शरणार्थियों की चौथी पीढ़ी जर्जर इमारत में रहने को मजबूर, कहा- हमारी भी सुनो सरकार

70 साल से जर्जर इमारत में रह रहे हैं 80 परिवार.

देश में सीएए (CAA) के समर्थन और विरोध का सिलसिला लगातार जारी है, लेकिन विभाजन के वक्त पाकिस्तान (Pakistan) से खुशहाल जिदंगी गुजारने की उम्मीद के साथ भारत आए 80 परिवार आज भी जर्जर इमारत में रह रहे हैं.

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कोटा. देशभर में सीएए (CAA) के समर्थन और विरोध का सिलसिला लगातार जारी है, लेकिन हम आपको एक ऐसी खबर से रूबरू करा रहे हैं, जो कि शरणार्थियों के दर्द को बंया कर रही है. दरअसल, विभाजन के वक्त पाकिस्तान (Pakistan) से खुशहाल जिदंगी गुजारने की उम्मीद के साथ भारत आए थे, लेकिन 70 साल बाद भी वो बदहाल जीवन जीने को मजबूर हैं. हैरानी की बात ये है कि चार पीढ़ि‍यां गुजरने के बाद भी हालात नहीं बदले हैं. विभाजन के वक्त जिस इमारत में वह आए थे और आज भी उसी में 80 परिवार अपनी जिदंगी गुजारने को मजबूर हैं. हालांकि उस वक्‍त वह गौशाला हुआ करती थी जिसको अब कुत्ताघर भी कहा जाता है.

भारत के नागरिक भी बन गए लेकिन...
दयाबाई काफी उम्रदराज हैं और वह आज भी सपना पाले हुए हैं कि उनको और उनके परिवार के लोगों को अब कहीं कोई अच्छा सा आशियाना नसीब हो जाए तो जिदंगी का बचा हुआ वक्त सुखद होगा. हालांकि सरकारें आईं और चली भी गईं, लेकिन हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ. करीब 70 साल पहले विभाजन के वक्त भारत आया यह सिंधी और गुजराती परिवार आज भी उस जर्जर इमारत में अपनी जिदंगी गुजार रहा है, जहां उनके पुर्वजों को रखा गया था. यह पुरानी गौशाला थी जहां छोटे छोटे कमरे बनाकर इन शरणार्थियों को आसरा दिया गया था. हालांकि वक्त गुजरा, आशियाना नहीं बदला. जर्जर मकान सिर्फ सिर छिपाने के अलावा बाकी तमाम सुविधाओं से महरूम है.
योजनाएं आईं तो...
जब इन शरणार्थियों के पूर्वज भारत आए थे तब न तो नगर निगम और न ही कोटा शहर (Kota City) इतना विकसित था. हालांकि अब शहर में आलीशान इमारतों के अलावा सरकार की सैकड़ों आवासीय योजनाएं जमीन पर आ चुकी हैं, लेकिन शरणार्थियों के पुर्नवास के लिए कुछ नहीं हुआ. हालांकि शरणार्थियों को भारत की नागरिकता तो मिल गई लेकिन जिदंगी का सफर आज भी सत्तर साल पहले जैसे हालातों पर ही अटका हुआ है. जबकि इस पूरे ब्‍लॉक में 80 परिवारों ने उस वक्त शरण ली थी और उनके सरकारी दस्तावेज बनने के अलावा वह मतदाता भी बन गए, लेकिन जर्जर मकानों को लेकर कोई कार्रवाई नहीं हुई.

बहरहाल, यहां रहने वाले गोपीचद्र, कैलाश और जयपाल विश्नानी का कहना है कि जर्जर मकानों में जान का खतरा हमेशा मंडराता रहता है. नगर निगम की अनदेखी आज भी ऐसी है कि पूरे इलाके में सफाई सहित अन्य सुविधाओं के लिए तरसना पर मजबूरी है. सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन कोटा की इस छोटी सी बस्ती की किसी ने सुध नहीं ली. हालांकि इनको इस जगह से बेदखल तो नहीं किया गया, तो इनके पुर्नवास पर भी कोई कदम नहीं उठाया गया. इनका आरोप है कि कोटा नगर निगम द्वारा कई बार सर्व करने के बाद भी आशियाना नहीं मिला.

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