...तो एमपी, छत्तीसगढ़ में इस कारण नहीं चला मायावती का फॉर्मूला!
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Assembly Election Result 2018: मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में नहीं चल पाया मायावती का जादू, न वोट प्रतिशत बढ़ा और न सीटें, जहां कभी 11 सीटें थीं वहां 2 पर ही करना पड़ा संतोष!

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  • Last Updated: December 12, 2018, 6:35 PM IST
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राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अपने पिछले अच्छे प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाई. दलितों के आंदोलन के बाद भी बसपा जहां थी, वहीं खड़ी है. न वोट पर्सेंट बढ़ा और न सीटें. राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि बसपा अगर कांग्रेस के साथ गठबंधन करती तो फायदे में रहती. इस बार उसका सबसे अच्छा प्रदर्शन राजस्थान में रहा है. (ये भी पढ़ें: 2019 के लोकसभा चुनाव पर असर डालेंगे पांच राज्यों के इलेक्शन रिजल्ट!)

मध्य प्रदेश में बीएसपी को 1993 और 1998 में 11-11 सीटें मिली थीं. इस बार पार्टी को ऐसे ही रिजल्ट की उम्मीद थी, लेकिन उसे सिर्फ 2 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा. यहां 2013 के मुकाबले पार्टी के वोट शेयर और सीटों की संख्या दोनों में गिरावट आई है. पिछले चुनाव में उसने 227 सीटों पर प्रत्याशी उतारे थे, जिनमें से 4 पर जीत मिली थी. उसे 6.29 फीसदी वोट मिले थे. जबकि इस बार बस 5 फीसदी वोट ही उसकी झोली में आए.

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छत्तीसगढ़ की बात करें तो बसपा ने अच्छे रिजल्ट की उम्मीद में वहां के पूर्व सीएम अजीत जोगी की पार्टी जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे) से हाथ मिलाया था. फिर भी उसके सिर्फ 2 प्रत्याशी जीते और महज 3.9 फीसद वोट मिले. जबकि 2013 के चुनाव में 4.27 फीसदी वोट के साथ उसे 1 सीट मिली थी. छत्तीसगढ़ में उसे 6 फीसदी से ज्यादा वोट हासिल हो चुका है, लेकिन सीटें कभी 2 से आगे नहीं बढ़ीं.
बसपा ने हालांकि राजस्थान में 2013 के मुकाबले अच्छा किया है. यहां 4.0 फीसदी वोट के साथ उसे 6 सीटें हासिल हुई हैं, जबकि पिछले चुनाव में 3.37 फीसदी मत के साथ उसे महज सिर्फ 3 सीटें मिली थीं. हालांकि वो 2008 के अपने सबसे अच्छे प्रदर्शन को नहीं दोहरा सकी है जबकि उसके खाते में 7.60 फीसदी वोट के साथ 6 सीटें थीं. पार्टी महासचिव राम अचल राजभर का कहना है कि कार्यकर्ताओं ने खूब मेहनत की, इसलिए उसे हर वर्ग के लोगों का समर्थन मिला. (ये भी पढ़ें:  2019 में कांग्रेस नहीं बसपा है बीजेपी के लिए बड़ा खतरा )

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उत्तर प्रदेश में चार बार राज कर चुकीं बीएसपी प्रमुख मायावती ऐसा मानती रही हैं कि दलित वोटों पर सबसे ज्यादा उनका हक है. बसपा नेताओं का मानना है कि मायावती अपने काम की वजह से इस दबे-कुचले वर्ग में राजनीतिक उत्कर्ष का प्रतीक हैं. इसीलिए उनकी एक आवाज़ पर दलित गोलबंद हो जाते हैं.

यहां गौर करने वाली बात यह है कि मध्य प्रदेश में 15.6, राजस्थान में 17.83 और छत्तीसगढ़ में 11.6 फीसदी एससी आबादी है. ऐसे में तीन राज्यों के चुनावी नतीजे बता रहे हैं कि इन तीनों प्रदेशों में वो दलितों का पूरा समर्थन हासिल नहीं कर पाईं.

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दलित अस्मिता के नाम पर उभरी बसपा ने अपना पूरा ध्यान यूपी की राजनीति पर लगा दिया. हालांकि, जिन प्रदेशों में दलित वोट ज्यादा हैं, वहां पर पार्टी अपने  प्रत्याशी जरूर उतारती रही है. यदि वो पहले इन प्रदेशों पर ध्यान दे देती तो आज उनमें सियासी समीकरण कुछ और होते.

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मायावती पर 'बहनजी: द राइज एंड फॉल ऑफ मायावती' नामक किताब लिखने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजय बोस ने कुछ दिन पहले न्यूज18 हिंदी से बातचीत में कहा था, “बसपा के राजनीतिक उदय के समय उसमें कई राज्यों के दलितों ने अपना नेता खोजा था, लेकिन मायावती ने न तो ध्यान दिया और न ही कांग्रेस और बीजेपी की तरह क्षेत्रीय नेता पैदा किए, जिसके सहारे उनकी राजनीति आगे बढ़ सकती थी. पंजाब, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बसपा के आगे बढ़ने का बहुत स्कोप था, लेकिन क्षत्रपों के अभाव में वह धीरे-धीरे जनाधार खोती गई.”

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