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पंजाब के पूर्व कृषि मंत्री तोता सिंह का लंबी बीमारी के बाद निधन, निमोनिया से थे पीड़ित

पंजाब के पूर्व कृषि मंत्री तोता सिंह (फाइल फोटो)

पंजाब के पूर्व कृषि मंत्री तोता सिंह (फाइल फोटो)

पंजाब के पूर्व कृषि मंत्री तोता सिंह का लंबी बीमारी के बाद निधन हो गया. वह एसजीपीसी के वर्तमान सदस्य थे. वह निमोनिया से पीड़ित थे. एक चिकित्सा विशेषज्ञ की देखरेख में उनका इलाज चल रहा था.

(एस. सिंह)

चंडीगढ़. पंजाब के पूर्व कृषि मंत्री तोता सिंह का लंबी बीमारी के बाद शनिवार को चंडीगढ़ के सेक्टर 18 स्थित उनके आवास पर निधन हो गया. पूर्व कृषि मंत्री एसजीपीसी (सिख गुरुद्वारा प्रबंधन कमिटी) के वर्तमान सदस्य थे. वह निमोनिया से पीड़ित थे, जिससे उनके फेफड़े संक्रमित हो गए थे. उनका पिछले कुछ महीनों से एक चिकित्सा विशेषज्ञ की देखरेख में इलाज चल रहा था.

तोता सिंह ने अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत 1960 के दशक में अपने पैतृक गांव दीदारे वाला के सरपंच बनने के साथ की थी. उनका गांव मोगा जिले के निहालसिंहवाला विधानसभा क्षेत्र में आता है. 1969 में वे राज्य के सबसे बड़े जिले फिरोजपुर में अकाली दल के जिलाध्यक्ष चुने गए थे. फरीदकोट, मुक्तसर, फाजिल्का और मोगा इस सीमावर्ती जिले का हिस्सा हुआ करते थे.

पार्टी के प्रमुख पदों पर रहे
1970 में उन्हें ब्लॉक समिति के सदस्य के रूप में चुना गया था. 1970 के दशक में जब फरीदकोट को फिरोजपुर जिले से अलग किया गया था, तब तोता सिंह पार्टी के जिलाध्यक्ष चुने गए थे और 17 साल तक इस पार्टी के पद पर रहे. 1978 में उन्हें पार्टी की केंद्रीय कार्य समिति के सदस्य के रूप में नामित किया गया था और तब से वे पार्टी के प्रमुख पदों पर रहे.

एसजीपीसी में अहम भूमिका
1979 में उन्हें SGPC के सदस्य के रूप में चुना गया. उन्हें इस धार्मिक निकाय की शिक्षा समिति का वरिष्ठ उपाध्यक्ष और प्रमुख बनाया गया था. वे इस पद पर 1996 तक 17 वर्षों तक रहे. इस बीच जब सुरजीत सिंह बरनाला 1985 में मुख्यमंत्री बने, तो उन्हें पंजाब मंडी बोर्ड का अध्यक्ष मनोनीत किया गया. 1989 में जब बरनाला को तमिलनाडु के राज्यपाल के रूप में नामित किया गया था, तो तोता सिंह को दो साल से अधिक समय तक राज्य में पार्टी की कमान सौंपी गई थी.

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 चुनावों का किया था का बहिष्कार
1992 में अकाली दल ने जब विधानसभा चुनावों का बहिष्कार किया, तो तोता सिंह उन प्रमुख व्यक्ति में से थे जिन्होंने प्रकाश सिंह बादल को चुनावों का बहिष्कार करने के लिए प्रेरित किया. उन दिनों उग्रवाद अपने चरम पर था. वह 1997 में मोगा विधानसभा क्षेत्र से पहली बार विधायक चुने गए थे, उन्हें कैबिनेट में भी शामिल किया गया था. वह राज्य के शिक्षा मंत्री बने थे.

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