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Punjab Ground Report: अकाली से आहत, कांग्रेस से निराश- पंजाब में दिख रही बदलाव की आहट, लेकिन किसे होगा लाभ

सीएम चरणजीत सिंह चन्नी और कांग्रेस की पंजाब इकाई के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू  (Photo by NARINDER NANU / AFP)

सीएम चरणजीत सिंह चन्नी और कांग्रेस की पंजाब इकाई के अध्यक्ष नवजोत सिंह सिद्धू (Photo by NARINDER NANU / AFP)

Punjab Assembly Election 2022: पंजाब में करीब चार दिनों तक 1200 किलोमीटर का सफर करने के दौरान एक बात स्पष्ट हो गई कि यहां के लोग 'कम बुरे' को चुनने के संघर्ष से दो-चार हो रहे हैं. हालांकि राजनीति में चार महीने का वक्त काफी लंबा होता है और कोई नहीं जानता की फरवरी तक राजनीतिक स्थिति क्या होगी.

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चंडीगढ़. पंजाब (Punjab) में करीब चार दिनों तक 1200 किलोमीटर का सफर करने के दौरान कम से कम 150 लोगों से बातचीत में एक बात स्पष्ट हो गई कि लोग मौजूदा सरकार से नाराज हैं और बदलाव चाहते हैं. इस बीच अहम सवाल यह है कि आगामी चार महीने बाद होने वाले विधानसभा चुनाव (Punjab Assembly Elections) में यह नाराजगी कौन भुना पाएगा? किसान भाजपा (BJP) और अकाली दल (Akali Dal) के खिलाफ हैं. स्थानीय लोग अभी भी साल 2007 से 2017 तक 10 साल के अकाली शासन में व्याप्त भ्रष्टाचार और नशीले पदार्थों के व्यापार की शिकायत करते हैं. बहुत से लोग कहते हैं कि कांग्रेस (Congress) ‘हर जगह’ है और कैप्टन अमरिंदर सिंह ने साढ़े चार साल थोड़ा बहुत ठीक किया. कुछ लोग नवजोत सिंह सिद्धू (Navjot Singh Sidhu) को भी पसंद नहीं कर रहे हैं. उन्हें ‘सीएम मटेरियल’ से ज्यादा धमाका बताया. वहीं जनता पर अभी सीएम चरणजीत चन्नी का कोई खास असर नहीं हुआ है.

अमृतसर में स्वर्ण मंदिर के पास एक बुजुर्ग दुकानदार सुखविंदर सिंह ने कहा, ‘एकमात्र पार्टी जिसके खिलाफ जनता के बीच कोई बड़ा गुस्सा नहीं है, वह है आम आदमी पार्टी (AAP),  लेकिन यह कोई नहीं जानता कि उनका सीएम चेहरा कौन है. इसके बिना यह कहना मुश्किल है कि उनका क्या असर होगा.’ इसी राजनीतिक चर्चा में उनके कुछ ग्राहकों ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हुए कहा कि AAP ने पिछले विधानसभा चुनावों में मौका गंवा दिया और अब पार्टी के लिए लोगों को इसे फिर से मौका देने के लिए मनाना मुश्किल होगा. लुधियाना की रहने वाली नवलप्रीत कौर कहती हैं, ‘पंजाबी एक बार नई चीज चुनते हैं लेकिन जरूरी नहीं कि वह दूसरी बार भी चुनें.’

इस चर्चा से लगा कि पंजाब के निराश लोग ‘कम बुरे’ को चुनने के संघर्ष से दो-चार हो रहे हैं. हालांकि राजनीति में चार महीने का वक्त लंबा समय है और कोई नहीं जानता की फरवरी तक राजनीतिक स्थिति क्या होगी.

