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पंजाब के किसानों का कमाल! किन्‍नू से बायो एंजाइम बना कमा रहे लाभ, जानें कैसे उठाएं फायदा

पंजाब के किसानों का कमाल! किन्‍नू से बायो एंजाइम बना कमा रहे लाभ, जानें कैसे उठाएं फायदा

किसान बेकार किन्‍नू से बना रहे हैं बायो एंजाइम. (File pic)

किसान बेकार किन्‍नू से बना रहे हैं बायो एंजाइम. (File pic)

Punjab Farmers: बायो एंजाइम कार्बनिक घोल हैं, जो विभिन्न फलों, सब्जियों के छिलके और फूलों सहित जैविक कचरे के फर्मेंटेशन के माध्यम से चीनी, गुड़ और पानी में मिलाकर तैयार किए जाते हैं.

    नई दिल्‍ली. पंजाब (Punjab) में किन्नू (Kinnow) के मौसम की शुरुआत अपने साथ गिरते फल को भी लेकर आती है. इसे किसानों की ओर से पूरी तरह से बर्बाद समझा जाता है. लेकिन यह गिरा हुआ फल मिट्टी, पानी, हवा, घटते भूजल, जल प्रदूषण और पूरे पारिस्थितिकी तंत्र में सुधार के लिए वरदान जैसा भी साबित हो सकता है. इसके इस्‍तेमाल से न केवल पौधों में सुधार किया जा सकता है, बल्कि यह सब्जियों, आलू और अनाज जैसी फसलों पर फफूंदनाशकों और रासायनिक स्प्रे के अंधाधुंध इस्‍तेमाल को भी रोकने में मदद करता है. किसान इन फलों को अपने किन्नू (Kinnow) के खेतों से एकत्र करके कम लागत पर बायो एंजाइम (Bio Enzymes) तैयार कर सकते हैं. पंजाब के करीब 100 किसानों ने विशेष रूप से किन्नू क्षेत्र में इस बेकार फल किन्नू से बायो एंजाइम बनाना शुरू कर दिया है.

    बायो एंजाइम क्या होता है?
    बायो एंजाइम कार्बनिक घोल हैं, जो विभिन्न फलों, सब्जियों के छिलके और फूलों सहित जैविक कचरे के फर्मेंटेशन के माध्यम से चीनी, गुड़ और पानी में मिलाकर तैयार किए जाते हैं. जैविक कचरे को फर्मेंट करने में 60-100 दिन लगते हैं. फर्मेंटेशन को 45 से 50 दिनों में तैयार करने के लिए खमीर का इस्‍तेमाल किया जा सकता है. बायो एंजाइम का हमारे रोजाना के जीवन में भी बहुत इस्‍तेमाल होता है.

    पंजाब में बड़े पैमाने पर किन्नू की खेती
    इंडियन एक्‍सप्रेस की रिपोर्ट के अनुसार पंजाब में, होशियारपुर, अबोहर, फाजिल्का, मुक्तसर, बठिंडा इलाकों में किन्नू के बागों की लगभग 40,000 हेक्टेयर सहित लगभग 94,000 हेक्टेयर में विभिन्न फलों की फसलें हैं. यहां प्रति हेक्टेयर औसतन 25-30 टन किन्नू का उत्पादन होता है और राज्य का कुल उत्पादन लगभग 10-11 लाख टन है.

    किन्नू साल भर उगने वाली फसल है और मुख्य कटाई की अवधि नवंबर के आखिर से मार्च तक होती है, लेकिन खट्टे फल की कुछ किस्में अक्टूबर में बाजारों में आने लगती हैं. बागवानी विभाग के विशेषज्ञों का कहना है कि कुल किन्नू उत्पादन का लगभग 15-20 फीसदी यानी करीब 1.5 लाख से 2 लाख टन फल कटाई से पहले और उसके दौरान पेड़ से गिर जाता है.

