राजगढ़-लक्ष्मणगढ़: जातीय समीकरण तय करेंगे कि किसका पलड़ा पड़ेगा भारी
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राजगढ़-लक्ष्मणगढ़: जातीय समीकरण तय करेंगे कि किसका पलड़ा पड़ेगा भारी
विधायक गोलमा देवी। फोटो: न्यूज18 राजस्थान

मीणा जाति बाहुल्य यह विधानसभा क्षेत्र अुनसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है. शुरुआत से लेकर अब तक इस सीट पर ज्यादातर कांग्रेस का कब्जा रहा है. कांग्रेस का कब्जा जरूर रहा है, लेकिन उसकी परंपरागत सीट नहीं रही है.

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राजधानी जयपुर से करीब सवा सौ किलीमीटर दूर जयपुर-अलवर मार्ग पर स्थित राजगढ़-अलवर विधानसभा क्षेत्र का मिजाज कुछ अलग है. मीणा जाति बाहुल्य यह विधानसभा क्षेत्र अुनसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है. शुरुआत से लेकर अब तक इस सीट पर ज्यादातर कांग्रेस का कब्जा रहा है. कांग्रेस का कब्जा जरूर रहा है, लेकिन उसकी परंपरागत सीट नहीं रही है. यहां से कांग्रेस पांच बार तो भाजपा तीन बार जीत दर्ज करा चुकी है. वहीं एक-एक बार राजपा और समाजवादी पार्टी भी अपना झंडा बुलंद कर चुकी हैं. निर्दलीय और अन्य दल भी अपनी उपस्थिति दर्ज करवा चुके हैं.

करीब 240905 मतदाताओं वाले इस विधानसभा क्षेत्र से वर्तमान में राजपा की गोलमा देवी विधायक हैं.  इस क्षेत्र में टिकट व वोट दोनों ही पूरी तरह से जातीय समीकरणों पर टिके हुए हैं. यहां से वर्तमान विधायक गोलमा देवी पिछले दिनों अपनी पुरानी पार्टी भाजपा में घर वापसी कर राज्यसभा पहुंचे डॉ. किरोड़ीलाल मीणा की पत्नी हैं. भाजपा से अलग होने के बाद मीणा ने राजपा का गठन किया था. उन्होंने राजगढ़ से अपनी पत्नी गोलमा देवी को मैदान में उतारा. मीणा मतदाताओं में डॉ. किरोड़ीलाल की पैठ किसी से छिपी हुई नहीं है. जातीय समीकरणों की गोलबंदी के चलते गोलामादेवी ने यहां भाजपा, कांग्रेस, सपा के प्रत्याशियों को पछाड़कर जीत हासिल की थी.

यह है यहां का जातीय समीकरण
मीणा - 60 हजार
एससी - 35 हजार


ब्राह्मण - 24 हजार
मेव - 15 हजार
गुर्जर - 11 हजार
राजपूत - 11 हजार
वैश्य - 8 हजार
शेष में मतदाताओं में अन्य जातियां शामिल हैं.


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2008 में अन्य जातियों ने लामबंद होकर सपा को दिया समर्थन
यहां कांग्रेस द्वारा एक ही प्रत्याशी व उसके परिवार को लगातार और भाजपा से भी मीणा को ही टिकट मिलते रहने के विरोध में अन्य जातियां लामबंद हो गईं थी. उन्होंने 2008 के चुनाव में एकजुट होकर मीणा प्रत्याशियों को हराकर जातिवाद के खिलाफ यहां इतिहास रचा था. यहां मीणा समाज के प्रशासन व राजनीति में वर्चस्व के खिलाफ खुला मोर्चा खोला गया. इसके बाद पहली बार यहां समाजवादी पार्टी जीती. जाति विशेष के बढ़ते प्रभुत्व को रोकने के लिए जनता ने 2008 में समाजवादी पार्टी के सूरजभान धानका को अपना विधायक बनाया था.

फिर राजपा ने मारी थी बाजी
राजपा के गठन के साथ ही 2013 के चुनाव में गोलमा देवी यहां से मैदान में उतरी और उन्होंने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी सूरजभान धानका को 8128 वोटों से हरा दिया. आने वाले चुनावों में भी 2008 के जैसा माहौल है. अभी तक भाजपा व कांग्रेस समेत किसी भी पार्टी ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं. यहां राजनीति का ऊंट किस करवट बैठेगा यह भविष्य के गर्भ में हैं.


अन्य मुद्दों के साथ जातीय प्रभुत्व को समस्या मानते हैं यहां मतदाता
मुद्दों के नाम पर यहां भी अन्य विधानसभा क्षेत्रों की तरह बिजली, पानी और सड़क अहम हैं. लेकिन खास बात यह है कि यहां का मतदाता जातीय प्रभुत्व को भी यहां एक बड़ी समस्या मानता है. वहीं विधायक गोलमा देवी का दावा है कि उन्होंने विकास को लेकर किसी को निराश नहीं किया है. उन्हीं के शब्दों में कहें तो ' विकास की ऐसी गंगा पहले कभी नहीं बही'.

(रिपोर्ट: भंवर पुष्पेन्द्र सिंह)

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