मालवा की चुनौती
चुनावी रूप से पंजाब का मालवा क्षेत्र बहुत ही सबल है. यहां राज्य की 117 विधानसभा सीटों में 69 सीटें हैं. पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने इस क्षेत्र में अच्छी मौजूदगी दर्ज कराई थी. साथ ही AAP को भी लाभ हुआ था. संगरूर, पटियाला और मोगा में सफर के दौरान स्थानीय लोगों ने कहा कि AAP के लिए निश्चित तौर पर आशा की किरण है लेकिन कांग्रेस तस्वीर से पूरी तरह बाहर नहीं है. मालवा क्षेत्र में किसान आंदोलन बड़ा मुद्दा है लेकिन AAP द्वारा फ्री बिजली का ऐलान यहां चर्चा में है. हालांकि इलाके में अकाली दल चुनावी तस्वीर से गायब लगती है क्योंकि उसे किसानों के गुस्से का खामियाजा भुगतना पड़ रहा है. साथ ही पार्टी फरीदकोट की बेअदबी और पुलिस फायरिंग के मामलों के सवालों से भी जूझ रही है. किसानों के विरोध के कारण अकाली दल को एक अभियान यात्रा भी रद्द करनी पड़ी.

कांग्रेस ने शीर्ष पदों पर नवजोत सिंह सिद्धू के तौर पर जाट सिख और चरणजीत सिंह चन्नी (Charanjit Singh Channi) के तौर पर दलित सिख को चुनकर मालवा में अपना कार्ड खेला है. दोनों इस क्षेत्र से आते हैं.  मोरिंडा में किसानों के एक समूह ने News18 को बताया ‘सीएम के रूप में चन्नी के आने से मालवा में कांग्रेस की संभावना में सुधार होगा क्योंकि उनका प्रभाव मोरिंडा, चमकौर साहिब समेत अन्य इलाकों में है. उनकी छवि अच्छी है. लोगों ने कैप्टन को वोट नहीं दिया होगा, लेकिन चन्नी और सिद्धू को वोट दे सकते हैं.’ ऐसा लगता है कि चन्नी-सिद्धू का गठबंधन उस रणनीति पर भी काम कर रहा है कि पंजाब की सभी समस्याओं का आरोप कैप्टन अमरिंदर सिंह के सिर मढ़ दें और उनकी जगह नए सीएम और उनके काबीना को प्रचारित करें.

माझा और दोआबा के इलाके में क्या है हालात?
माझा और दोआबा के इलाके में कांग्रेस की पहले वाली सरकार की जगह ‘नई सरकार’ को प्रचारित करना मुश्किल हो सकता है. जालंधर की प्रसिद्ध ‘लवली स्वीट्स’ की दुकान पर ग्राहकों के एक समूह ने कहा, ‘सीएम भले ही बदल गए हों लेकिन पार्टी वही है, वे केवल आपस में लड़ते हैं, लोगों के लिए नहीं.’ दो नए डिप्टी सीएम दोनों माझा क्षेत्र के हैं. पवित्र शहर अमृतसर की विधानसभा सीट भी इसी क्षेत्र में है. माझा में अब तक AAP का असर मामूली है क्योंकि पार्टी के पास क्षेत्र में सांगठनिक ताकत बहुत कम है. अमृतसर (पूर्व) के विधायक होने के कारण अमृतसर में अभी भी सिद्धू को यहां काफी समर्थन मिलता है.

अमृतसर क्षेत्र के कई लोग सिद्धू को मिल रहे समर्थन पर यह सवाल भी जोड़ रहे हैं कि क्या कांग्रेस को वोट देने पर सिद्धू मुख्यमंत्री होंगे? अमृतसर और जालंधर के बीच के ग्रामीण इलाकों में थोड़ा घूमें तो यह महसूस कर सकते हैं कि लगभग हर दूसरे परिवार में नशामुक्ति या पुलिस कार्रवाई की कहानी के साथ नशीली दवाओं की समस्या अभी भी बनी हुई है. माझा क्षेत्र में इस बात को लेकर अकाली दल और कांग्रेस दोनों के खिलाफ गुस्सा है. लोगों का मानना है कि इस मामले में दोनों दल एक साथ है और बड़ी मछलियां गिरफ्त से बाहर हैं. जालंधर के एनजीओ में काम करने वाले हरमिंदर सिंह ने कहा ‘नशेड़ी मामलों में उलझ जाते हैं. बड़ी मछलियां बच जाती हैं.’