    विशेषज्ञों का कहना है कि राज्य में किन्नू के किसानों के लिए गिरे हुए फल एक बड़ी चुनौती हैं, क्योंकि उन्हें जमीन में गाड़ने के लिए छोटे-छोटे गड्ढे खोदने पड़ते हैं. ऐसा न करने पर गिरे हुए फल सड़ जाते हैं और पौधों पर लगे अच्‍छे फलों पर मक्खी का हमला हो जाता है. लेकिन अब कुछ किसान इस बेकार किन्नू का उपयोग बायो एंजाइम बनाकर अपनी जमीन के पीएच स्तर और मिट्टी की उर्वरता में सुधार करने के लिए कर रहे हैं.

    क्या कहते हैं किसान
    फाजिल्का जिले के अबोहर गंगानगर मार्ग पर मौजगढ़ गांव के किसान परमजीत सिंह झजरिया के पास 17 एकड़ का किन्नू का बाग है. उन्होंने पिछले मौसम और इस मौसम में गिरी हुई किन्नू से 20,000 लीटर बायो एंजाइम तैयार किए हैं. उनका कहना है, ‘मुझे अपने बाग से औसतन 1,700 क्विंटल किन्नू मिल रहा है. लगभग 20 फीसदी फसल गिर गई है, क्योंकि यह एक प्राकृतिक घटना है. चूंकि मैं एक जैविक किसान हूं, मैं अपने बगीचे के सभी गिरे फलों को इकट्ठा करता हूं जो इस्‍तेमाल के लिए उपयुक्त नहीं थे. उन्हें धोने के बाद मैंने उन्हें साफ ड्रम में डाल दिया और बायो एंजाइम बनाने के लिए बागवानी विभाग के विशेषज्ञों द्वारा दिए गए फॉर्मूले का इस्तेमाल किया.’

    उन्होंने कहा कि अब वह मिट्टी की गुणवत्‍ता में सुधार के लिए उनका उपयोग कर रहे हैं और कीटों को दूर करने के लिए किन्नू के पौधों पर छिड़काव कर रहे हैं. साइट्रस एस्टेट होशियारपुर के बागवानी विकास अधिकारी (एचडीओ) विक्रम वर्मा का कहना है कि अबोहर, फाजिल्का क्षेत्र में मिट्टी का पीएच स्तर लगभग 8.5 से 9 फीसदी है, जबकि सामान्य आवश्यकता लगभग 7 फीसदी की है.’

    परमजीत का कहना है कि हर फसल की अपनी सुगंध और रंग होता है, जो विशेष प्रकार के कीटों को आकर्षित करता है और फसल को नुकसान पहुंचाता है, लेकिन जब हम उन पर इन बायो एंजाइम का छिड़काव करते हैं तो कीट पौधे पर नहीं आते हैं.

    कैसे बनाएं बायो एंजाइम?
    परमजीत सिंह ने बताया कि उन्होंने 500 लीटर क्षमता वाले 40 प्लास्टिक ड्रम खरीदे हैं. उन्होंने प्रत्‍येक ड्रम में 99 किलो किन्नू, 33 किलो गुड़ और 330 लीटर पानी मिलाया और उसके ढक्कन को बंद कर दिया. फर्मेंटेशन प्रकिया के तहत निकलने वाली गैस को निकालने के लिए 30 दिनों तक रोजाना इनके ढक्‍कन को 30 सेकंड तक ढीला करना पड़ता है. 30 दिनों के बाद ढक्कन दो दिनों के अंतराल पर हर दो हफ्ते में उसी तरह से खोला जाता है और फिर ड्रम को एयर टाइट बंद कर दिया जाता है. इसके बाद इसे कभी कभी खोला जाता है. बायो-एंजाइम आखिरकार साढ़े तीन महीने में तैयार हो जाते हैं. उन्होंने कहा, ‘हम इसे सब्जियों पर स्प्रे और खेत की सिंचाई के साथ मिलाकर पूरे साल इस्तेमाल कर सकते हैं.’

    Tags: Farmers, Kinnow, Punjab

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