर खुद को ठगा महसूस कर रहे हैं. इसलिए इन विधयकों के खिलाफ पंजाब में सबसे ज्यादा विरोध भी देखा गया था. इन बिलों के पास होने पर भी बड़ा सवाल यह है कि पंजाब में धान के खेतों की कटाई के बाद बची पराली को ठिकाने लगाने का क्या सामाधान है? पराली को जलाने पर वातारण को बड़े स्तर पर नुकसान पहुंचता है. पंजाब सरकार (Punjab Government) भी राजनीतिक मजबूरियों के कारण इस ओर कोई कदम नहीं उठाती दिख रही है. ऐसे में पंजाब पर बड़े आर्थिक संकट की ओर खुद को धकेलता दिख रहा है.

किसानों को मजबूरन जलानी पड़ती है पराली
पंजाब में हर साल बड़े पैमाने पर धान की पराली को जलाया (Stubble Burning) जाता है. जिससे इसके आस-पास के राज्यों में विशेषकर राजधानी दिल्ली में स्मॉग (Smog) तेजी से फैलता है. लेकिन किसानों के पास उच्च तकनीकी की मशीन न होने के चलते इन्हें मजबूरन जलाना पड़ता है. क्योंकि पराली को ठिकाने लगाने के लिए महंगी लेबर और मशीन का खर्चा अधिक होता है.
बुआई के लिए 'हैप्पी सीडर' मशीन सही नहीं
हालांकि सरकार ने तकनीकी नजरिया अपनाते हुए किसानों को सब्सिडी वाली मशीन प्रदान करने की मांग की है, जिसका नाम 'हैप्पी सीडर' है. लेकिन किसान इस प्रकिया से गेहूं और धान की क्वालिटी में कमी आने की शिकायत कर रहे हैं. ऐसे में किसानों के लिए हार्वेस्टर-माउंटेड सुपर स्ट्रॉ मैनेजमेंट सिस्टम (Harvester-Mounted super straw management system) एक बेहतर विकल्प होगा.



पराली से बना सकते हैं खाद
देखा जाए तो किसान पराली का उपयोग खाद बनाने के लिए कर सकते हैं. क्योंकि फसल की पैदावार बढ़ाने और इसके खर्च में कमी लाने के लिए कंपोस्ट की गई पराली को खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है. लेकिन इस प्रकिया में कई हफ्तों का समय लगेगा साथ प्रति एक एकड़ खेत में 300 रुपये का खर्चा भी आएगा.

पंजाब सरकार पर पड़ता है बोझ
पंजाब सरकार को पराली जलाने के चलते अदालतों और पर्यावरण एजेंसियों के दबाव में क्रेंद सरकार को बड़ा धन देना पड़ता है. अब ऐसे में सीएम ने सरकार के सामने अपनी मांग दोहराई है. बता दें कि पिछले साल किसानों को धान की पराली पर 1,000 रुपये प्रति टन मुआवजा दिया गया था. पंजाब ने केंद्र से बायोमास बिजली संयंत्रों के लिए पैसा देने के लिए भी कहा है. इसका मतलब बिजली सब्सिडी पर ध्यान देना है जो वर्तमान में 16,400 करोड़ रुपये है.

धान की बुआई के लिए पानी की ज्यादा जरुरत
बिजली सब्सिडी किसानों को ज्यादा से ज्यादा धान की पैदावार करने के लिए प्रोत्साहित करती है. क्योंकि धान की बुआई के लिए पानी की मात्रा ज्यादा चाहिए होती है. ऐसे में किसान ट्यूबवेल चलाने के लिए सरकार की बिजली सब्सिडी पर निर्भर हैं. किसानों को बिजली पर जितनी ज्यादा सब्सिडी मिलेगी किसान धान की बुआई के लिए ज्यादा से ज्यादा पानी का इस्तेमाल करेंगे.

पंजाब सरकार मजबूर
वहीं, राज्य सरकार की राजनीतिक मजबूरियां बिजली सब्सिडी को वापस लेने से रोकती हैं और इस कारण खेतों में बड़ी मात्रा में धान अधिक पैदावार से बड़ी मात्रा में पराली इकट्ठी होती चली जाती है. किसानों के पास उस जलाने के अलावा कोई आखिरी चारा नहीं होता है. ऐसे में पराली का धुआं हर साल दिल्ली का दम (Delhi Air Pollution) घोंटता है.

ये हैं किसानों की समस्याएं
पंजाब सरकार ने इसे समाहित करने के लिए कई तरह के हतोत्साहन और प्रोत्साहन की भी घोषणा की है, लेकिन माजा जैसे दूर-दराज क्षेत्रों में सरकार का यह कदम विफल रहा है. किसानों ने कई समस्याओं का हवाला दिया है, जैसे कि कोविड-19 वजह से देरी से फसल काटने पर लेबर उपलब्ध नहीं हुए, खेतों में कीट के संक्रमण का डर और पराली को ठिकाने लगाने के लिए मिलने वाला मुआवजा कम बताया है.

धान की खेती से बच रहे हैं किसान
बता दें कि फसल काटने के तरीकों में एक लंबे समय के उचित समाधान की जरूरत है. क्योंकि धान की फसल में अधिक पानी की जरूरत के चलते और कम बिजली सब्सिडी के कारण किसान अब कम पानी वाली फसलों जैसे मक्का और कपास, दलहन और तिलहन की खेती करने की ओर रुख कर रहे हैं. राज्य सरकार को किसानों की मदद के लिए केंद्र के साथ काम करना चाहिए.
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