उधर, दोआबा की राजनीति में अनुसूचित जाति के मतदाताओं का दबदबा है और यहां अब अकाली दल-बसपा गठबंधन और सीएम चन्नी के नेतृत्व वाली कांग्रेस के बीच लड़ाई तेज होती दिख रही है. गुरशरण सिंह का परिवार गुरदासपुर में लंबे समय से भाजपा का वोटर रहा है. सिंह ने News18 को बताया कि वह अकाली दल को वोट देंगे. उन्होंने कहा ‘कोई भी अकाली दल का मुकाबला नहीं कर सकता. यह पंजाब की सबसे पुरानी पार्टी है.’ माना जा रहा है कि दोआबा और माझा के शहरी मतदाता जिन्होंने बीते विधानसभा चुनाव में भाजपा को वोट दिया था वो इस बार अकाली दल के पक्ष में वोट कर सकते हैं.

चार महीने का वक्त और राजनीति
बातचीत के दौरान कई लोगों ने कहा कि अगर कोई बड़ी घटनाहोती हैं तो चार महीनों में बहुत कुछ बदल सकता है. नई चन्नी सरकार के तहत बेअदबी और पुलिस फायरिंग के मामलों में बादल के खिलाफ कार्रवाई होने की उम्मीद है. यह दोधारी तलवार हो सकती है. इससे कुछ कांग्रेस मतदाता पार्टी की ओ वापस आ सकते हैं तो वहीं इससे अकाली मतदाता को मजबूत भी मिल सकती है. अगर चन्नी सरकार बिजली खरीदने से जुड़े अग्रीमेंट्स अगर रद्द कर देती है तो सस्ती बिजली का वादा भी असर कर सकता है. एसएएस नगर (मोहाली) में लोगों के एक समूह ने कहा ‘महंगी बिजली एक बहुत बड़ा चुनावी मुद्दा है. यह हर परिवार को प्रभावित करता है क्योंकि बिल बहुत आते हैं.’

लुधियाना के उद्योगपतियों ने कांग्रेस से उम्मीद छोड़ दी है. उन्होंने बताया कि कैसे उन्हें कुछ महीने पहले बिजली की कमी के बाद दुकान बंद करने के लिए मजबूर किया गया और बिजली का बिल अधिक आया. अस्थायी और संविदा कर्मचारी संघ भी नीतियों को लेकर कांग्रेस से दूर जा सकता है, इससे मतदाताओं के बड़े हिस्से पर असर पड़ रहा है. अधिकांश यूनियनों के प्रतिनिधियों ने News18 को बताया ‘हम नहीं जानते कि चन्नी सरकार चार महीनों में क्या बदल सकती है. वह बयान हदे रहे हैं लेकिन नीति में अभी तक कोई बदलाव नहीं हुआ है.’

इन सबके बीच कोई भी पार्टी पंजाब में निराशा और सत्ता विरोधी लहर को भुनाने की स्थिति में नहीं है. कांग्रेस अगले चार महीनों में एक नई शुरुआत के लिए लोगों के बीच नई सरकार को ले जा रही है. अकाली दल को लगता है कि कांग्रेस के कमजोर होने से वह वापस आ सकती है. AAP दूसरी बार लोगों के बीच लौटने की उम्मीद लगाए हुए है.

हालांकि पंजाब में अभी भी खुला खेल चल रहा है और News18 को लोगों द्वारा दी गई प्रतिक्रियाओं से ऐसा लगता है कि पांच चुनावी राज्यों में सबसे करीबी लड़ाई पंजाब में होगी.

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